Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक
Rajiv Anand
राजीव आनन्द
संपादक
Vinay Kumar Mishra
विनय कुमार मिश्र
संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

पुनर्जन्म

Posted by    at    Jun 21, 2015    No Comments

श्रीधर सरकारी सेवा में रहकर भी भ्रष्ट सरकारी सेवकों के कुप्रभावों से अपने को दूर रखकर बड़ी ही ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा के साथ सरकारी कामकाज एवं दायित्वों को ससमय पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था। वह अपने बचे समय का उपयोग घर के लोगों को सदआचरण एवं कर्तव्यबोध से सराबोर करनमें में किया…


Category: कहानी

रेणु कुमारी की दो मर्मस्पर्शी कविताएं

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माँ, पढ़ाई……शांति….. रेणु कुमारी हम सब कितना पढ़ते हैं पर कोई नहीं पढता माँ की तरह वह चेहरे की त्वचा और पेशियों को पढ़ती है और समझ जाती है कि कितने भूखे और कितने खाए हैं हम कितनी खुशी और कितना गम है हममें एक माँ जितना पढ़ती है उतना कोई नहीं पढता दुनिया में…


Category: कविता

भूखे की हंसी

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मैं अदरख, धनिया और हरी-मिर्च खरीद रहा था। बेचने वाले से लगातार मिलते-जुलते रहने से जान पहचान हो गयी थी। उसे खांसते देखकर मैंने उसे कुछ होमियोपैथिक दवाईयां बतायी। वह कहने लगा, दवाईयां क्या खाउंगा सर, इसी तरह सुबह-शाम काम करते-करते बीच में ही सांसे रूक जायेंगी, बस। मैंने उसे गौर से देखा, उस पर…


प्रश्नचिन्ह

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मेरी जिंदगी की दुनिया स्वार्थ, लिप्सा से लिथड़ी हुई क्यों है ? राग, द्वेष, ईष्या, वैमनस्य, भय की लोलुप लाल आंखें हर तरफ से घूरती क्यों है ? दुनिया की आबादी इतनी बौराई, पथराई क्यों है ? हर तरफ-भीत पे, दरख्त पे, खंभें पे, चेहरे पर काला, नीला, स्याह पोस्टर सा चश्पा क्यों है ?…


भवानी प्रसाद मिश्रः हिन्दी जगत का अलबेला कवि

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जयंती के पूर्व संघ्या पर विशेष राजीव आनंद मघ्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में 29 मार्च 1913 को जन्में भवानी प्रसाद मिश्र दूसरे सप्तक के प्रमुख कवि है। सृजन की भावुकता और जीवन की व्यवहारिकता के बीच के द्वंद्व को बड़े बेबाकी से अभिव्यक्त किया है अपनी कविताओं में भवानी प्रसाद मिश्र ने। ईमानदारी की प्रतिमूर्ति…


कैलाश वाजपेयीः एक दार्शनिक-आघ्यात्मिक कवि

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स्मृतिशेष राजीव आनंद 11 नवंबर, 1936 को उतरप्रदेश के हरीमपुर में जन्में कैलाश वाजपेयी का 1 अप्रैल को दिल का दौरा पड़ने से दिल्ली के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें उनकी बेटी अनन्या ने मुखाग्नि दी। नेहरू युग से मोहभंग के काल में सर्वाधिक प्रभावित नई कविता के नई कवियों में प्रमुख कवि…


सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ 28वीं पुण्यतिथि पर विशेष

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शेखर एक जीवनी का तीसरा खंड आज तक अप्रकाशित क्यों ? राजीव आनंद सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ एक मुर्धन्य साहित्यकार, एक जीवट क्रांतिकारी, एक यायावर और एक संवेदनशील मनुष्य थे। नयी कविता और आधुनिक साहित्य में प्रयोग के प्रणेता रहे अज्ञेय अपनी एक बड़ी ही तीक्ष्ण तंजात्मक कविता साॅंप में कहते हैं- साॅंप तुम सभ्य…


