Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक
Rajiv Anand
राजीव आनन्द
संपादक
Vinay Kumar Mishra
विनय कुमार मिश्र
संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

लोकतंत्र में मंत्री बड़ा या अफसर?


पिछले दिनों एक बैठक में हरियाणा के एक मंत्री अनिल विज की फतेहपुर की महिला पुलिस अधिकारी संगीता कालिया से बहस हो गयी. बहस इतनी बढ़ी कि मंत्री ने कहा ”गेट आउट, यहाँ से चले जाइए.” मगर महिला पुलिस अधिकारी ने कहा- ”नहीं जाऊँगी” तब मंत्री खुद उठ कर चले गए और दूसरे दिन ही उस महिला अधिकारी का तबादला हो गया. इस घटना को लेकर तरह -तरह के विचार सामने आ रहे है.

संगीता कालिया

                                                                                                           संगीता कालिया

लोग मंत्री की आलोचना कर रहे है. विपक्ष कह रहा हैकि यह महिला का अपमान है. एक ने तो आलोचना में तड़का लगाने के लिए कह दिया कि ये दलित महिला का अपमान है. आदि-आदि. मगर मैं इस घटना को और मंत्री या निर्वाचित जन प्रतिनिधि से जुबान लड़ने वाले हर बड़े अफसर के साथ होने वाले तबादले जैसे दंड को उचित मानता रहा हूँ. मेरा कहना है कि यह लोकतान्त्रिक देश है. अब यह गुलाम नहीं है. अंग्रेजो के समय अफसरशाही चलती थी मगर अब नहीं चलेगी. सरकार के अधीन रहने वाले अफसरों को अपनी हैसियत समझ लेनी चाहिए। वे सरकार के गुलाम हैं . जब तक वर्दी में है, उसके अनुशासन का पालन करना ही पड़ेगा. अगर बगावत का मन है तो उसकी भी आज़ादी है देश में, मगर तब वर्दी उतार कर सड़को पर उतारना होगा. यह बिलकुल नहीं हो सकता कि आप सरकार के नौकर भी बने रहें और अपनी दबंगई भी दिखाएँ।

हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री ने जब महिला आईपीएस से कहा कि लोग शिकायत कर रहे हैं कि पुलिस शराब बिक्री पर नियंत्रण नहीं कर पा रही तो महिला अधिकारी कहती है कि ”आप लोग ही शराब बेचने का लाइसेंस देते हैं. सरकार शराब बिकवा रही है”. उसने बात ठीक कही थी, मगर यह उसके अधिकार का अतिक्रमण था. यह बात केवल जनता कह सकती है. पुलिस का कारिंदा नहीं, क्योंकि वह सरकार का हिस्सा होता है. आदर्शवादी दृष्टिकोण से महिला अधिकारी का बयान लोकतंत्र का कखग न जानने वालों को लोगो को मसीहाई लग सकता है, मगर जो हमारी लोकतान्त्रिक संरचना है, यह उसके खिलाफ एक तरह की बगावत ही है. यही कारण है कि मंत्री भड़क उठे और गुस्से में कहा। होना तो यह चाहिए था कि मंत्री का आदेश मानकर महिला आईपीएस को फौरन उठकर बाहर निकल जाती। यही उसका सरकारी नौकर होने का धर्म कहता है. मगर वर्दी में होने के कारण वह यह भूल गयी कि लोकतंत्र में जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि ही राजा है और अधिकारी महज नौकर. मगर महिला आई पीएस अपने दायरे को भूल गई. उसका खामियाजा भुगतना पड़ा.

इसके पहले भी अनेक राज्यों में ऐसी घटनाएं होती रही है, जब मंत्री या जन प्रतिनिधि और अधिकारी आपस में भिड़े हैं. पत्रकारिता में लम्बे समय तक रहते हुए मैंने निकट से महसूस किया है कि हमारे देश के नौकरशाह यह भूल ही जाते हैं की वे ”शाह” भले है, पर है तो वे ”नौकर” ही. और नौकर नौकर ही होता है, मालिक नहीं हो सकता. इसलिए उसे चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने झुकना ही होगा. यह उनकी नौकरी का मूल मन्त्र है, यह वे समझलें , लेकिन पद का भूत उन पर ऐसा सवार होता है कि वे अकड़ में रहते है. जनप्रतिनिधियो को कुछ समझते नहीं , उनको बाहर बिठा कर रखेंगे, इंतज़ार कराएँगे , समय देंगे और गायब रहेंगे। उनसे ठीक से बात नहीं करेंगे, उन्हें जान हिट के जो कार्य बताए जाएंगे, उन्हें नहीं करेंगे। और जब जन प्रतिनिधि गुस्से में आएंगे तो वे भी जुबान लड़ाएंगे। मुझे लगता है एक साफ़-साफ़ निर्देशिका केंद्र से फिर जारी होनी चाहिए कि मंत्री, सांसद और विधायक तथा जितने भी निर्वाचित जन प्रतिनिधि है, उनके सामने सम्बंधित अधिकारी को अदब से ही पेश आना होगा। अगर वह गेट आउट भी कहता है तो उस वक्त उसका कहना मानना ही पड़ेगा. बाद में विभागीय लिखा-पढ़ी या प्रतिवाद होता रहेगा। अगर इस मामले में गंभीरतापूर्वक न समझा गया, तो सत्ता और प्रशासन के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी, यह कोई स्वस्थ स्थिति नहीं है. यह बहस का विषय हो सकता है कि किसी मंत्री को किसी अधिकारी के साथ कैसा सुलूक करना चाहिए पर यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि लोकतंत्र में उसका दर्जा बहुत बड़ा है. और वह केवल व्यक्ति नहीं, लाखों लोगो का प्रतिनित्व करने वाला एक प्रतीक है. हरियाणा के मंत्री अनिल विज केवल अनिल विज नहीं है, वे लाखों-करोड़ो हरियाणावासियो की भावनाओं का स्वर है.

