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पानी बचाने का क्षुद्र उपाय


45 साल पहले की बात है। मैं गाँव से पहली बार एक छोटे शहर में आया था। इस शहर में पानी की उस वक्त काफी किल्लत थी। लोग कुएँ को जालीनुमा ढक्कन में ताले लगाकर रखते थे, ताकि कुएँ से कोई पानी न निकाल पाए। लेकिन चोर तो सभी जगह होते हैं। पानी चुरा ही लेते थे। फिर हंगामा तो होना ही था! लेकिन आज उस शहर में पानी की ऐसी किल्लत नहीं है। याद है मुझे, उस वक्त किसी रेलवे स्टेशन पर पानी मुश्किल से मिलता था। वह भी गंदा और मटमैला। लेकिन आज सभी स्टेशन पर साफ पानी मिल जाता है। भारत का एक विभाग है, जो समय-समय पर करोड़ रुपये खर्चकर तेल बचाने का विज्ञापन करता है, दूसरी ओर स्थानीय सरकार एक गज की दूरी को पार करने के लिए आपको आध लीटर तेल खर्च करने को मजबूर करती है। उसी प्रकार आजकल पानी बचाने की मुहिम का फैशन चल पड़ा है। हमारे देश में 72 प्रतिशत आबादी के पास जरूरत भर भी पानी नहीं है, वह पानी क्या बचाएगी। 28 प्रतिशत पानी वाले लोग ही पानी बचाने की क्षुद्रताभरी बातें करते हैं। आजादी के तुरंत बाद ;गाँवों को छोड़करद्ध हमारी सरकार ने नगर में पानी की जो व्यवस्था खड़ी की थी, उस व्यवस्था का कालक्रम में उसने सही-सही संरक्षण, संवधर््न और अनुरक्षण नहीं किया। तो क्या ऐसे में पानी की किल्लत नहीं होगी? वैज्ञानिक हमें डराते हैं, बुðिजीवी हमें भरमाते हैं। किसी के पास पानी बनाने का वैकल्पिक उपाय नहीं है। पानी प्रकृति की अनुपम देन है। हम इसका दुरुपयोग होने से रोक सकते हैं। कहने को हम कह सकते हैं कि नदियाँ सूख रहीं हैं, ताल-तलैया सूख रहे हैं, जलप्रपात सूख रहे हैं, नदी का स्रोत सूख रहा है, लेकिन उसे रोकने के उपाय हमारे पास नहीं हैं। उपाय होता, तो हम बिहार के फल्गु नदी को बचा सकते थे, देश में कई जगहों पर रेगिस्तान बनने से रोक सकते थे, लेकिन हमारे वैज्ञानिक के पास डराने के अलावा कोई समाधन नहीं है। यह प्रकृति का चक्र है, जिसे कोई रोक नहीं सकता है। जल के लिए जो मारा-मारी है, वह हमारी क्षुद्र मानसिकता का परिचायक ही है। ऐसी परिस्थिति में यह कहीं और बढ़कर दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जाजनक है कि समस्याओं को लेकर भी कुछ लोग सरकारी संगठन बनाकर माल बटोरने में लगे हैं, उनकी कार्यशालाएँ शानदार होटलों में चलती हैं। नदी के किनारे की गंदगी को साफ करने के लिए उनके पास न समय है और न ही कुदाल और न ही देह गंदा करने का इरादा। पानी बचाने की बात बेमानी है, हाँ, हमें पानी का दुरुपयोग अवश्य रोकना चाहिए। इसका हम संकल्प लें।
अरुण कुमार झा –

One response to “पानी बचाने का क्षुद्र उपाय”

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