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• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

अच्छे दिन आने वाले हैं!


सोलहवीं लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ। परिणाम भी आ गये। सोलहवीं लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक रहा। ऐतिहासिक इस मायने में कि किसी एक आदमी ने अपने दम पर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई। यह विलक्षण प्रतिभा का द्योतक है। इस चुनाव में जिस प्रकार से एक व्यक्ति ने जाति, भाई-भतीजावाद, वर्गवाद, कुछ हद तक धर्मवाद से हट कर चुनाव अभियान को चलाया, यह अपने आप में अनूठा था। अनूठा इस मायने में कि जिस प्रकार से मदारी भीड़ जुटा कर गंडे-ताबीज बेचता है, उसी भाषा और स्टाईल में भीड़ जुटाकर चुनाव अभियान चलाया गया। इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया, प्रिंट मीडिया पर पैसे पानी की तरह बहाया गया। यह पैसे किसी न किसी के तो होंगे, जिसे अब चाहिए होगा। और इस अभियान का नाम दिया गया ‘मोदीलहर’ और ‘नमोमंत्र’। इस ‘नमोमंत्र- ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ और ‘मोदीलहर’ के सामने सभी पार्टियाँ मन ही मन अपने-अपने हथियार (गहन चुनाव अभियान) डाल चुकी थी। दिखावे के लिए सभी पार्टियाँ चुनाव में डटे रहने का स्वांग करती रही। राजनीति में यह सब चलता रहता है। राजनीति में हमेशा एक जैसी स्थिति नहीं रहती। इसलिए जीत हासिल करने वाली पार्टी को ज्यादा इतराना नहीं चाहिए कि अच्छे दिन आ गये, ‘फीलगुड’ की तर्ज पर इस चुनाव में भी हमेशा की तरह देश के एक खास वर्ग (तथाकथित बुद्धिजीवी) अपने घरों से बाहर वोट के लिए नहीं निकले। इस चुनाव में वोट का कुछ प्रतिशत बढ़ा है, वह इसलिए कि देश में नये बच्चे बालिग हुए थे, जिनका नाम नया-नया वोटर के रूप में दर्ज हुआ था, जो मोदी लहर में पूरी तरह बहते-भागते नजर आये। वे ही निर्णायक साबित हुए इस बार के चुनाव के नतीजे में। सोलहवीं लोकसभा चुनाव परिणाम को देखते हुए हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र के लिए यह शर्मनाक बात है कि आजादी की आधी सदी से ज्यादा बीत जाने के बावजूद वोट का प्रतिशत नहीं बढ़ पा रहा है। यह गंभीर चिंता का विषय है। फिर भी हम ताल ठोंकते हैं कि हमारा लोकतंत्र बहुत ही मजबूत है। जब तक 90फीसदी वोट चुनाव में नहीं पड़ते हमें यह समझना चाहिए कि हमारी सरकार पूरी तरह से वैध नहीं है। अभी भी 40फीसदी जनता के मत का रूझान का पता नहीं चलता। फिर हम कैसे इतरा सकते हैं कि हमारा लोकतंत्र पूरी तरह मजबूत है। हम अभी भी इस मामले में फिसड्डी ही कहे जायेंगे। आज के प्रतिस्पर्द्धि युग में जो बच्चे 90फीसदी और उससे ऊपर अंक नहीं लाते उसे अच्छे संस्थान में प्रवेश नहीं मिलता। लेकिन हमारे लोकतंत्र के मंदिर में जैसे भी व्यक्ति हों, जैसे भी चुनाव जीत लें, उन्हें स-सम्मान प्रवेश मिल जाता है, देश को हाँकने के लिए। और जनता गाय-बैल की तरह हँकाती रहती है। ऐसी स्थिति से उबरने के लिए क्या उपाय हो सकते हैं, इस विषय पर देश को चिंता करनी चाहिए। बावजूद इसके कि जब चुनाव हो ही गये हैं, 62फीसदी जनता अपना मत दे ही चुकी है तो सरकार बनेगी ही। सरकार के मुखिया मोदी जी प्रधनमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे ही। लेकिन जिस प्रकार से भाजपा के सांस्कृतिक संस्था-सहयोगी ‘आरएसएस’ मनसूबा बनाई हुई है, नहीं लगता है कि मोदी जी उनकी अपेक्षा पर खड़ा उतरेंगे। मोदी जी चूँकि संघ के प्रचारक भी रहे हैं। वे भी आरएसएस से संस्कारित हैं। फिर भी हमारे देश का संविधान ऐसा कुछ करने की इजाजत नहीं देता। देश की जनता के कुछ वर्ग-समुदायों को यह आशंका है कि मोदी जी आरएसएस के एजेंडे पर काम करेंगे। लेकिन जिस प्रकार के मोदी जी के हाव-भाव और तेवर चुनाव जीतने के बाद दिखने लगे हैं, वह शुद्ध राष्ट्रवाद और राष्ट्रहित के संकेत दे रहे हैं और मोदीजी देश के लिए, गरीब जनता के लिए कुछ खास और चुनाव की तरह ऐतिहासिक करना चाहते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह देश के लिए सुनहरा अवसर होगा। आज भारत अपने पास-पड़ोस के देशों से राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर परेशानी झेल रहा है। उसे अन्दरूनी आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भयानक उथल-पुथल का सामना करना पड़ रहा है। महँगाई (यह राजनीतिक शब्द है), भ्रष्टाचार, आतंकवाद और उग्रवाद देश को कम जोर कर रही हैं वहीं संवैधनिक पदों पर बैठे लोगों में आपसी गुटबंदी, लालफीताशाही, दलाली, घूसखोरी, कामचोरी आदि इस देश को खोखला कर रखा है। मोदी जी को इन चुनौतियों से जूझना होगा। और विपरीत परिस्थितियों में भी जनहित में फैसला लेना उनके लिए आग पर चलने जैसा ही होगा। लेकिन भारत की जनता मोदी जी को आशा भरी निगाहों से देख रही है, उम्मीद लगाये बैठी है कि मोदी जी देश के अधिकांश जनता (मजदूर वर्ग), जो असंठित क्षेत्र के हैं, वो खेतिहर हों या दिहाड़ी पर काम करने वाले, उनके लिए भी अलग से सोचेंगे। साथ ही महिलाओं की सशक्तिकरण की दिशा में भी दृष्टिपात करेंगे। एक दशक से ज्यादा वर्षों से भारत के अन्नदाता आत्महत्या कर रहे हैं जो देश के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और घोर लज्जा का विषय है बना हुआ है। राजनीतिज्ञों और जमाखोरों के कारण ही दुर्भाग्य ने हमारे देश को जकड़ रखा है। ‘दृष्टिपात’ नये जनादेश के बाद बनने वाली सरकार को अग्रिम शुभकामना देता है और यह अपेक्षा करता है कि सचमुच के ‘अच्छे दिन’ भारत के भाग्यविधता के रूप में साबित हो। (यह समदकीय चुनाव परिणाम के बाद और सरकार बनने के पूर्व का है )। अरुण कुमार झा प्रधान संपादक (दृष्टिपात ) –

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