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मतगणना बाद तय होगा असली किंगमेकर कौन?


दोस्तों, बिहार विधानसभा चुनाव के सभी चरण शांतिपूर्वक संपन्न होते ही कयासों का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए का सीधा मुकाबला महागठबंधन से है। एक तरफ जहां एनडीए के चुनाव प्रचार की कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभाले हुए थे, तो वहीं महागठबंधन पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का दबदबा बरकरार रहा। 8 नवंबर को चुनाव परिणाम आना है। किस गठबंधन को बहुमत मिलेगा? और कौन होगा उस जीत का मैन आॅफ द मैच? पार्टी के साथ-साथ बिहार के जनता का भी टेस्ट है, कि क्या वो आज भी जाति के बंधन में बंधकर ही वोट करते हैं या फिर प्रदेश का विकास उनकी प्राथमिकता है।

हार की चिंता में डूबे मोदी

                                                     हार की चिंता में डूबे मोदी

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता गया नेताओं का जनसंपर्क तेज हो गया। रैलियों का सिलसिला लगातार जारी रहा, लोक-लुभावने वादे किए जाने लगे। राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर के नेताओं ने जनता को अपने पक्ष में करने के लिए सभी हथकंडे अपनाए। चुनाव प्रचार में विकास के मुद्दे उस तरह से हावी नहीं रहे, जिस तरह से आरक्षण, गोमांस और दाल जैसे चीजों को मुद्दा बनाया गया, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बेहद कम हुआ। खैर चुनाव बीत चुका है, मतों की गिनती 8 नवंबर को होनी है और कयासों का दौर चल पड़ा है। जीत तो दोनों में से किसी एक गठबंधन की ही होगी लेकिन जीत या हार का श्रेय किसे जाएगा यह देखना दिलचस्प होगा।
जिस तरह से पूरे चुनाव में लालू महागठबंधन पर हावी रहे, देखा जाए तो निश्चित तौर पर जीत का श्रेय उन्हें ही जाता है। प्रचार के दौरान लालू के द्वारा 242 रैलियां की गई। नीतीश कुमार के सुशासन वाली छवि को लालू का अगड़ा-पिछड़ा वाला एजेंडा ओवरटेक करता दिखाई दिया। छात्र राजनीति के समय से ही राजनीति में लालू को एक चालाक और चतुर खिलाड़ी माना गया है। विरोधी के साथ-साथ इनके साथी भी इनके रणनीति को लेकर खासे सतर्क रहते हैं। नरेंद्र सिंह के अगुवाई में छात्र राजनीति की शुरूआत करने वाले लालू उनके आंखो के सामने पटना विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के चुनाव में प्रेसिडेंट बन गए। ऐसे में भले लालू मुख्यमंत्री ना बने, लेकिन इतना तय है कि महागठबंधन की सरकार अगर बनी तो सत्ता का केंद्र बिंदू लालू ही होंगे।

अब यदि भाजपा गठबंधन की बात करें तो भाजपा ने पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा। ऐसे में यदि भाजपा को जीत मिलती है तो इसका श्रेय प्रधानमंत्री को जाएगा और हार की स्थिति में इसका ठीकरा भी प्रधानमंत्री के माथे पर ही फोड़ा जाएगा। वजह यह है कि पूरे चुनाव के दौरान महागठबंधन के नेताओं द्वारा भाजपा से उसके दूल्हे के बारे में पूछा गया। जवाब में भाजपा ने महाराष्ट्र, हरियाण और झारखंड का उदाहरण दिया। और चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ही मुख्यमंत्री का चेहरा पेश करने की बात कही गई।
भाजपा को जीत दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सबसे अधिक विश्वसनीय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पूरे बिहार का चप्पा-चप्पा छान मारा। श्री शाह ने तो बिहार में ही कैंप कर लिया था। इसके अलावा नीतीश कुमार के विकास पुरूष की छवि को तोड़ने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को पेश किया था ताकि बिहार की जनता भाजपा को वोट दे।

जीत की ख़ुशी में लालू-पुत्र

                                                  जीत की ख़ुशी में लालू-पुत्र

बहरहाल आगामी 8 नवंबर को मतगणना होने हैं और यह तय हो जायेगा कि जीत किसे मिलती है। वैसे यह देखना दिलचस्प होगा कि मतगणना के बाद मुख्यमंत्री कोई बने लेकिन जीत का असली सेहरा किसके सिर पर बंधता है।

