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मैथिली संस्कार गीतों के विविध आयाम’ विषयक परिसंवाद


-अरविन्द श्रीवास्तव


-मध्यकाल मैथिली साहित्य के लिए स्वर्ण युग था- डा. वीणा ठाकुर

-अकादमी अपने आयोजन को गाँवों तक ले जाने का प्रयास करता है- डा. देवेश

-अच्छी बातें सीखना भी संस्कार है- धीरेन्द्र नारायण ’धीर’

-समकालीन कविता परिवर्तन की उपज है – सुभाष चंद्र यादव

’साहित्य अकादमी’ नई दिल्ली और एमएलटी महावि. सहरसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ’मैथिली संस्कार गीतों के विविध आयाम’ विषयक परिसंवाद एवं ’युवा साहिती’ कार्यक्रम में डा. देवेन्द्र कु. देवेश,विशेष कार्याधिकारी, साहित्य अकादमी ने कहा कि ’साहित्य अकादमी’ एक ऎसी संस्था है जिसका सरकार द्वारा वित्त पोषण तो किया जाता है लेकिन अपनी कार्य शैली में इसे स्वायत्तता है, यह स्वायत्तशासी संस्था के रूप में अपनी जिम्मेवारी निभा रही है। अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष सौ पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। विभिन्न राष्ट्रीय संगोष्ठी, बहुभाषी सम्मेलन आदि में 24 भाषी लेखक एकसाथ मौजूद होते हैं। साहित्यिक संगोष्ठी को सुदूर गांवों तक ले जाने का प्रयास होता है। एक वर्ष में लगभग साढे चार सौ आयोजन किए जा रहे हैं। अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष चार से साढे चार सौ पुस्तकें प्रकाशित की जा रही हैं। पुस्तक प्रदर्शनी लागाये जा रहे हैं..। डा. देवेश ने कहा कि मैथिली का दायरा बढ़ता जा रहा है, अभी भागलपुर में हुआ, डा. वीणा ठाकुर के नेतृत्व में मैथिली का कारवां बढ़ता जा रहा है।
कार्यक्रम को आगे बढाते हुए मैथिली भाषा परामर्श मंडल के संयोजक डा. वीणा ठाकुर ने कहा कि ’साहित्य अकादेमी’ को जो प्रतिष्ठा मिली है उसके अधिकारी आपलोग हैं। आज के विषय- ’मैथिली संस्कार गीतों के विविध आयाम’ पर प्रवेश करते हुए कहा कि ’संस्कार’ का जीवन में मह्त्वपूर्ण स्थान है। जब मनुष्य की उत्पति हुई होगी तभी गीत भी सामने आया होगा  मनुष्य अपने सुख-दुख अथवा आनंद की अभिव्यक्ति को वाणी दिया फिर उसे शास्त्रीयता में बांधा गया.. मैथिली साहित्य का मध्यकाल मैथिली साहित्य के लिए स्वर्ण युग था। उन्होंने आगे कहा कि लोकगीतों की कोई सीमा नहीं होती यह स्वतंत्र है, इसकी भाषा सरल व सुबोध होती है.. लोकगीतों का भौतिकीकरण नहीं किया जा सकता। समारोह के शुभारंभ में अतिथियों का स्वागत पाग एवं अंगवस्त्र के साथ किया गया।

समारोह

इस सत्र का बीज वक्तव्य कुलानंद झा ने दिया, उन्होंने इस विषय को वटवृक्ष की संज्ञा दी। अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार धीरेन्द्र नारायण धीर ने कहा कि संस्कार गीत अथाह है, समुद्र है, हमारे मिथिलांचल में जन्म से मृत्यु तक संस्कार जुड़े हैं। विद्यापति के गीतों में संस्कार है, रस है- ‘तोड़वय हम बेलपात लिखवय विरह के बात’। हमें अपने संस्कार नहीं छोड़नी चाहिए।

