Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक
Rajiv Anand
राजीव आनन्द
संपादक
Vinay Kumar Mishra
विनय कुमार मिश्र
संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

कविता


संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ

1) कितना सुना लगता है …. अनायास ही , निकल गया था  बाबूजी के मुख से , जब मायके से  वापसी की… बात चली थी  और  दूर खड़ी . अपलक निहार रही थी  माँ मेरी …. निर्विकार, न कोई रोष  न कोई प्रतिवाद और  न ही कोई संवाद .. एकदम उदास , एकदम खामोश  ओढ़े…


मुशायरा

गुलदस्ता-ए-मुक्तकनामा का लोकार्पण

ज़िन्दगी बिक रही अब ईमान के बाज़ार में, और क्या-क्या बिकेगा ईमान के दरबार में, संजय गिरि  —————————————— नई दिल्ली , आगमन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह द्वारा कवि मनोज कामदेव की पुस्तक “गुलदस्ता-ए-मुक्तकनामा” के लोकार्पण उत्सव का सुन्दर आयोजन कल नोएडा के कार्ल हूबर स्कूल के सभागार में आयोजित किया गया! मंच की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित सुरेश नीरव…


संसद की पुकार

सीता राम शर्मा ” चेतन “ दीवारें चिखती हैं वहां दुत्कारती हैं उनकी बदनियती पर सिखाती हैं बार-बार राष्ट्रधर्म का पालन करना देश के लिए जीना और मरना पर बेशर्म वे बहरे ठहरे डूबे हैं भ्रष्टाचार की दलदल में गहरे हुए निर्लल्ज अभिमान में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सोच रहे स्वार्थ के खुनी पँजों-से राष्ट्र…


aatank ke shikar

ओ निर्मोही बमों कुछ फूल भी खिलते हैं वहाँ…

बमों को नहीं पता होता कहाँ छिपे हैं आतंकी वे तो निकलते हैं अंधे पागल आत्मघाती दरिदों की तरह और मासूम बच्चो का लहू बहा कर नष्ट हो जाते है. आतंकी होते हैं चालाक बदलते रहते हैं अपनी जगह बच्चे नहीं होते आतंकी, नहीं होते चालाक वे खेलते रहते है कहीं भी अपने खेल और…


जीवन- नदिया

  पल-पल बहती जीवन-नदिया, सागर इसे बुलाए रे! मिलने के उल्लास में पगली!, दौड़ी – दौड़ी जाए रे!! जन्मों का नाता सागर से, प्रीत को कैसे भूल सके? बाधाओं से लोहा लेती, नेह का झूला झूल सके!! कोई बाधा रोक ना पाए, प्रेम – गीत नित गाए रे! मिलने के उल्लास में पगली!, दौड़ी –…


अनवर सुहैल की छः कविताएँ

एक जब कोई करता है विध्वंस कवि एक अच्छी कविता सिरजता होता है जब कोई उगलता है नफरत के जुमले कवि शब्दकोष में खंगालता है प्रेम, भाईचारा, दोस्ती और अमन के पर्यायवाची शब्द जब कोई ताकता है शेयर बाज़ार के उतार-चढाव कवि अपनी मासिक आय के दस प्रतिशत दाम की खरीदता है कविता की किताब…


नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार की कविता

ये इश्क नहीं है आसान प्रिये तुम कल्पना, मैं कड़वा यथार्थ हूं, तुम जीवन, मैं मुसीबतों का पहाड़ हूं इसलिए, ये इश्क नही है आसान प्रिये। तुम अनन्त, मैं शून्यता का प्रमाण हूं तुम ज्योति, मैं चहुंओर फ़ैला अंधकार हूं इसलिए, ये इश्क नहीं है आसान प्रिये। तुम अर्चना और उपासना जैसी हो, मैं विधुर…


रेणु कुमारी की दो मर्मस्पर्शी कविताएं

   Jun 21, 2015    1 Comment

माँ, पढ़ाई……शांति….. रेणु कुमारी हम सब कितना पढ़ते हैं पर कोई नहीं पढता माँ की तरह वह चेहरे की त्वचा और पेशियों को पढ़ती है और समझ जाती है कि कितने भूखे और कितने खाए हैं हम कितनी खुशी और कितना गम है हममें एक माँ जितना पढ़ती है उतना कोई नहीं पढता दुनिया में…


एक कविता-कृषक

अमिय, सुधा उपजाने वाला नित्य हलाहल पीता है देख! कृषक भारत का किस हाल में जीता है ओजहीन मुख गाल धसा है वक्ष के नीचे पेट फंसा है वस्त्र फंटे हैं बालों में तेल नहीं यह व्यवस्था का दोष है विधाता का कोई खेल नहीं खेतों की दरारें कृषक के पांव तक बढ़ गयी है उसके…


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