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रेणु कुमारी की दो मर्मस्पर्शी कविताएं

   Jun 21, 2015    1 Comment

माँ, पढ़ाई……शांति…..
रेणु कुमारी
हम सब कितना पढ़ते हैं
पर कोई नहीं पढता माँ की तरह
वह चेहरे की त्वचा और पेशियों को पढ़ती है
और समझ जाती है कि
कितने भूखे और कितने खाए हैं हम
कितनी खुशी और कितना गम है हममें
एक माँ जितना पढ़ती है उतना कोई नहीं पढता दुनिया में
दुनिया के सारे आविष्कार
तकनीक, विज्ञान
अक्षर-अक्षर ज्ञान
नवीनता लिए किसी सृजन की तरह
नवीन सृजन के लिए
लेकिन बहुत बुरा है
उनका किसी संहार और युद्ध के लिए इस्तेमाल
कोई नहीं चाहता अपने आविष्कार का ये हश्र
जैसे कोई माँ नहीं चाहती
अपने बच्चे की मौत किसी नस्ली….जातियों के युद्ध में
इन आविष्कारों, तकनीक और विज्ञान के प्रयोग से पहले
क्या सुनिश्चित होना चाहिए कि
इन्हें इस्तेमाल करनेवाले हाथों और मनोमस्तिष्क में
थोड़ी संवेदना एक माँ की तरह, माँ की जैसी हो
यदि न हो तो किसी टैबलेट या हॉर्मोन के रूप में इंजेक्ट कर दिया जाये उनकी देह में
ताकि वे किसी युद्ध या संहार को अंजाम न दें
माँ किसी संहार या युद्ध में खत्म होने के लिए किसी को जन्म नहीं देती
तुमने ये क्या किया ?
सूरज ने अपनी धूप दी
धरती ने अपनी मिट्टी
वर्षा ने अपनी बूंदें
और हवा ने सांसें
और मै लहलहाया खेतों में
लहलहाया, इतराया, डालियों पर
किसानों ने थपकाया
किसान स्त्रियों ने पुचकारा और दुलारा मेरी बालियों को
और मै जम कर बन गया अन्न का दाना
सिर्फ अन्न का दाना मत कहो
कईयों का दुलार हूँ मैं
मुझमे धरती है
मुझमे आकाश है
मुझमे वर्षा की बूंदें हैं
मुझमे सूरज का ताप है
कईयों ने अपना अपना बहुत कुछ दिया है
और इस किसान ने अपना सर्वस्व दिया है
रात-रात भर जाग कर रखवाली की है
ठिठुरती ठंढ में काँपता रहा रात भर
स्त्रियाँ, उनकी बेटियाँ अपने विरुद्ध यौन हिंसित समय मे भी
हिम्मत के साथ खड़ी रही हैं हमे सींचने के लिए
तब जा कर बना हूँ अन्न का दाना
कितना कीमती हूँ मै !
कितना दुलारा !
है कोई इतना दुलारा ?
पर तुमने ये क्या किया ?
हमें गोदामों मे सड़ा दिया ?
और गोदामों से बाहर भी
शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
संपर्क-9579966931

One response to “रेणु कुमारी की दो मर्मस्पर्शी कविताएं”

  1. Thanks a lot for sharing!

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