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भारतीय संस्कृति में सद्भाव के सूत्र

साम्प्रदायिकता बनाम सामाजिक सद्भाव


विश्व के सबसे विशाल लोकतन्त्र के रूप में भारतीय धरा ने विभिन्न जातियों, धर्मों और भाषाओं की खूबसूरत सतरंगी माला को आत्मसात् किया हुआ है। भारत में एक अरब से ज्यादा लोग जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं तमाम जातियाँ व जनजातियाँ शामिल हैं, उनकी जड़ों में सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव एक विशिष्ट रूप में मौजूद होकर सुजला, सुफला, शस्य श्यामला राष्ट्र के प्रति समर्पण दर्शाता है। सैकड़ों आक्र्रमणों, जाति-धर्म के अनेक झंझावतों, भाषा, बोली, त्यौहार, खान-पान व वेषभूषा में फर्क होने के बावजूद भी एक-दूसरे के साथ विभिन्न पर्वांे में हम शरीक हुए हंै और भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णता बरकरार है। यही हमारी अनूठी सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की सबसे बड़ी विशेषता है।

भारत में प्राचीन काल में वर्णाश्रम व्यवस्था के तहत कर्मांे के आधार पर ब्राह्यण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र वर्गाें की व्यवस्था की गई। परशुराम ब्राह्मण होकर भी कर्म से क्षत्रिय थे तो विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय होकर भी कर्म से ब्राह्यण थे। महाभारत कालीन विदुर दासी पुत्र थे पर कर्म के आधार पर उनकी योग्यता का सम्मान किया गया। कालान्तर में इस व्यवस्था के कर्म की बजाय जन्म आधारित बन जाने पर छुआछूत और अस्पृश्यता जैसी विभेदकारी भावना को बढ़ावा मिला। विभिन्न धर्मान्तरणों का एक बहुत बड़ा कारण अस्पृश्यता की भावना रही है। बौद्ध व जैन धर्मांे ने इस व्यवस्था पर चोट करके ही अपनी स्वीकार्यता कायम की। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान इस तथ्य को समझा गया कि सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं। तद्नुसार विभिन्न समाज सुधारकों ने इस ओर ध्यान दिया। ज्योतिबा फूले प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने निचली जाति की लड़कियों हेतु अनेक स्कूल खोले, तो गाँधी जी ने अस्पृश्य वर्ग को ’हरिजन’ नामक देकर उनके उद्वार हेतु कार्य किया। इस सम्बन्ध में सबसे प्रभावशाली रूप में डा0 अम्बेडकर ने दलितों हेतु संघर्ष किया और सुनिश्चित किया कि उन्हें समाज में बराबरी का स्थान दिलाने हेतु संविधान में विशिष्ट उपबंध किये जायें।

राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान और उसके पूर्व सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव भारतीय संस्कृति का एक गौरवशाली पक्ष रहा है। भक्तिकाल में जाति-धर्म से परे हिन्दू व मुस्लिम सन्त दोनों ने समान भाव से लोकप्रियता हासिल की। कबीर को एक जुलाहे ने पाला पर उनके गुरू राम उपासक रामानन्द थे। रानी कर्मवती ने हुमायँू को राखी भेजकर सद्भावना की मिसाल कायम की। अकबर ने सुलहकुल की नीति अपनायी एवं हिन्दुओं से भी वैवाहिक रिश्ते जोड़े। कट्टर मुसलमान होने के बावजूद मुगल शासक औरंगजेब के शासन काल में सर्वाधिक हिन्दू अधिकारी थे। तमाम मुस्लिम शासकों ने हिन्दू मंदिरों के जीर्णोद्धार हेतु धन दिया। शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल आज सिर्फ मुस्लिम स्थापत्य कला का ही प्रतीक नहीं बल्कि सभी धर्मों द्वारा इस प्रेम के प्रतीक को उतनी ही श्रद्धा से देखा जाता है।

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जाति, धर्म, लिंग, भाषा से ऊपर उठकर लोगों ने देश को आजाद कराने हेतु अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। अन्तिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर मुस्लिम होने के बावजूद माथे पर तिलक लगाकर और गले में जूनर यानी पवित्र धागा बाँधकर मन्दिर जाया करते थे, तो 1857 में नाना साहब जैसे चित्पावन ब्राहमण ने भी अपनी उद्घोषणा इस्लामी उक्तियों के साथ आरम्भ की। बेगम हजरत महल और खान बहादुर खान ने राम और कृष्ण के नाम पर लोगों से अपील की। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिमों की प्रभावी भूमिका से कुपित अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम अलगाववाद की नीति अपनायी पर उन्हें उस रूप में सफलता नहीं मिली। यही कारण है कि वर्ष 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल-विभाजन द्वारा हिन्दू-मुस्लिम को पृथक करने की सोची तो लोगों ने एक दूसरे को राखी बाँधकर एकता का इजहार किया और गंगा में डुबकियाँ लगाकर इस आंदोलन का विरोध आरम्भ किया। वकील अब्दुर्रसूल और हसरत मोहानी जैसे प्रगतिशील मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया। इसी प्रकार 1919 में हिन्दू-मुस्लिम एकता प्रदर्शित करने के लिए मुसलमानों ने कट्टर आर्यसमाजी नेता स्वामी श्रद्धानंद को दिल्ली की जामा मस्जिद के टिंबर से अपना उपदेश सुनाने हेतु आमंत्रित किया तो अमृतसर में सिखों ने स्वर्ण मंदिर की चाभियाँ मुसलमान नेता डा0 सैफुद्दीन किचलू को सौंप दी। इसमें कोई शक नहीं कि अंग्रेज जाते-जाते भारत को दो टुकड़ों में बाँट गये पर धर्म के आधार पर उनका द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त सफल नहीं हुआ। पाकिस्तान ने अपने को एक मुस्लिम राष्ट्र के रूप में भले ही स्थापित कर लिया हो, पर आज भी भारत में पकिस्तान से ज्यादा मुसलमान बसते हैं। निश्चिततः सामाजिक एवं साम्प्रदायिक सद्भावना का इससे ज्वलन्त उदाहरण कोई नहीं हो सकता।

भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेद भी इस भावना को समाहित करते हैं। संविधान में कर्तव्यों की सूची में भी सुनिश्चित किया गया है कि-’’भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे एवं हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे व उसका परिरक्षण करे।‘‘ हर वस्तु के दो आयाम होते हैं। अगर विभिन्न जातियों, धर्मों आदि ने भारतीय संस्कृति को पल्लवित किया है तो समय-समय पर इसी विभिन्नता के कारण भारतीय संस्कृति को चोट भी पहुँची है। समाज के विभिन्न द्वेषी वर्गांे ने इस विभिन्नता को नकारात्मक रूप में इस्तेमाल कर सदैव अपने हित में इस्तेमाल करना चाहा है। पर शिक्षा और जागरूकता के प्रसार के साथ ही इन नकारात्मक तत्वों का प्रभाव क्षीण होता गया है।

आज समग्र विश्व उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और साइबर वल्र्ड के कारण सिमटता जा रहा है। ऐसे में सामाजिक-साम्प्रदायिक विभेद को बढ़ाने वाले किसी तत्व को उचित ठहराना सम्भव नहीं। बचपन से ही एक दूसरे के धर्मग्रंथों और धर्मस्थानों के प्रति आदर का भाव पैदा करके अगली पीढ़ियों को इस विसंगति से दूर रखा जा सकता है। समाज में हमारे बीच ही तमाम ऐसे उदाहरण है जो सद्भाव की इस भावना को दृढ़ता प्रदान करते हैं। शेख सलीम चिश्ती और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाहों पर जिस श्रद्धा से मुसलमान जाते हैं, उसी श्रद्धा से हिन्दू भी। कानपुर में स्थित शिव हनुमान संतोषी माता मन्दिर और एक मिनारी मस्जिद की दीवारें एक ही हैं तथा एक ही कुएं से पुजारी और मौलवी दोनो पानी पीते हैं। कानपुर देहात के मकनपुर अवस्थित सूफी हजरत सैयद बदीउद्दीन जिंदाशाह की मजार हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए समान रूप से आस्था का केन्द्र है। बीते करीब छह सदी से मुसलमान जहाँ हिजरी कैलेण्डर के अनुसार 17 जमीदुल अव्वल को उर्स वहीं हिन्दू वसन्त पंचमी को बाबा की पुण्यतिथि मनाते हैं। बिहार के भागलपुर जिले के आमापुर गाँव में स्थित सूफी संत की दरगाह की देखभाल एक हिन्दू करता है तो आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम् जनपद के टुनी कस्बे में स्थित पायकराओपेटा के दुर्गा मन्दिर में एक मुस्लिम पुजारी है, जो संस्कृत में मंत्रों का उच्चारण कर सभी कर्मकाण्ड शास्त्रीय ढंग से सम्पन्न कराता है।

कर्मकाण्ड हेतु विख्यात बनारस की डाॅ0 नाहिद आब्दी मुस्लिम धर्मानुयायी होने के बावजूद संस्कृत में मास्टर डिग्री लेने के बाद वेद जैसे कठिन विषय पर पी0एच0डी0 की है। मिर्जा गालिब की ‘मसनवी चिरागे दैर’ का वे ‘देवालयस्य दीपः’ नाम से संस्कृत में अनुवाद कर चुकी हैं और रहीम की रचनाओं को संस्कृत में बिल्कुल अलग अन्दाज में पेश कर चुकी हैं। बनारस के ही महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ की छात्रा नाजनीन ने हनुमान चालीसा का उर्दू में अनुवाद करने के बाद अब रामचरित मानस को भी उर्दू में लिखना आरम्भ कर दिया है। नाजनीन का मानना है कि इतिहास ने उसे साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने हेतु यह कदम उठाने की प्रेरणा दी, जहाँ बादशाह अकबर ने रामायण व महाभारत का अनुवाद अरबी-फारसी में कराया था। पूर्व राष्ट्रपति ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम जिस श्रद्धा से कुरान पढ़ते थे उसी श्रद्धा से गीता भी पढ़ते थे। प्रख़्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान ने बनारस में गंगा तट पर अवस्थित मंगला गौरी मंदिर से शहनाई वादन की शुरूआत की, वे मुहर्रम के गमीं अवसर पर भी उतनी ही शिद्दत से शहनाई बजाते थे। निश्चिततः सामाजिक व साम्प्रदायिक सद्भाव के इससे अच्छे उदाहरण नहीं हो सकते। जाति-धर्म की सीमाओं से परे हम सिर्फ एक मानव हैं, जब तक यह सोच रहेगी तब तक सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना कायम रहेगी। मशहूर शायर मोहसिन काकोरवी ने इस सद्भाव की भावना को शब्दों में यूं सँजोया हैै-

गर तेरा इज्न हो तो ब्राह्यण करे वजू,
गंगा नहाए शेख, बेकार जुस्तजू।

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