प्रधानाचार्य डा. केपी यादव नें धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संस्कार गीतों पर समग्र रूप से प्रकाश डाला। इस सत्र में आलेख पाठ करते हुए रामनरेश सिंह ने कहा कि संस्कार से जीवन के चार आश्रमों की पूर्णता होती है। रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि संस्कार गीत से मनुष्य जीवन दैदिव्य और महान होता है। हरिवंश झा ने कहा कि संस्कार गीत लोक जीवन की आत्मा है।
सत्र की अध्यक्षा करते हुए जगदीश प्रसाद ने कहा कि संस्कार गीत लोकगीत का मेरुदंड है। यह मंगलगीत है. हमारे यहाँ 16 संस्कार गीत हैं, अंतिम संस्कार

समारोह 1

                                                                                   पुस्तक का अवलोकन करते पाठक 

गीत मृत्यु गीत है। हमलोग मंगलकारी हैं अत: मृत्यु गीत पर अधिक विमर्श नहीं करते। उन्होंने अंक 16 के मह्त्व को रेखांकित किया।

समारोह का द्वितीय सत्र ’युवा साहिती’ का था जिसकी अध्यक्षता सुभाष चंद्र यादव ने की । संचालन करते हुए डा. देवेश ने युवा रचनाकारों की रचनात्मकता में अकादमी की सहभागिता को रेखांकित किया। इस सत्र में स्वाति शाकंभरी अपनी कविता- बिगरैत संस्कृति एवं कविता और सरीता शीर्षक कविता का पाठ किया। मधुबनी से पधारे अमित कुमार मिश्र ने अपने गीत-गज़ल से श्रोताओं का ध्यान खींचा। युवा कवि उमेश मंडल ने चलू फ़िल्म चलू तथा बाधा शीर्षक कविताओं को सुनाया। कवि उमेश पासवान ने अपनी कविता में पर्यावरण प्रदूषण को रेखांकित किया। रंगमंच और क्षेत्रीय इतिहास से जुड़े कवि रघुनाथ मुखिया ने ’अन्हरजाल’ तथा ’बीजमंत्र जपैत’ शीर्षक कविता द्वारा वर्तमान विश्व व्यवस्था से जुड़े कई समस्याओं से श्रोताओं को झकझोड़ा। निक्की प्रियदर्शनी ने ’उपन्यास में कथ्य’ तथा ’प्रकृति की बात कहु’ शीर्षक कविता से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अकादमी द्वारा- युवा कविता पुरस्कार से सम्मानित कवि नारायण झा ने ’हंसी हरयलै’ व ’अप्पन हिस्सा’ शीर्षक कविता से प्रभावित किया।

स्रोता-दर्शक

                                                                                                                 स्रोता-दर्शक

सत्र की अध्यक्षता करते हुए सुभाष चंद्र यादव ने कहा कि समकालीन कविता परिवर्तन की उपज है। कविता विभिन्न रूपों मे लिखी जा रही है। ये अमूर्त वस्तु हैं, हृदय से निकले विचार हैं.. युवा कवियों में अकूत संभावनाएं दबी है, उसे तराशने की जरूरत है।

इस यादगार आयोजन का धन्यवाद ज्ञापन कुलानंद झा ने साहित्य अकादमी एवं एमएलटी महाविधालय का आभार व्यक्त किया। आयोजन का अन्य आकर्षण डा. देवनारायण साहा की पुस्तक ’ मिथिलाक साहित्य-संस्कृतिक उत्कर्षमें संतकवि लोकनिक अवदान’ का साहित्यकारों द्वारा लोकार्पण, साहित्य अकादमी द्वार पुस्तक प्रदर्शनी एवं बिक्री स्टाल लगाना एवं बिजली प्रकाश व उनके सहयोगियों द्वारा स्वागत गान गायन भी था। उपस्थित विद्वतजनों एवं श्रोताओं की संख्या ने इस तरह के आयोजन आगे भी किए जाने की मांग की..।

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