बीफ पर भारी पड़ा आरक्षण

दोस्तों, बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की सबसे बड़ी खासियत रही कि इसके एजेंडे चुनाव के शंखनाद से पहले ही तय हो गये थे। हालांकि मतदान के पांच चरणों के दौरान दोनों यानी भाजपा गठबंधन व राजद-जदयू-कांग्रेस महागठबंधन की ओर से मुद्दे उछाले गये। इनमें सबसे अधिक प्रभावकारी गोमांस और आरक्षण का मुद्दा रहा। आरक्षण को लेकर जातिगत गोलबंदी के प्रयास राजद प्रमुख लालू प्रसाद द्वारा तभी शुरू कर दिया गया था जब केंद्र सरकार ने आर्थिक जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी और जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को ठंढे बस्ते में डाल दिया था। इसी मुद्दे ने लालू प्रसाद को पूरी राजनीति को अगड़ा बनाम पिछड़ा करने का सुनहरा अवसर दे दिया।

जो बिहार की राजनीति जानते और समझते हैं उनके लिए यह तथ्य समझना जटिल नहीं है कि धार्मिक उन्माद का मुकाबला केवल जातिगत एकता ही कर सकती है। राजद प्रमुख ने यह फार्मूला वर्ष 1995 में भी अपनाया था। तब उन्हें नीतीश कुमार के बगैर भी बंपर जीत मिली थी। लालू प्रसाद के एजेंडे को सबसे अधिक हवा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने यह कहकर दे दी कि आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए।
श्री भागवत के बयान ने जहां एक ओर आरक्षण समर्थकों को एकजुट होने का संदेश दिया तो आरक्षण विरोधियों में एकजुटता भी बनने लगी। लेकिन उनकी एकजुटता तब खंडित होने लगी जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने आरक्षण को बरकरार रखने की बात कही और भाजपा को आरक्षण समर्थक करार दिया। दलितों-पिछड़ों के वोटों में सेंधमारी के लिए भाजपा के द्वारा किया गया यह आरक्षण विरोधियों को हतोत्साहित करने वाला साबित हुआ। इसका परिणाम यह भी हुआ कि जिन क्षेत्रों में आरक्षण समर्थकों का प्रभाव भाजपा के लिए हितकारी साबित हो सकता था, वैसा नहीं हुआ।
बहरहाल आगामी  आठ नवंबर को चुनाव परिणाम सामने आयेंगे और तभी यह भी सार्वजनिक होगा कि भाजपा द्वारा खेले गये जातिगत कार्ड का जनता की ओर से किस तरह का जवाब दिया गया। फिलहाल जिस तरह के सर्वेक्षण परिणाम सामने आये हैं, वे भाजपा के लिए शुभ संकेत तो नहीं ही कहे जा सकते हैं।

विधानसभा चुनाव 2015 में मतदान : एक नजर में

जिला                  वर्ष 2015(%)            वर्ष 2010(%)

