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…बहुत काम बाकी हैं


पूरी दुनिया असहिष्णुता का दंश झेल रही है। भारत इसका कोई अपवाद नहीं है। असहिष्णुता का रूप, आकार, नाम और प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकता है। समय और काल के हिसाब से इसका प्रभाव कम और बेशी दिखता है। रंगभेद, नस्लभेद, वर्णभेद आदि इसके कई कारक हैं।
मनुष्य जब पृथ्वी पर आया होगा, उस वक्त शायद ही असहिष्णुता का दंश किसी ने झेला होगा, लेकिन ज्यों-ज्यों मानव का विकास होता गया, शिक्षित और सभ्य होता गया, त्यों-त्यों असहिष्णुता उसकी आत्मा में अपना सहस्रफन फैलाती चली गयी। राजनीतिक चेतना ने असहिष्णुता को काफी विस्तार दिया। राजनीति ऐसी टुच्ची चीज है, जिसने दुनिया को अस्थिर कर रखा है। राजनीति कारणों से ही हम आज रंगभेद, नस्लभेद, वर्णभेद, जातिभेद के शिकार बने हुए हैं।
यही कारण है कि सनातन रूप से पैदा हुए मनुष्य ने त्रास्त हो कर विभिन्न जीवन-पद्धतियाँ अपना ली। इतने पर भीं चैन नहीं आया तो अपनी सुविधनुसार होशियार लोगों ने खास तरह के समाज का निर्माण कर जीवन पðति को विभिन्न ध्र्मों का नाम देकर मनुष्य से मनुष्य की दूरियाँ बढ़ा दीं। धर्म में भी उप-धर्म और उप-धर्म में फिर जाति और जाति में फिर उप-जाति का निर्माण कर उँच-नीच का भेद पैदा कर दिया। अपनी सर्वोच्चता कायम करने के लिए अपने से भिन्न जातियों के साथ बर्बरता और क्रूरता से पेश आना शुरू कर दिया। फलस्वरूप मार-काट, अस्थिरता, नफरत और घृणा का वातावरण का निर्माण कर एक दूसरे खिलाफ इसका इस्तेमाल करना प्रारंभ कर दिया। यह सब सभ्यता के आदि काल की बातें हैं। अब आधुनिक युग में इसका रंग और भी तेजी से परवान चढ़ता हुआ दिखाई देने लगा है।
जितने भी युद्ध अब तक लड़े गये, और साम्राज्य-विस्तार की चाह में असंख्य लोगों का रक्तपात किया गया आखिर किसके लिए? यह सिलसिला अबतक जारी है। आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल, वैज्ञानिक (परमाणु और रासायनिक) हथियारों का इस्तेमाल आखिर किसके लिए और किसके पक्ष में किया जा रहा है? यह तो मानवता के खिलाफ ही है! ऐसा कोई उपाय नहीं कि बिना रक्तपात के युद्ध लड़े जायें? सभ्यता और विकसित होने का दंभ भरने वाले दुनिया के जो मुल्क हैं, वह ऐसा किसके लिए कर रहे हैं। इस पर दुनिया के शांति-पसंद लोग क्यों नहीं विश्व सम्मेलन करते? इस पर व्यापक बहस क्यों नहीं कराते। हथियारों की फैक्ट्री का आधुनिकरण क्यों किया जा रहा है? मनुष्य को मार कर दुनिया को मरघट की शांति प्रदान करने वाला वैश्विक संस्थान दुनिया के लोगों को क्यों गुमराह करता है? मानवाधिकार की बात करने वाली वैश्विक संस्थाएँ इस दिशा में एक भी शब्द क्यों नहीं बोलतीं?
चाँद और मंगल फतह का दंभ भरने वाले वैज्ञानिक शांति पहल के लिए इस दिशा में सकारात्मक कदम क्यों नहीं बढ़ाते कि दुनिया एक मंच पर अपनी अच्छी-बुरी प्रस्तुति सहिष्णुता के साथ दे सके?
