Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक
Rajiv Anand
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संपादक
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संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

BHARAT-EK CHITRA

KAVITA

   Jun 9, 2016    No Comments

अपने नेता लगते हैं ,
युग-युग से भूखे -नंगे है ।
सड़क में लाठी चार्ज करते ,
सदन में करते दंगे हैं ।
ये देश प्रेम में नहीं सखे ,
कैश प्रेम में डूबे हैं ।
यदा -कदा अपवाद नहीं ,
हर दिन दीखते मनसूबे हैं
जनता का कर कर रक्तपान ,
भारत को करते लहूलुहान ,
लालच में पुरे डूब गए ,
हर रोज फाड़ते संबिधान ।
ये दिल्ली थी दिलवालों की ,
बन कर रह गयी घोटालो की ,
मदिरालय सजे है मंदिर से,
दुर्गति हो रही शिवालो की ।
आज महाभारत दिखता है ,
भारत के कोने -कोने में ।
धृत रास्ट्र पुनः सत्ता में है,
दुहशासन के स्वप्न सजोने में ।
बिलख रही है आज द्रौपदी ,
गली-गली चौराहे पर ,
पुनः नपुंसक पांडु पुत्र है ,
खड़े हुए दो राहे पर ।
धृत रास्ट्र -रास्ट्र सब देख रहा है ,
लहू आग में सेंक रहा है ……..
घोटालो की चौपालों को ,
खेलो के दींन -दलालों को .
टू -जी के सब रखवालो को,
कोल के गोल सवालो को,
लोकपाल की अर्थी को,
भारत की रोती धरती को ,
शायद भूल गए होगे ,
26/11 की बरषी को ……
अनवरत उखड्ती सासों को,
टूट रहे विश्वासों को
सीमा पर गिरती लाशों को
नित नई किरकिरी करने बाली,
सत्ता की बक्बासो को ।
इन जंग लगी तलवारों को ,
घर में बैठे गद्दारों को ,
दुश्मन देहरी पर खड़ा हुआ .
और सोए पहरेदारो को ,
धृत राष्ट्र – राष्ट्र सब देख रहा है ,
लहू आग में सेंक रहा है
नेताओ की करतूतों को ,
बनते मिटते हुए सबूतों को,
गली -गली की गाली को ,
सिर पर पड़ते जूतों को
पाक की हर गद्दारी को
भारत की सब तैयारी को
सिसक रही बन्दूको को ‘
सैनिक की सब लाचारी को
धृतराष्ट्र, – राष्ट्र सब देख रहा है ,
लहू आग में सेंक रहा है
कब मजबूत हमारे होंगे फंदे ,
चौड़े होगे फिर से कंधे
कब शत्रु याचना मागेगा .
मरा -मरा सा भागेगा
कब अपने सिंह दहाडगे
दुश्मन के पाँव उखाडेगे ।
सेनाओ के बंधन खोलो ‘
रे नेताओ कुछ तो बोलो
लाल किले की दीवारों में
हिमगिरि से पहरेदारो में
दावानल सी दहक रही है ,
आज जवानी बहक रही है ,
भारत अपना संयम तोड़ो
आज युद्ध से मुह न मोड़ो
कब तक अत्याचार सहोगे ,
कब वार के बदले वार करोगे
कब नील गगन में खेलेगे ,
हँसते गाते बेपरवाह परिंदे
जब मजबूत हमारे होंगे फंदे
चौड़े होगे फिर से कंधे .
भारत माता वन्दे -वन्दे
भारत माता वन्दे -वन्दे ।

UPENDRA DWIVEDI
8600046397
NAGPUR

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