समस्तीपुर             58.21                    54.20

बेगूसराय              58.63                    55.85

खगड़िया              59.20                    57.20

भागलपुर              54.37                   49.65

बांका                  56.30                      49.34

मुंगेर                  52.21                        46.34

लखीसराय             52.96                    48.33

शेखपुरा                55                          50.60

नवादा                 52.54                      45.40

जमुई                  53.95                       49.49

कैमूर                  59.49                        58.73

रोहतास                54.12                      52.45

अरवल                 51.24                      47.65

जहानाबाद             57.13                    49.80

औरंगाबाद             52.78                  50.51

गया                     56.83                        52.14

सारण                   53.29                        49.08

वैशाली                 56.56                        53.61

  नालंदा               53.18                        48.84

पटना                  52.45                        48.54

भोजपुर                52.19                        50.51

बक्सर                 57.62                        52.93

पश्चिम चंपारण         62.76                  58.30

पूर्वी चंपारण            59.47                  54.34

शिवहर                 54.84                    51.98

सीतामढ़ी              55.89                   48.36

मुजफ्फरपुर            61.02                  57.30

गोपालगंज             56.48                  53.17

सिवान                 54.25                    51.36

मधुबनी                55.87                   48.65

सुपौल                 58.60                    60.13

अररिया                62                        60.13

किशनगंज             64.39                  58.95

पूर्णिया                 62.95                   60.21

कटिहार                67.27                 62.29

मधेपुरा                57.84                  59.45

सहरसा                50.78                  52.75

दरभंगा                58.27                  47.58

कुल                   56.80                   47.58

मोहन भगवत

                                                                          मोहन भगवत

आरएसएस के नजरिये से बिहार का एक्जिट पोल

दोस्तों, चुनाव परिणाम हमेशा लोगों को आकर्षित करते रहे हैं। पहले जब वोट ईवीएम मशीन के बदले बैलेट बॉक्स में कैद रहते थे तब मतगणना जहां एक ओर भाग लेने वाले प्रत्याशियों के लिए दो-तीन दिनों तक महत्वपूर्ण और दिलचस्प बना रहता था वहीं आम जनता के लिए भी यह किसी उत्सव से कमतर नहीं हुआ करता था। परंतु अब ईवीएम ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। विधानसभा चुनावों में परिणाम आने में चार से पांच घंटे काफी होते हैं। लिहाजा राजनीतिक चर्चाओं के लिए समयाभाव अप्राकृतिक नहीं है। संभवत: यही कारण है कि मतगणना के पूर्व एक्जिट पोल की परंपरा शुरू हो गयी है। खासकर न्यूज चैनलों में तो इसे लेकर होड़ सी रहती है। वैसे यह देश में लोकतंत्र की गहरी होती जड़ों का सबूत है।

अब यदि बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की बात करें तो यह तय है कि इस बार का चुनाव पूर्व के चुनावों से बिल्कुल अलग साबित हुआ। पहली बार केंद्रीय सत्ता में शामिल नेताओं ने किसी सूबाई सियासत पर अपना अधिकार करने के लिए जमीन-आसमान एक किया। इसके अलावा यह संभवत: पहला चुनाव है जिसमें मुद्दे चरण-दर-चरण बदलते रहे। पहले गोमांस और आरक्षण का मामला फिर दाल की कीमत और जातिवादिता। हालांकि जो राजनीतिशास्त्र जानते-समझते हैं वे इस बात को मानते हैं कि केवल जाति के आधार पर लोकतांत्रिक राजनीति में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। आवश्यक पूर्व के चुनाव की राजनीतिक ट्रेंड हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 भी इससे अलग नहीं है।

मसलन वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब राजद, कांग्रेस और जदयू एक नहीं थे तब यह बहुदलीय लड़ाई थी। इस चुनाव में सबसे अधिक फायदा भाजपा गठबंधन को मिला था। वह 243 विधानसभा क्षेत्रों में से 172 पर जीतने में कामयाब रही थी। इसकी एक वजह यह भी रही कि बहुदलीय लड़ाई होने से गैर भाजपाई दलों के वोटों की हिस्सेदारी में कमी आयी। बिहार के लिहाज से यह माना जाता है कि एक प्रतिशत वोट घटने या बढ़ने का मतलब कम से कम आठ सीटें घटना और बढना होता है।
इस बार आरएसएस के विशेष पैरोकार व प्राख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के मुताबिक भाजपा गठबंधन के वोट शेयर में न्यूनतम 4 फीसदी की कमी आयेगी। उनके मुताबिक बिहार में नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ जनाक्रोश नहीं था। जितने भी मुद्दे भाजपा गठबंधन द्वारा उठाये गये, उन सभी मामलों में लालू-नीतीश ने बड़ी सुझ-बूझ के साथ मुकाबला किया। श्री भल्ला के मुताबिक जनता द्वारा अबतक दिखाये गये रूझानों की मानें तो बिहार विधानसभा चुनाव 2015 का विजेता लालू-नीतीश की युगलबंदी है, जिसने पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग एवं मुसलमानों को एक सूत्र में बांध दिया। हालांकि कई विधानसभा क्षेत्र अपवाद की श्रेणी में आ सकते हैं लेकिन अधिसंख्य क्षेत्रों में लालू-नीतीश की एकता का असर धरातल पर दिखा है। यह ऐतिहासिक है।

आखिरी बाजी मारने की असली चुनौती

दोस्तों, बिहार विधानसभा चुनाव के पांचवें व अंतिम चरण में राज्य के नौ जिलों के 57 विधानसभा सीटों के लिए गुरुवार को वोट डाले जाएंगे। इस चरण में न केवल अन्य चरणों की तुलना में सबसे अधिक सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को पिछले चुनाव के परिणाम को दोहराना भी चुनौती है। माना जा रहा है कि इस चरण में जिस गठबंधन को बढ़त मिलेगी, राज्य में अगली सरकार बनाने में उसकी राह आसान होगी।

