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पांचवां चरण चुनाव का और 51% कुपोषित, शर्मिंदा है बिहार..!


हिमांशु झा

हिमांशु झा


बिहार विधानसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव पर है। पांचवें और अंतिम चरण का चुनाव 5 नवंबर को होने हैं। सभी दलों के तमाम आला नेताओं द्वारा विभिन्न मुद्दों के द्वारा वोटरों को लुभाने की कोशिश की गई। चुनाव जीतने के लिए कई लोक-लुभावन वादे किए गए। लेकिन किसी भी दल या उनके नेताओं को बिहार के मासूमों की फिक्र नहीं हुई। अगर हम सिर्फ पांचवे चरण की भी बात करें तो 9 जिलों के कुल 51 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं।
इस चुनाव में कई ऐसे मुद्दे उछाले गए जिसका कि राज्य के विकास से कोई लेना देना नही है। बिहार से कोसो दूर उत्तरप्रदेश के दादरी में हुए गोमांस से बिहार का कोई लेना-देना नहीं था। अपने राजनीतिक हित साधने के लिए तमाम दलों द्वारा राज्य की स्वास्थ्य व शिक्षा जैसे कई विकास के मुद्दों का गला घोंट दिया गया। अगड़ा-पिछड़ा, हिंदू-मुस्लिम जैसे मुद्दों से जनता के आंखों पर पट्टी बांधने की भरसक कोशिश की गई। कोई भी दल या नेता को बच्चों में बढ़ रहे कुपोषण स्तर का ख्याल नहीं आया। कहीं इसका वजह ये तो नहीं कि ये मासूम वोट देने के अधिकारी नहीं हैं।
राज्य का हर दूसरा बच्चा कुपोषित: भारत सरकार के महापंजीयक कार्यालय द्वारा 2014 में देश के नौ राज्यों में कुपोषण की स्थिति को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के पांच वर्ष से कम उम्र के 52 प्रतिशत तकरीबन 66 लाख मासूम कुपोषण के शिकार हैं। बिहार में तमाम विकासशील योजना के बावजूद यह आंकड़ा चौकाने वाला है। ज्ञात हो कि कुपोषण कम करने के लिए मानव विकास मिशन और बाल कुपोषण मुक्त बिहार जैसे पहल किए जा रहे हैं। फिर भी हम कुपोषण मुक्त समाज की कल्पना करने वाली कतार में काफी पीछे खड़े हैं।
आधे प्रतिशत की दर से हुआ कुपोषण के स्तर में सुधार : वर्ष 2006 के रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के 56 प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे। जबकि यह आंकड़ा वर्तमान में घट कर 52 प्रतिशत तक पहुंची है। 8 वर्षों में मात्र 4 प्रतिशत मतलब आधे प्रतिशत प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से सुधार हुआ है। समेकित बाल विकास सेवाओें के तहत बच्चों के कुपोषण को कम करने हेतु प्रयास तो किए जा रहे हैं। लेकिन यह आंकड़े सरकार के मासूमों के प्रति जावबदेही पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
बिहार की राजधानी पटना में 59 प्रतिशत बच्चे हैं कुपोषित : राजधानी पटना जहां राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक तक रहते हैं उस जिले में भी कुपोषण को लेकर भयावह स्थिती है। राज्य की तुलना में पटना में कुपोषित बच्चों का प्रतिशत ज्यादा है। राज्य का औसत जहां 52 प्रतिशत है वहीं पटना में यह आंकड़ा 59 है। बिहार में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे जहानाबाद जिले में हैं। 65 प्रतिशत। वहीं शिवहर में यह सबसे कम 35 प्रतिशत है। पूरे बिहार के लगभग 66लाख गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों में से एक तिहाई सात जिलों पटना,मुज्जफरपुर, दरभंगा, गया, समस्तीपुर और पश्चिमी व पूर्वी चंपारण से आते हैं।
46 प्रतिशत जनसंख्या है बच्चों की : 2011 जनगणना के मुताबिक बिहार में 0 से 18 साल के बच्चों की कुल संख्या 5 करोड़ 97 लाख है। जो कि बिहार की कुल आबादी का 46 प्रतिशत है। कांग्रेस, भाजपा सहित राज्य के तमाम दलों द्वारा बिहार के एक बड़े हिस्से को नजरअंदाज किया गया है।
क्या होता है कुपोषण? : शरीर के लिए आवश्यक सन्तुलित आहार लम्बे समय तक नही मिलने के कारण बच्चे व महिलाएं कुपोषण के शिकार होते हैं। कुपोषण के कारण बच्चों और महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है,जिससे वह आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। कुपोषण के कारण इनकी बिमारियों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। जिस कारण कई तरह की बिमारी आसानी से इनके शरीर में घर कर जाती है। कुपोषण की वजह से बच्चों की मानसिक व शारीरिक वृदिध रुक जाती है।
राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार के 2009 के आदेश के अनुसार सभी राज्यों को आईसीडीएस योजना को सर्वव्यापीकरण करना था। सभी अन्य पड़ोसी राज्यों, की तुलना में बिहार में अभी तक आईसीडीएस का यूनिवर्सलाइजेशन नहीं किया गया है।
कुपोषण एक गंभीर चुनौती है, सभी दलों के राजनीति से उपर उठ कर देश के भविष्य के लिए मासूमों के जिंदगी को सुरक्षित करने की चिंता करनी होगी। ये बच्चें ही हैं जो ना तो जाति को पहचानते हैं और ना ही मजहब को। उनके लिए सब एक समान है। http://khabar.ibnlive.com/ से

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