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• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ


संगीता सिंह 'भावना'

       संगीता सिंह ‘भावना’

1)

कितना सुना लगता है ….
अनायास ही ,
निकल गया था 
बाबूजी के मुख से ,
जब मायके से 
वापसी की…
बात चली थी 
और 
दूर खड़ी .
अपलक निहार रही थी 
माँ मेरी ….
निर्विकार,
न कोई रोष 
न कोई प्रतिवाद और 
न ही कोई संवाद ..
एकदम उदास ,
एकदम खामोश 
ओढ़े मुकदर्शिता का 
आवरण ….
बात है यही कोई 
थोड़ी पुरानी 
पर आज अचानक 
अवाक् 
रह गई मैं ….
कितनी समानता है 
मेरी और माँ की 
आँखों में,बातों में …
जब बात विदाई की 
आती है …
बेटी जब पढने को 
जाती है ….
मेरी आँखें भी 
खामोश है ,
उदास है ..
बिल्कुल माँ की तरह……संगीता |
(2)
तुम्हारे बाद….
कुछ नहीं है शेष 
हर लम्हा करती है इंतजार 
तुम्हारे होने का वजूद |
जैसे सूरज की दस्तक होती है 
धरा पर ….
वैसे ही आना तुम 
मेरी जिन्दगी में …
प्रकाशित करना …
अपने प्यार की पुंज से 
आलोकित करना अपने स्वर 
की गुंज से …..
तेरी हर खामोश शब्दों 
की धीमी आहट 
भेदती है जब मेरे 
अंतर्मन को …..
मन की व्याकुलता का 
नहीं है कोई हिसाब |
गर कभी आ जाओ 
दिन हो जाये सतरंगी ….
रातें हों लाजवाब 
फिर बनायें हम एक नया 
आशियाँ …
पाकर तुम्हारा प्यार 
इन आँखों की हसरतें हो जाये निसार .
नहीं तोड़ सके जिसे ,कोई वक़्त का थपेड़ा 
चल बनायें एक नन्हा सा रैन बसेरा ….||
(3)
मेरे हमदम ……
तुम लौट आओ ..
तुमने जो उम्मीदें दी थी 
लौटने का ……
वो फिर से लगा है कुम्भ्लाने …
शेष होने को है तुम्हारी हर 
अनमोल यादें ….
मेरे मन की स्मृतियाँ 
अब धुंधलाने 
लगी हैं ,,
जिन्हें बड़े प्यार से तुमने 
भरा था मेरे …
मानसपटल पर ..|
तुम्हारे इंतजार के 
लम्हे ..
कटती है मुश्किल से,
दिन महीने और न जाने 
कितने अनगिनत साल ….
थक गई है अब 
आँखें ….
फिसल रही है,
कोने-कोने में सहेजा हुआ 
विश्वास ….
कमजोर पड़ने लगी है 
मेरी हर धड़कन ,
तुम्हारे आने की 
बढती हुई तारीखों की 
बढती हुई चुप्पी 
दिन -बदिन |
डायरी के हर पेज पर 
अंकित थी कभी जो तारीख ,
वो भी धूमिल लगा है 
अब पड़ने …
तुम्हारा यथार्थ 
खोने लगा है 
मेरी आँखों के 
अधूरे सपनों में …
अब तो लौट भी आओ 
मेरे हमदम ………!!
संगीता सिंह ”भावना”
वाराणसी 
मो,न.-9415810055

2 responses to “संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ”

  1. आनन्‍द विक्रम त्रिपाठी says:

    बहुत ही सुन्‍दर रचनॉए , उम्‍दा अभिव्‍यक्‍त‍ि ।

  2. रत्‍नाकर प्रकाश्‍ान ,इलाहाबाद says:

    बहुत ही सुन्‍दर और सार्थक रचनॉए

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