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गिरीश पंकज
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संसद की पुकार


सीता राम शर्मा ” चेतन “

दीवारें चिखती हैं वहां
दुत्कारती हैं उनकी बदनियती पर
सिखाती हैं बार-बार
राष्ट्रधर्म का पालन करना
देश के लिए जीना और मरना
पर बेशर्म वे बहरे ठहरे
डूबे हैं भ्रष्टाचार की दलदल में गहरे
हुए निर्लल्ज अभिमान में
सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सोच रहे
स्वार्थ के खुनी पँजों-से
राष्ट्र का दामन नोच रहे।
जमीन फ़ट जाना चाहती है वहां
निगल जाना चाहती है उन्हें
जो देश के लिए बोझ हैं
जिनमें नही बचा तनिक राष्ट्रबोध है
जो बहुरूपिये से कलाकार हैं
जिनके चलते व्यवस्था हर कहीं की
डूब रही बीच मझदार है।
आत्मा देश के उस मंदिर की आज
पुकारती उन्हें बार-बार है
रे दुष्टों,रे भ्रष्टों,क्यों नहीं जागते
क्यों नहीं चलने देते मुझे देश के लिए
देखो कैसे देख रही,जनता हुई लाचार है।

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