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शेरों ने लौटाई हड्डियां


जवाहर चौधरी 


शेर नाराज हो गए। नाराज होना और नाराज बने रहना शेरों का काम है। नाराज नहीं हो तो शेरों को कोई षेर न कहे। पहचान की इस चिंता के कारण बेचारे शेर प्रायः मुस्कराते भी नहीं है। लेकिन जब कोई शेर हंसता दिखाई दे जाता है तो उसके कई मायने होते हैं जिन्हें वही शेर समझ पाते हैं जो पहले हंस चुके हैं। हंसी का यह रहस्यवाद एक किस्म की साझेदारी से जुड़ा हुआ है। षेरों की हंसी एक तिलस्मी संघर्ष की हंसी है, यह बेताल की लंबी कथा के अंत की हंसी है। हजारों बरस उनका चमन अपनी बेनूरी पर रोता है तब कहीं पैदा होता है हंसी का सबब कोई। लेकिन आज याद आया कि वे तो शेर हैं इसलिए थोड़े समय के लिए उन्हें बाकायदा नाराज भी होना चाहिए। बहुत सोच विचार के बाद कुछ शेरों ने तय किया कि वे अपनी हंसी लौटाएंगे। उनकी हंसी जंगल की खुशहाली का प्रतीक क्यों हो। अगर अभी नहीं लौटाया तो इतिहास उन्हें हंसीखोर के रूप में दर्ज कर सकता है। सो जोरदार दहाड़ों के साथ इस बात की घोषणा हुई कि शेर अपनी हंसी लौटा रहे हैं। जंगल को समझते देर नहीं लगी कि फिर कोई षिकार हुआ। दाढ़ में एक बार खून लग जाए तो यह क्रम रुकता नहीं है। जल्द ही तमाम दूसरे षेर भी मुंह में अपनी अपनी हंसी दबाए जुट गए। हंसी लौटाने की होड़ सी लग गई। जंगलटीवी ने इसे हंसी लौटाने का मौसम घोषित किया और अपनी टीआरपी में बदल लिया। शेर बयान दे रहे हैं, बहसें कर रहे हैं, दुम उठा रहे हैं कभी पंजे पटक रहे हैं। फोटो छपा रहे हैं, लाइव टेबल ठोंक रहे हैं। जो भुला दिए गए थे अब टीवी पर उनके दांत गिने जा रहे हैं। हंसी ले गए थे तब कितने थे, आज जब लौटा रहे हैं तो कितने हैं। जुबान में तब कितना लोच था, अब कितनी बेलोच है। हंसी कोरी ‘ही-ही’ नहीं है और भी बहुत कुछ है। लेते समय रोम रोम हंसी के साथ था, लौटाते समय अकेली अबला हंसी है। ये हंसी वो नहीं है वनराज, वो तो आप हंस चुके। हड्डियां लौटा कर आप हिरण लौटाने का श्रेय नहीं ले सकते। लेकिन शेर सुनने को तैयार नहीं।
इधर चर्चा यह भी है कि षेर किसी विचारधारा के लपेटे में आ गए हैं। विचारधारा एक तरह का अभयारण्य है। वे उंची जालियों वाली एक हदबंदी में कैद रहते हैं और उन्हें इस कैद की आदत हो जाती है। हालांकि शेरों को भ्रम रहता है कि वे आजाद हैं। उन्हें लगता है कि जो जालियों के पार हैं दरअसल वे कैद हैं। इसलिए वे जालियां फांदने की सोचते भी नहीं हैं। तमाम लोग उन्हें देखने आते हैं, फोटो खींचते हैं, फिल्म भी बनाते हैं। उन्हें लगता हैं कि वे लोकप्रिय हैं, नायक हो जाने का भाव भी जाग ही जाता है तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है। अनेक षेरों ने अपनी गुफा में बैठ कर बकरगान किया है और बकरियों की कौम में आषा की किरण पैदा की है। शेरों का यह छोटा काम नहीं है, इसीका ईनाम हंसी है।
कुछ शेरों को सर्कस में भी अवसर मिला। यहां पिंजरा है लेकिन लंच-डिनर की अच्छी व्यवस्था है। थोड़ी बहुत कलाबाजियां करना पड़ती हैं लेकिन भागदौड़ नहीं है। यहां लाइम-लाइट है, कालीन, कुर्सियां हैं, संगीत है तालियां हैं। हां, … चाबुक भी है, लेकिन यू-नो, अनुशासन सर्कस की प्राथमिकता है। और यह याद रखने के लिए कि एक रिंग मास्टर है। सर्कस के हुए तो भी क्या हुआ, शेर आखिर शेर हैं, हर शो में वे भी हंसते हैं। हंसी का ईनाम इधर भी है।

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