असहिष्णुता का यह मामला किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया में पूरे वजूद के साथ जिन्दा है और फूल-फल रही है।
आजकल बुद्ध  की धरती पर असहिष्णुता के करवट लेने के कारण काफी हायतौबा मची हुई है। विरोध स्वरूप शांतिपंसद लोग सरकार के समक्ष सरकार द्वारा प्राप्त सम्मान या उपहार को प्रतीकात्म रूप से वापस कर रहे हंै तो सरकार को इस पर निश्चित रूप से गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस मुद्दे को गंभीरता से लेनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं दिख रहा है। कझ्छ स्वार्थी (मेरी नजर में वैचारिक रूप से दिवालिया) लोग उनमें सभी वर्ग-समूह के लोग शामिल हैं, सरकार को अपना समर्थन देकर असहिष्णुता के मूल भाव को ही समाप्त करने की कुत्सित  चाल चल रहे हैं। यह भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। इस संकेत को सभ्य समाज को भी समझने-परखने की जरूरत है।
हम सभी को यह ज्ञात है कि भारत के ध्रतीपूत्र बुद्ध , और महावीर ने इसी असहिष्णुता की वजह से ही अपना धर्म (जीवन पद्धति) परिवर्तन कर दुनिया को एक नई राह दिखाई, जीने के लिए नई जीवन पद्धति प्रतिपादित की। अहिंसा का संदेश जनमानस में भरने की कोशिश की। लेकिन उनकी कोशिश को स्वार्थी लोगों ने असफल कर दिया वह इसलिए कि उनकी सुझाई अहिंसा के मार्ग सरल नहीं हैं। उसमें राजनीति को आसानी से घुसने का अवसर मिलता है और फøलने-फलने की आजादी रहती है। और राजनीति की आत्मा में ही हिंसा विद्यमान रहती है।
यही कारण है कि असहिष्णुता को इतनी आसानी से कोई भी समाप्त नहीं कर सकता। हमारा व्यवसाय-परक अ-सभ्य समाज भी नहीं। सत्य की राह पर लोग चलना आसानी से नहीं चाहते। यह एक गंभीर मुद्दा है इसपर गहन विचार की हमें जरूरत है।
आपको यह भी ज्ञात होगा कि भारत की आजादी की लड़ाई को जिताने वाले अहिंसा के पुजारी महात्मा गांध्ी के आदर्श और सहिष्णुता के मूलभाव को, देश के बँटवारे के जिम्मेवार लोगों (संस्थाओं) ने, जिस प्रकार से हिंसा का तांडव देश में करवाया। इनके कारण कितने मासूमों, अबलाओं, निर्दोषों की जानें चली गयीं। घर के घर, परिवार के परिवार उजर गये। एक दूसरे से बिछड़ गये। इससे हासिल क्या हुआ? अब तक उस त्रासदी का दंश हम झेल रहे हैं। फिर भी हमने अब तक सीख नहीं ली। एक हिंसक संस्था के पक्षधर ने अंततः महात्मा को भी हिंसा का शिकार बना लिया। ऐसी उन्मादी राजनीति को संरक्षण देने वाली सामाजिक संस्था के रहते हुए देश में सहिष्णुता का वातावरण कायम करना कैसे मुमकिन होगा? अपने को राष्ट्रधर्मी बताने वाली संस्था का चरित्र मानवता के खिलाफत का हो, उससे हम क्या उम्मीद करें। घृणा की राजनीति करने वाले लोगों के समक्ष इस देश में सच बोलने वालों की जान और इज्जत महफøज कैसे रह सकती है? जब गांधी इस देश में सुरक्षित नहीं हैं, उनके विचार संरक्षित नहीं है, उनका आचार-आदर्श सुरक्षित नहीं हैं, तो इस देश का मालिक भगवान ही हो सकता है। इन लोगों ने तो भगवानों के साथ उनके नाम पर छल-बल और राजनीति के साथ-साथ व्यापार भी बड़े पैमाने पर जारी कर रखा है। बावजूद इसके देश का राजकाज और समाज जिन्दा है तो वह बापू, (महात्मा गांधी) के विचार और सिद्धांत के कारण ही। बापू के आदर्श विचार और सिद्धांत के अनुरूप ही हमें अपने आचार-व्यवहार और चरित्र में परिवर्तन करने की जरूरत है। तभी इस भारत देश से असहिष्णुता का लोप हो पायेगा। इसके लिए बड़े परिवर्तन की जरूरत है और जरूरत है सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वर्तमान सामरिक नीतियों के मूल में परिवर्तन करने की। ऐसा पूरे विश्व को करने की जरूरत है। तभी असहिष्णुता को हम दुनिया से समाप्त कर पायेंगे। इसके लिए वैश्विक स्तर पर पहल करने की आवश्यकता है। किसी एक देश के बदलने से कझ्छ हासिल नहीं होने वाला। आज हम आतंकवाद की विभीषिका से जिस प्रकार जूझ रहे हैं, वह भी असहिष्णुता का बड़ा आकार और एक प्रकार है। इस विषय पर पूरी दुनिया को सोचने की जरूरत है। यदि इस दिशा में हम पहल के लिए पहला कदम बढ़ाते हैं तब भी बहुत काम अभी बाकी हैं बापू के छोड़े हुए, जिसे हमें पूरा करना है।
प्रधन संपादक

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