Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक
Rajiv Anand
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संपादक
Vinay Kumar Mishra
विनय कुमार मिश्र
संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

सम्पादकीय


drishtipat oct15

…बहुत काम बाकी हैं

पूरी दुनिया असहिष्णुता का दंश झेल रही है। भारत इसका कोई अपवाद नहीं है। असहिष्णुता का रूप, आकार, नाम और प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकता है। समय और काल के हिसाब से इसका प्रभाव कम और बेशी दिखता है। रंगभेद, नस्लभेद, वर्णभेद आदि इसके कई कारक हैं। मनुष्य जब पृथ्वी पर आया होगा, उस वक्त शायद…


दृष्टिपात अप्रैल 2015

गन्दी मानसिकता की सफाई कौन करेगा?

जिस व्यक्ति के आचार.विचार में, आचरण में, व्यवहार में, दैनिक जीवन में स्वच्छता का भाव नहीं हो वह पूर्ण सभ्य नहीं हो सकता। सभ्य व्यक्ति से ही सभ्य समाज का निर्माण संभव है। जिस समाज और देश के जेहन में जितनी सफाई के भाव होंगे वह उतना ही सभ्य समाज कहलाने का अधिकारी होगा। दुनिया…


लोकतंत्र के सौदागर

समय साक्षी है समय किसी को नहीं छोड़ता। समय को झुठलाने का हम जितना भी प्रयास करें वह धोखा ही होगा। हमेशा हम धोखा खाते हैं दूसरे को धोखा देते हैं। धोखा देने के लिए नाम तो कुछ भी हो सकता है- लोकतंत्र, राजतंत्र, जनतंत्र, लाठी तंत्र, धर्मतंत्र… आदि इत्यादि। समय साक्षी है- चलता तो…


दृष्टिपात जुलाई अंक 2015

एक मरीचिका ने हमें जिन्दा रखा है

समय साक्षी है आदि काल से देखा है हमने कैसे-कैसे अत्याचार हुए हैं हम पर अहंकारों की विजय की खातिर व्यवस्था के क्रूर हाथों हम हमेशा छले गये हैं। समय साक्षी है देवासुर संग्राम हो या महाभारत का संग्राम, लंका विजय हो या आधुनिक विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में युद्ध के इस खेल में मरता…


नैतिकता का संकट

नैतिकता और आत्मानुशासन ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को समृद्धशाली और स्वाभिमानी बनाते हैं। इन तत्त्वों के बिना समाज और राष्ट्र का जीवन अधूरा है। लेकिन हम मनुष्य नेकी की जगह अहंकार में जीने के आदि हो गये हैं। दिन-रात अनैतिक कार्य करने के लिए अपने को झोंक दिया है। अनैतिकता आज हमारे जीवन में…


कीचर में कमल नहीं. हमारी सोच है

हम अपने जीवन के कभी भी पुरा सच बोलना या जानना नहीं चाहते। दुनिया का गजब दस्तूर है। अब देखिए न भला, यह सिð हो चुका है कि सूर्य अपनी ध्ूरी पर स्थिर रहता है, पृथ्वी घूमती है, लेकिन हम हैं कि मानने के लिए तैयार ही नहीं। जिसके कारण समाज में कई प्रकार की…


यह कैसी भूख है?

पूरी दुनिया बेचैन है। गरीब से अमीर तक सभी बेचैनी में जी रहे हैं। हमारे मन और प्राण पर भूख का भूत सवार है। भूख पेट तक ही सीमित होती तो कोई बात होती। भूख असीमित है। धन की भूख, सुन्दर तन की भूख, मन की भूख, ओहदे की भूख, अहंकार की भूख, दुनिया को…


पानी बचाने का क्षुद्र उपाय

45 साल पहले की बात है। मैं गाँव से पहली बार एक छोटे शहर में आया था। इस शहर में पानी की उस वक्त काफी किल्लत थी। लोग कुएँ को जालीनुमा ढक्कन में ताले लगाकर रखते थे, ताकि कुएँ से कोई पानी न निकाल पाए। लेकिन चोर तो सभी जगह होते हैं। पानी चुरा ही…


बिना माइंडसेट के बदलाव संभव नहीं

शायद पूरी दुनिया भ्रष्टाचार से त्रास्त है। सुबह के अखबार हों या मीडिया रिपोर्ट- भ्रष्टाचार की महामारी के समाचार सुर्खियों में होते हैं। पियून से लेकर जज तक के भ्रष्टचार में लिप्त होने की खबरें आये दिन हमें सुनने को मिलती हैं। क्या हो रहा यह सब! समझ में से परे है। यह एक पहेली…


उनके एजेण्डे में देश नहीं

पूरी दुनिया दहशत में है। डरा हुआ व्यक्ति हर वह काम कर जाता है, सभ्य समाज जिसके लिए इजाजत नहीं देता। डरे हुए व्यक्ति से समाज की भलाई की अपेक्षा नहीं की जा सकती। डरे हुए व्यक्ति देशभक्त कदापि नहीं हो सकता। हम यहाँ भारत की बात कर रहे हैं। भारतीय समाज के लोग डरे…


इस विकट समय में गांधी ही विकल्प हैं

हर देश और हर काल में मनुष्य की बुनियादी जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान ही हैं। इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए मनुष्य अपनी मनुष्यता को धीरे-धीरे छोड़ता जा रहा है। जैसे ही रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतें पूरी होती हैं दिमाग में खुराफात का जन्म शुरू हो जाता है। यह खुराफात इतना बढ़…


भारत में जनता की सेवा राम भरोसे

प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है। लेकिन कुछ धूर्त लोगों ने लालच और स्वार्थ के वशीभूत होकर प्रकृति के सारे उपादानों को अपने पक्ष में करने के लिए तरह-तरह के उपाय ढूंढ लिए- अधिसंख्यक को गुलाम बनाने के उपायों की व्यवस्था के तहत। उन्हीं में से एक है राजतंत्रा और दूसरा है लोकतंत्र। लोकतंत्र…


अच्छे दिन आने वाले हैं!

सोलहवीं लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ। परिणाम भी आ गये। सोलहवीं लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक रहा। ऐतिहासिक इस मायने में कि किसी एक आदमी ने अपने दम पर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई। यह विलक्षण प्रतिभा का द्योतक है। इस चुनाव में जिस प्रकार से एक व्यक्ति ने जाति, भाई-भतीजावाद, वर्गवाद, कुछ हद तक धर्मवाद से हट…


ऐसे आएँगे अच्छे दिन

अब भी भारतीय समाज दब्बू, पिछलग्गू और धर्मभीरू है। इसी के कारण निर्मल बाबा, आसाराम बापू न जाने कितने उनके जैसे लोगों के दुष्प्रभाव में आकर अपना सर्वस्व गँवा बैठता है। भारतीय समाज में अनपढ़-गँवार को कौन कहें, पढ़े-लिखे लोग भी भेड़ चाल चल रहे हैं। समाज के पिछलग्गूपन होने की कमजोरी को धूर्त लोग…


जिंदगी प्यार का गीत है

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है, कोई अब तक तय नहीं कर पाया। शास्त्रों में इसका कोई ठोस उल्लेख नहीं मिलता। अगर है भी तो इसकी व्याख्या लोग अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हम अंधकार में भटक रहे हैं- रोशनी की तलाश में। लेकिन वह कौन सी रोशनी…


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