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बिहार में नीतीश की बहार

फिर से एक बार हो नीतीशे कुमार हो


  त्वरित टिपण्णी

मोदी को नीतीश का जवाब 

जीत के बाद पहली तस्वीर

जीत के बाद पहली तस्वीर

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे ने साफ़ कर दिया है कि मोदी का जलवा पूरी तरह बिहार में धूमिल हो चूका है. ‘मोदी बनाम नितीश कुमार ‘ लोकतंत्र के इस महायुद्ध में मोदी के अहंकार चूर-चूर होता दिखा. जिस प्रकार से मोदीअहंकार ने देश को अपने चपेट में लेकर चलना शुरू किया था, यह लोकतंत्र के लिए भारी खतरे का संकेत दे रहा था. लेकिन सदा की तरह बिहार ने इस बार भी देश के राजनितिक भविष्य के फैसले में अपनी भूमिका सकारात्मक रूप से बखूबी निभाई है. बिहार और बिहार की जनता ने बड़ी सूझबूझ के साथ वोट कर मोदी के बढ़ते अहंकार (हिटलरशाही ) को नेस्तनाबूद कर दिया.
देश के प्रधानमंत्री देश और देश के लोकतंत्र की गरिमा को ताख पर रखकर व्यक्तिगत रूप से लोकतंत्र के इस महापर्व को  हर प्रकार से लफ्फाजी से भरा युद्ध का मैदान बना दिया था. उनके मत्री, नेता भाषण के दौरान पेट में पड़े कुसंस्कारी मवाद और जहर उगलना शुरु कर दिया था. ऐसा आजाद भारत के इतिहास में अब तक देखने को नहीं मिला. देश में सांप्रदायिक माहौल ख़राब करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ा गया. घृणा की राजनीति और अच्छे दिनों के झूठे सपने बेचने के झूठे  वादे करने में माहिर मोदी जी जिस प्रकार से चुनाव कम्पैन करते हैं. वह एक सड़क छाप मदारी जैसा ही लगता है. मोदी जी अपने भाषण में मदारी की तरह ही दर्शक से हामी भरवाते दिखते हैं , लेकिन इस बार उनका मदारीपन के झांसे में बिहार की जनता नहीं आई. – झांसे में नहीं आएंगे, का नारा ने मोदी को बिहार में बूरी तरह परास्त कर दिया. मोदी जी के आते ही देश में जिस प्रकार से गरीबो की थाली से उनका रुखा-सुख भोजन गायब होता दिखा, वह उनके चुनावी वादे पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है. क्या मोदी जी एवं उनकी पार्टी अब भी चेतेंगे या वही ‘अच्छे  दिन’  और फिल-गुड करते  रहेंगे? बिहार विधानसभा चुनाव नतीजे से कुछ सबक भी लेंगे कि ‘ये पब्लिक है सब जानती है’ इन्हें झूठे सपनों के झांसे में नहीं रखा जा सकता!

नीतीश की बहार

नीतीश की बहार

मोदी सरकार ने बड़ी चतुराई से विकाशील देश में जिस प्रकार से गरीब जनता के घर के एक-एक पाई को बैंक में डलवाने. चाहे बीमा के नाम पर हो या जनधन योजना के नाम पर यह सब जनता को कंगाल बनाने की राह प्रशस्त करने जैसा ही है, क्योंकि हमारा देश अभी इस वाव्स्था के अनुकूल नहीं है. बी-जी-पी सरकार की चाल और चरित्र से जाहिर होता है कि यह  सरकार कार्पोरेट घराने की सरकार है जो हर काम इवेंट प्रबंधन के तहत होता है.
ऐसा नहीं है कि जीत हासिल करने वाली महागठबंधन की सरकार बिहार के भाग्यविधाता होगी. आजादी के बाद चाहे जिसकी भी जीत हुई है. अंततः  हमेशा से जनता ही हारती रही है. चाहे नीतीश सरकार हो या लालू सरकार या कांग्रेस की आजादी के बाद की शुरूआती सरकार. सभी ने मिलकर भारतीय जनता को बेवकूफ बनाती आ रही है, लुटती रही है. सभी पार्टियां देश की जनता को धोखा देने में हर प्रकार के उपाय  करती रही है. मुझे तो ताज्जुब होता है की जनता अपनी ताकत पर भरोसा न कर किसी न किसी पार्टी का गुलाम  बनी रहती है आखिर क्यों? इस प्रश्न का जवाब भारतीय जनता को खोजना चाहिए. इसी में उनकी भलाई छुपी हुई है.  लेकिन जनता भी क्या करें, हमारे देश का संविधान और कानून अभी भी अंग्रेज और मुगलकालीन ही है. व्यवस्था भी उनकी की ही पेटर्न पर अभी तक अग्रसर है ऐसे में जनता के पास कोई विकल्प नहीं बचता. भारत की डरी हुई जनता हमेशा ऐसी व्यवस्था में पार्टी और सरकार के हाथों ब्लैकमेल होती रहती है.
जातिवाद. धर्मवाद और नस्लवाद की  शिकार जनता  से ये चतुर नेता और पार्टियाँ वोट प्राप्त

राजनीती के तीन दिग्गज

राजनीती के तीन दिग्गज

करने के बाद अपना चरित्र बदल कर पहलवान छलिया के  रूप में नए अवतार ले लेती है. तरह-तरह के टैक्स जनता पर लाद कर अपना घर भरने का काम करती है, महंगी गाड़ी. हवाई सफ़र, मुफ्त में सारी सुविधाएँ भोगीने में लग जाती है. विदेश यात्रा और बैंक बलेंस बढाने में लग जाती है. फिर जनता फ्रश्ट्रेशन का शिकार हो  लालची और स्वार्थी बनने पर मजबूर हो जाती है. नतीजा. वोट एक कर्ज की तरह उनके कलेजे पर हावी रहता है उसे  चुनाव में उतारने की खातिर तत्पर रहती है. लेकिन थोड़ी चेतना और जागरुकता अपने में जगाई जाये तो इस नीम लाचारी के जाल को तोडा जा सकता है.
इसके विपरीत  कभी-कभी जनता अपनी जागरूकता का प्रदर्शन भी  करती है. जिस प्रकार से आज बिहार चुनाव के नतीजे आयें हैं वह तो यही संकेत देती है कि जनता  चेतती तभी है जब सर से पानी ऊपर चढ़ने लगता है. सो बिहार की जनता भी अब चेती है, ऐसी जागरूकता कायम रहे तो देश के लिए शुभकारी होगा.

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