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भारत में जनता की सेवा राम भरोसे


प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है। लेकिन कुछ धूर्त लोगों ने लालच और स्वार्थ के वशीभूत होकर प्रकृति के सारे उपादानों को अपने पक्ष में करने के लिए तरह-तरह के उपाय ढूंढ लिए- अधिसंख्यक को गुलाम बनाने के उपायों की व्यवस्था के तहत। उन्हीं में से एक है राजतंत्रा और दूसरा है लोकतंत्र। लोकतंत्र हो या राजतंत्र दोनों व्यवस्था में अधिसंख्यक जनता हमेशा से (प्रत्येक्ष/परोक्ष रूप से) गुलाम बनकर ही रहती है। जनता की कमाई से ही सारी व्यवस्था चलती है। राजा महाराजा हों या लोकतंत्र के नेता/अधिकारी दोनों के शासन में जनता ही पिसती है। जनता ही बेमौत मरती है। हमेशा से इस धरती पर धूर्त लोग रहते आ रहे हैं। उन्हीं धूर्त में से कुछ लोगों ने जनता को विश्वास में लेकर राजतंत्रा की खिलाफत कर लोकतंत्र की स्थापना की। सुन्दर-सुन्दर कल्पनाओं की दुनिया में ले जाकर गरीब-लालची, लाचार जनता को मीठे-मीठे सपने दिखाये। और लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की। लेकिन उसका हस्र क्या हुआ? जो हम मुगलों के समय में थे, या फिर अंग्रेजों के राज में, कमो-वेश आज भी वही व्यवस्था है, हम उसी के एक हिस्सा हैं। बल्कि क्रूरता और दमन पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा है। आम जनता को अपना हक लेने के लिए भीषण लड़ाई लड़नी पड़ती है। कहने की जरूरत नहीं है कि कहाँ-कहाँ भीड़ की कतारों में हमें लगना पड़ता है। इस भीड़तंत्र (वोटतंत्र) की भीषण त्रासदी को कम या बिलकुल समाप्त करने की दिशा में किसी ने अब तक कोई कोशिश नहीं की। परिणामस्वरूप वोटतंत्र (भीड़तंत्र) कायम है। भीड़ का दिमाग नहीं होता। इसी का फायदा लोकतंत्र के लुटेरे इस देश में उठा रहे हैं। वोटतंत्र में पैसे और मसलपावर ही सर्वोपरि होता है। जिसके पास ये दोनों चीज नहीं हैं, उनके लिए लोकतंत्र का कोई मायने नहीं। कहा तो जाता है कि लोकतंत्र में चुनाव के जरिये देश के रहनुमा चुने जाते हैं, लेकिन ऐसा व्यावहारिक रूप में देखने को नहीं मिलता। यहाँ नेता चुन कर नहीं विजय प्राप्त कर आते हैं। जिस व्यवस्था में विजय का भाव हो, वह चुनाव का हिस्सा कैसे हो सकता है। यह तो युद्ध का भाव है- विजयी होना। इस लोकतंत्रीय लड़ाई में हमेशा से जनता ही छली जाती है और लूटती-पिटती, हारती है। विजयी तो नेता होते हैं। जो पाँच साल तक मनमाने ढंग से देश और जनता को लुटते, हाँकते रहते हैं। हिन्दी फिल्म ‘रोटी’ का एक गीत है- ‘यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो, जिसने पाप न किया हो वो पापी न हो।’ एक भी नेता आज देश में ऐसा नहीं है, जो ईमानदार हो। ईमानदार तो नेता बन ही नहीं सकता है और चुनाव में विजयी होने की तो कल्पना करना मूखर्ता ही है। आप खुद फैसला करें कि वह कैसे? फर्ज कीजिए कि एक नेता अपने को ईमानदार कहता है। चुनाव लड़ता है। पैसे उसके पास नहीं हैं। चुनाव में खर्च नहीं कर सकता है। भीड़ वह जुटा नहीं सकता है। मोटर साइकिल जुलूस निकाल नहीं सकता है। बैनर और प्रचार वाहन रख नहीं सकता। तो फिर उसे वोट कौन देगा? यहाँ तो बाजारवाद है। उत्पाद की तरह वोट के लिए प्रचार करने की परिपाटी बनी हुई है। संविधान इस पर क्या कहता है, मुझे मालूम नहीं। लेकिन यह किसी भी दृष्टि से कानूनी और वैध नहीं हो सकता। आज मुखिया के चुनाव हो या वार्ड पार्षद के, उसमें कम से कम 50 लाख रुपये स्वाहा होते हैं। तो फिर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव खर्च का अंदाजा सहज ही लग जाता है कि एक नेता कितने खर्च कर चुनाव में जीत हासिल करता है। लोकसभा के चुनाव में कम से कम एक नेता पर 10 से 50 करोड़ तो खर्च होते ही हैं। इसके लिए खर्च कहाँ से आते हैं? इसके लिए यदि कोई कर्ज देता है तो कर्ज देने वाला सूद समेत अपना पैसा वापस चाहेेगा। यदि कोई व्यक्ति कोई नेता पर दाँव लगाता है तो वह अपना पैसा सुरक्षित जानकर ऐसा करता है। जो नेता इस प्रकार से पैसे का जुगाड़ कर चुनाव जीतेगा तो उसका पहला लक्ष्य होगा कि उन पैसों को वह जल्द से जल्द निकाल ले। फिर अगला चुनाव के लिए वह पैसे की जुगाड़ में पाँच साल तक जनता को लूटता रहेगा। अब उसके पास फिर जनता की सेवा का समय कहाँ बचता है कि नेता जनता की सेवा करे। जनता की सेवा का काम तो भारत में राम भरोसे ही चलता है। यदि भारत की सच्ची सेवा करनी है तो नेताओं को वर्तमान वोटतंत्रा में तब्दीली लाने की जरूरत है। वर्तमान चुनाव प्रणाली में आवश्यक संशोधन कर व्यावहारिक बनाना समय की मांग है। इसके लिए नेता स्तर (वयक्तिक स्तर) पर चुनाव न कराकर पार्टी स्तर पर चुनाव की व्यवस्था होनी चाहिए। और इस प्रणाली से चुने गये नेता के कम-से-कम एक साल तक देश चलाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। इस नई प्रणाली के लागू होने से देश से जातिवाद, वंशवाद, भाई-भतीजावाद और नोटवाद का बोलवाला लगभग समाप्त हो जायेगा। तब नेता चुन कर आयेंगे न कि विजयी होकर। तभी जाकर देश को भ्रष्टाचार-मुक्त किया जा सकता है। अरुण कुमार झा, प्रधान संपादक –

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