Girish Pankaj
गिरीश पंकज
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अरुण कुमार झा
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संपादक
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लोकतंत्र के सौदागर


समय साक्षी है
समय किसी को नहीं छोड़ता।
समय को झुठलाने का हम
जितना भी प्रयास करें
वह धोखा ही होगा।
हमेशा हम धोखा खाते हैं
दूसरे को धोखा देते हैं।
धोखा देने के लिए
नाम तो कुछ भी हो सकता है-
लोकतंत्र, राजतंत्र, जनतंत्र,
लाठी तंत्र, धर्मतंत्र… आदि इत्यादि।

समय साक्षी है-
चलता तो लाठी तंत्र ही है।
मैं भी साठ साल से देख रहा हूँ।
आप भी अपनी उम्र और समय
को देख ही रहे हैं।
स्वतंत्रता के लिए, स्वाधीनता के लिए
कैसे-कैसे, किन-किन रूपों में
कितने वीर सपूतों ने अपनी जानें गवाँयीं
किसके लिए?
लाठी/बंदूक वालों के लिए?
रूप और रंग जो भी हों-
नाम कुछ भी हो सकता है उनका-
…सिंह …यादव …साव …दास…
राम …गाँधी …मिश्रा …मंगरा …बुधवा
…एतवा …शुक्ला
…यादव ….राव …मोदी …अम्बानी।
ये सब-के-सब सियार, लोमड़ी,
गिद्ध ही तो हैं।

क्या करेंगे आप?
देखा नहीं आपने-
वीरों की वीरगति?
जिसने आजादी और लोकतंत्र के लिए
अपने प्राणों की आहुति दे दी।
देखा नहीं तो पढ़ा जरूर होगा
यदि पढ़ा भी नहीं तो सुना जरूर होगा
यदि सुना भी नहीं तो फिर अफसोस कैसा?
उसी का नतीजा तो है-
गिद्धों और लोमड़ियों के लोकतंत्र
में साँस लीजिये, डंडे खाइये, बंदी बनिये।

टमाटर की चोरी, बैंगन की चोरी,
कटहल की चोरी, भूख मिटाने के लिए
जूठे अन्न की चोरी, प्यास बुझाने के लिए
उनके बेकार बहते पानी की चोरी के जुर्म में
खूनी-भारतीय पुलिस एक्ट का
जुल्म सहिए और कुछ न बोलिए
बोलेंगे तो सरकारी काम में बाधा
डालने के जुर्म में क्या-क्या न सहने पडे़ंगे!
हो सकता है-
आतंकवादी और नक्सली भी
करार दिये जायेंगे।
इसलिए चुपचाप रहिए
लोकतंत्र है आजाद भारत का
संविधान जैसा कहता है वैसा करते रहिए।
आजादी के पूर्व की तरह हम जैसे
गुलामी में बसर करते थे
आगे भी करने को अभिशप्त हैं
करते रहिए।
यदि मुखर होंगे तो कुछ प्राप्त हो सकता है-
मृत्यु भी या उनकी जमात में शामिल होने की
सुनहरा राजकीय-शासकीय दावत
उड़ाने का अवसर भी।
इसके लिए आपको
अपने ईमान को बेचना पडे़गा
लेकिन मूल्य उनका होगा।

वीरों के पसीने और उनके
अरमानों के साथ धोखा
देने का साहस हो तो
यह लोकतंत्र आपके लिए सब कुछ
अनुकøल बना सकता है-
महँगी गाड़ी, हवाई सफर, बंगला और
मनोरंजन के लिए वह सब कुछ जो आप
सिनेमा में, अपनी कल्पनाओं में
देख कर अपनी इच्छाओं को
अबतक दबाते रहे हैं।

पहले सबकुछ देख-सुन कर
चुप रहना अनुशासन-पर्व माना जाता था-
अब तो कोई पर्व नहीं है
तब क्या करेंगे आप?

लोकतंत्र है, इसका आधार और जन्म
आपके ‘वोट’ की नींव पर खड़ा
और मजबूती से जड़ा है,
जड़ अंदर तक गहरा धंसा है।
क्या आप इसे उखाड़ पायेंगे?
यदि उखाड़ने का
कुछ अनुभव और माद्दा हो तो
आगे बढ़िये नहीं तो
ऐतिहासिक पानी के बुलबुले सरीखा
संपूर्ण क्रांति का बिगुल
तो फूंक दीजिए फिर देखिए
कितनी भेड़-बकरियाँ
आपके इस क्रांति-बिगुल
को कैसे-कैसे लेती हैं?
सिर्फ इतना ही करना है-
उन भेड़-बकरियों को विश्वास हो जाये कि
आने वाला समय उनका मूल्यांकन कर
आजीवन पेंशन-सुख देगा।

लोकधारा का दरिया वर्तमान
गंगा की तरह मैली
भले ही हो जाये, अपने बाप का क्या?
देश भाँड़ में जाये, अपने बाप का क्या?
सब कुछ तो बाजार के हवाले है अब।
‘वोट’ का बाजारवाद बड़ा ही पुख्ता है,
अब तो विदेशों में भी दिखता है।

आगे आप-हम सभी, बाजार के हवाले होंगे
सौदा करने में जो जितना माहिर होगा
‘वोट’ का मोल उतना ही तगड़ा होगा।
‘इवेंट’ प्रबंधन के तराजू पर
आप तौले जाँयेंगे, इनाम के साथ-साथ
और भी बहुत कुछ पायेंगे।
फिर आप भी खुश!
लोकतंत्र के सौदागर और
प्रबंधन भी खुश!
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक, दृष्टिपात हिंदी मासिक

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