जिस दिन हमारे अधिकारी लोकतंत्र के महत्व को समझेंगे, वे विनम्रता से पेश आएँगे. यही उनका फर्ज भी है. वे अपनी दबंगई अपना काम करके दिखाएँ, जनप्रतिनिधि से जुबान लड़ा कर नहीं. और अगर जुबान लड़ाना है, तो फिर सिस्टम से बाहर निकलना होगा। अनेक अफसरों ने ऐसा ही किया है. वे समझदार थे, जानते थे कि यहाँ रह कर उनका दम घुटेगा । वे सच बोल नहीं पाएंगे और कब तक मंत्री और नेताओं से पंगे लेते रहेंगे इसलिए अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं की देश में अनेक बड़े अफसरों ने कलेक्टरी छोड़ दी, पुलिस की नौकरी छोड़ दी और सामाजिक काम करने लगे या फिर राजनीति में आकर जनप्रतिनिधि की भूमिका में आ गए. मंत्री और मुख्यमंत्री तक बने. छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का एक उदाहरण हमारे सामने है. पहले वे अफसरी करते रहे, वह अंततः रास नहीं आई तो राजनीति में आ गए फिर मुख्यमंत्री भी बने और हर अफसर को राइट और टाइट करके शासन चलाया। कहने का मतलब यह है कि अधिकारी एक सीमा तक तो अधिकारी की अवमानना कर सकते है, पर अपनी निर्धारित लक्ष्मण रेखा पार नहीं कर सकते. अगर हर अफसर इसी तरह जान प्रतिनिधियों के आदेशो की अवमानना करता रहा तो क्या उसे लोकतंत्र कहा जाएगा? वह तो फिर अफसरतंत्र हो गया.

अफसरतंत्र खतरनाक है. उसका दमन जरूरी है. अगर हमारे जानप्रतिनिधिं हो, तो अफसरशाही इस देश में, समाज में नंगा नाच करे. लोकतंत्र होने के बावजूद अफसरों की नीचता या दबंगई की अनेक खबरे सामने आती रहती है. यह सब बर्दाश्त नही किया जाना चाहिए. इस लिहाज से हरियाणा की महिला अधिकारी के साथ अन्या हुआ, ऐसा कह कर घटना की निंदा नहीं कर सकता. या कोई भी लोकतंत्र प्रेमी नहीं कर सकता. मैंने टीवी चैनलों पर चले वो फुटेज देखे हैं , जिसमे हरियाणा के मंत्री और महिला आईपीएस सविता चौधरी के बीच बहस हुई. मंत्री उससे शालीनतापूर्वक बात कर रहे थे, पर जब महिला बार -बार सरकार पर भरी सभा में आरोप लगाने लगी कि सरकार शराब बिकवा रही है, तो स्वाभाविक था, कि मंत्री भड़कते और आदेश देते कि बाहर निकल जाओ. ऐसा भी नहीं हुआ कि मंत्री ने महिला से कोई बदतमीजी की हो, उलटे वे खुद उठकर बाहर निकल गए. यह बड़ी बात है. अफसर के लिए यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है क्योंकि वह मंत्री यानी सरकार की मातहत है, नौकर है. मालिक से कैसे बात करनी चाहिए, उसे यह पता होना चाहिए. कुल मिला कर हरियाणा की घटना एक सबक है. उन अफसरों के लिए जो अपने मंत्री को या निर्वाचित जनप्रतिनिधि को हल्के से लेते हैं, और उसका अपमान करते है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Youtube
Sensex

अन्य ख़बरें

Submit Your Article

Copyright © 2015. All rights reserved. Powered by Origin IT Solution