इस चरण में सत्ताधारी महागठबंधन की ओर से जनता दल युनाइटेड ने 25, राष्ट्रीय जनता दल राजद ने 20 और कांग्रेस ने 12 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ओर से बीजेपी ने 38, एलजपी ने 11, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने पांच और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) ने तीन प्रत्याशी चुनावी समर में उतारे हैं।
राजनीति के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार गिरीन्द्र नाथ झा कहते हैं कि इस चुनाव में वोटों का बिखराव तय है। उदाहरण देते हुए वह कहते हैं, मल्लाह जाति का मतदाता अगर मिथिलांचल में महागठबंधन की ओर है तो सीमांचल में मल्लाह मतदाता एनडीए की ओर दिख रहा है। उनका मानना है कि मुस्लिम और यादव मतदाताओं में भी एनडीए सेंध लगाने की कोशिश में है। झा के अनुसार, मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) कुछ क्षेत्रों में दोनों गठबंधनों को प्रभावित करते नजर आ रहा हैं, मगर ऐसा नहीं कि कोई भी पार्टी किसी खास जाति के मतदाता पर अपना दावा कर सके। झा का मानना है कि मुख्य मुकाबला दोनों गठबंधनों में ही है, लेकिन मधेपुरा समेत यादव बहुल क्षेत्रों  जन अधिकार पार्टी तो कटिहार में एनसीपी मुकाबले को त्रिकोणात्मक या बहुकोणीय बना रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र से सबसे अधिक 23 सीटें बीजेपी के खाते में गई थी, जबकि उस चुनाव में बीजेपी के सहयोगी जेडीयू ने 20 सीट पर विजय पताका फहराया था। इसके अलावा आरजेडी को आठ, कांग्रेस को तीन, एलजेपी को दो और एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। बाद में हालांकि एलजेपी के दोनों विधायक जेडीयू में शामिल हो गए थे।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन क्षेत्रों में रैली के दौरान संबोधन काफी संयमित रहा है, जिसका प्रभाव मतदाताओं पर अवश्य दिख रहा है, मगर पिछले चुनाव में इसी क्षेत्र से आरजेडी को सबसे अधिक सीटें मिली थीं। ऐसे में यह तय है कि आरजेडी इस चुनाव में भी इस इलाके में बढ़त बना ले।
महागठबंधन के लिहाज से अंतिम चरण का चुनाव पहले से कहीं ज्यादा मुफीद माना जा रहा है, लेकिन सहरसा, सुपौल और मधेपुरा में जन अधिकार पार्टी उसके लिए चुनौती खड़ी कर रही है। वे कहते हैं कि अंतिम चरण का परिणाम ही किसी राजनीतिक दल या गठबंधन को बिहार की सत्ता तक ले जाएगा।

इस चरण के 57 सीटों में से सांसद पप्पू यादव की पार्टी जन अधिकार पार्टी 46 सीटों पर प्रत्याशी उतारा है, जबकि एआईएमआईएम छह सीटों पर पहली बार बिहार के चुनावी समर में भाग्य आजमा रही है। एनसीपी ने 12 क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी उतारे हैं। पांचवें चरण के चुनाव में जिन नौ जिलों के 57 विधानसभा क्षेत्रों के लिए चुनाव होने जा रहा है, उनमें चार जिलों में महागठबंधन तथा दो जिलों में एनडीए का दबदबा माना जा रहा है। इस चरण में मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा व दरभंगा जिलों के विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होना है।

किशनगंज के सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल महताब कहते हैं कि बाहरी मुस्लिम तो चुनाव जीत कर चले जाएंगे, इसके बाद उन्हें कोई कहां खोजेगा? किशनगंज के लोग स्थानीय उम्मीदवार को ही वोट देंगे। उनका कहना है कि विकास के नाम पर ही मतदाता अपना जनप्रतिनिधि चुनेंगे। गौरतलब है कि इस चरण के मतदान के लिए जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई केंद्रीय मंत्री मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए चुनावी सभा कर चुके हैं। आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी प्रचार के अंतिम दिन मंगलवार को चुनावी रैली की।

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