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इस विकट समय में गांधी ही विकल्प हैं


हर देश और हर काल में मनुष्य की बुनियादी जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान ही हैं। इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए मनुष्य अपनी मनुष्यता को धीरे-धीरे छोड़ता जा रहा है। जैसे ही रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतें पूरी होती हैं दिमाग में खुराफात का जन्म शुरू हो जाता है। यह खुराफात इतना बढ़ जाता है कि अब पेट से ऊपर पहुँचने के लिए किसी का भी पेट काटना पड़े तो वह इससे गुरेज नहीं करता। यहीं से सारे फसाद शुरू होते हैं। छीनाझपटी, लूट-मार से ऊब कर ही लोगों ने कबीलाई जिन्दगी को छोड़ने की बात सोची होगी और इस तरह मानव का क्रमिक विकास होता गया। समाज-व्यवस्था को अंजाम मिला। समाज व्यवस्था में समान रूप से सभी को पनपने का अवसर मिलता है। लेकिन क्या कमी रही कि कभी भी समाज में एकरूपता नहीं रही- न आर्थिक, न सांस्कृतिक और न जातीय। हो सकता है कई विसंगतियाँ और अभाव आड़े आ रहे हों, लेकिन अब तो हम काफी विकसित हो गये हैं। कुछ मामले में तो मनुष्य की बुनियादी चीजें शायद किसी काल में बदले। फिर भी हम कबीलाई समाज से भी बदतर मानसिकता के शिकार क्यों हैं? हमारी मानसिकता छल-प्रपंच से क्यों भरी हुई है? जहाँ देखो- मोहल्ला स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक हर जगह एक-दूसरे को मात देने के लिए मनुष्य हर प्रकार के हथियार से लैस हो रहा है। आखिर मनुष्य की मंजिल कहाँ हैं, मंजिल क्या है? यह आज तक मनुष्य तय नहीं कर पाया है। जिसका नतीजा यह है कि हर सुबह से लेकर शाम तक एक दूसरे का पेट से लेकर सर काटने पर हम आमादा हैं, काट भी रहे हैं। खून पीना मनुष्य की नियति बनती जा रही है। इसके बगैर हमारी रात नहीं कटती, दिन नहीं गुजरता। जरूरी नहीं कि खून धरती पर गिरे। बिना खून गिराये ही खून किया जा रहा है। किसी के अरमानों का, तो किसी की उम्मीदों का, तो किसी की इच्छाओं का खून! क्या बन गई है दुनिया! इसी से बचने के लिए तो हमने लोकतंत्रा का निर्माण किया था ताकि सबको समान अवसर और समान रूप से जीने की स्वतंत्राता मिले। लेकिन क्या से क्या हो गया!
ऐसा नहीं है कि दुनिया में अमनपसंद लोग नहीं हुए या नहीं हैं! हुए। ऐसे ही लोगों में ईशा-मूसा, गांध्ी और बुð थे। जो इस धरती पर आये। लेकिन प्रपंची लोगों को यह सब पसंद नहीं था। उनकी हत्या कर दी गई। इतने पर भी संतोष नहीं हुआ तो उनके विचारों को इन लोगों ने एक साजिश के तहत दबाना शुरू कर दिया। लेकिन इन विचारों को कब तक दबाया जाता रहेगा? अब तो पूरी दुनिया चेतन होती जा रही है। ऐसे प्रपंची लोगों की साजिश को तो समझा जा सकता है। फिर भी हम चुप कब तक बैठे रहेंगे? समाज के पहुरूए, जिन्हें समाज में चेतना जगानी चाहिए वे स्वयं मूर्छा में पड़े हैं। नेता तो वोट और अपनी समृद्धि के लिए अपनी धेती का ढेकवा खोल कर झुके-बैठे हैं। समाज सेवी संस्थाएँ अब विनोबा भावे की संस्था नहीं है। अब वह एनजीओ में तब्दील हो चली हैं। और समाज सेवी सेवा के बदले में मेवा पाने के चक्कर में रात-दिन एक किये हुए सभी आदर्श को तार-तार कर रहे हैं। पत्राकार और पत्रकारिता अब पूँजीपतियों की दासी बन कर रह गई है। उनसे उम्मीद क्या करना! धर्म के ठेकेदार आपस में ही भगवान के बँटवारे में लगे हुए हैं इंसान को मार कर। अब ले दे के एक कौम बचता है – साहित्यकार का। यह कौम वैचारिक खोखलापन, लालचीपन और कझ्त्सित भावनाओं से ग्रसित होने के कारण बेचारा बन कर रह गया है। इनका हाल तो गाँव-गिराम की उन महिलाओं की तरह हो गया है, जो अपने आँगन में तुलसी नहीं होने के कारण दूसरे की तुलसी में जलार्पण नहीं करतीं – यह कहकर कि उसकी अपनी तुलसी नहीं है। आखिर ये साहित्यकार किसकी भलाई करना चाहते हैं? इनका धर्म सिर्फ अपने अहंकार की तुष्टि करना भर ही रह गया है। छोटे-बड़े का भेद यों कहें कि तुलसी-तुलसी में भेद करने लगे हैं ये तथाकथित साहित्यकार। भेद करने की इनकी मानसिकता ने इनके मन-प्राण को बुरी तरह से दूषित कर रखा है। अपने शहर के साहित्यकारों (ज्यादातर साहित्य के ढोंगी) का हाल तो बहुत ही घिनौना है। इनके साहित्य सृजन से समाज का कितना भला होगा?
गांधी का विचार ही इन सब से मुक्ति दिला सकता है। गांधी हमारे जीवन एवं चरित्र का जब तक हिस्सा नहीं बनंगे, तब तक समाज में फैली विकृतियाँ समाप्त नहीं होंगी। आज की राजनीति कालिख के समान हो गयी है। कोयले की खान में फूलों की खेती संभव नहीं है, हाँ, हीरे जरूर पैदा हो सकते हैं इन खानों। हीरे का स्वभाव है वितृष्णा पैदा करना, सो आज की राजनीति ऐसा ही कर रही है। कोई गांधी के विचारों में यदि सेंधमारी कर कृत्रिम फूल उगाने की कोशिश करेगा तो उसका अंजाम भी इसी समाज को भोगना पड़ेगा। अतः हमें सावधन और चैतन्य रहनेे की जरूरत है। अपने-अपने हृदय की गहराई में गाँधी के विचारों को पनपाने की जरूरत हैं, इन्हें पल्लवित-पुष्पित करने की जरूरत है, वरना बहुत से छलियाँ कई-कई रूपों में हमारे समाज में हमें छलने के लिए तैयार बैठे हैं।

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