एक कविता-कृषक

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अमिय, सुधा उपजाने वाला नित्य हलाहल पीता है देख! कृषक भारत का किस हाल में जीता है ओजहीन मुख गाल धसा है वक्ष के नीचे पेट फंसा है वस्त्र फंटे हैं बालों में तेल नहीं यह व्यवस्था का दोष है विधाता का कोई खेल नहीं खेतों की दरारें कृषक के पांव तक बढ़ गयी है उसके…


Category: कविता

शार्ली के कार्टूनिस्ट ने कहा ‘अब नहीं बनाऊंगा पैगंबर के कार्टून

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पैरिस। फ्रेंच मैगजीन शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्ट लुज ने कहा है कि वह अब पैगंबर के कार्टून नहीं बनाएंगे । लुज ने मैगजीन दफ्तर पर हुए हमले के बाद शार्ली एब्दो के कवर पिक्चर के लिए पैंगबर का कार्टून बनाया था । मैगजीन के ऑफिस पर इस्लामी आतंकवादियों ने हमला किया था, जिसमें 12 लोग…


भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की कुर्बानी पर परिचर्चा का आयोजन

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गिरिडीह। शहर के न्यूबरगंडा स्थित साहित्य दर्पण तंत्र के कार्यालय में सोमवार को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की कुर्बानी पर परिचर्चा का अयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता देव शंकर मिश्र व संचालन उदय मोहन पाठक ने किया। कार्यक्रम का प्रारंभ ओमीलाल आजाद भू. पू. विधायक, राजेश कुमार पाठक, सांख्यिकी पर्यवेक्षक, सदर प्रखंड गिरिडीह,…


भविष्य घट रहा है

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स्व. कैलाश वाजपेयी रचित कविता ‘भविष्य घट रहा है’ की कविताओं में प्रेम और शेषप्राय पारस्परिकता के बीच सोये-खोये वे रिक्त-स्थल भी मुखर हैं जो सर्वथा नये हैं या फिर जो रोजमर्रा की जिन्दगी जीते आदमी की पकड़ से चुपचाप छूट जाते हैं। आज की सार्थक हिन्दी कविता के पाठकों के लिए एक विचारोत्तेजक कविता-…


Category: लेख

पढ़े स्व. कैलाश वाजपेयी की एक कविता

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परास्त बुद्धिजीवी का वक्तव्य’ न हमारी आँखें हैं आत्मरत न हमारे होंठों पर शोक गीत जितना कुछ ऊब सके ऊब लिये हमें अब किसी भी व्यवस्था में डाल दो ‘जी जाएँगे’ ऊर्ध्व संगमरमर पर लगे हुए छत्ते-सी यह सारी दुनिया जिसे हम न पा सके हमारी डंक-छिदी देह को नहीं पता वहाँ कहीं शहद भी…


कीचर में कमल नहीं. हमारी सोच है

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हम अपने जीवन के कभी भी पुरा सच बोलना या जानना नहीं चाहते। दुनिया का गजब दस्तूर है। अब देखिए न भला, यह सिð हो चुका है कि सूर्य अपनी ध्ूरी पर स्थिर रहता है, पृथ्वी घूमती है, लेकिन हम हैं कि मानने के लिए तैयार ही नहीं। जिसके कारण समाज में कई प्रकार की…


यह कैसी भूख है?

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पूरी दुनिया बेचैन है। गरीब से अमीर तक सभी बेचैनी में जी रहे हैं। हमारे मन और प्राण पर भूख का भूत सवार है। भूख पेट तक ही सीमित होती तो कोई बात होती। भूख असीमित है। धन की भूख, सुन्दर तन की भूख, मन की भूख, ओहदे की भूख, अहंकार की भूख, दुनिया को…


बिना माइंडसेट के बदलाव संभव नहीं

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शायद पूरी दुनिया भ्रष्टाचार से त्रास्त है। सुबह के अखबार हों या मीडिया रिपोर्ट- भ्रष्टाचार की महामारी के समाचार सुर्खियों में होते हैं। पियून से लेकर जज तक के भ्रष्टचार में लिप्त होने की खबरें आये दिन हमें सुनने को मिलती हैं। क्या हो रहा यह सब! समझ में से परे है। यह एक पहेली…


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