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नैतिकता का संकट


march20-15

नैतिकता और आत्मानुशासन ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को समृद्धशाली और स्वाभिमानी बनाते हैं। इन तत्त्वों के बिना समाज और राष्ट्र का जीवन अधूरा है। लेकिन हम मनुष्य नेकी की जगह अहंकार में जीने के आदि हो गये हैं। दिन-रात अनैतिक कार्य करने के लिए अपने को झोंक दिया है। अनैतिकता आज हमारे जीवन में इस प्रकार से घुल-मिल गयी है- मानो हमारे जीवन के लिए संजीवनी हो।

पिछले दिनों की बात है। एक सड़क दुर्घटना में मैं बुरी तरह से जख्मी हो गया था। उपचार हेतु मेरे एक मित्रा राज्य के सबसे बड़े अस्पताल के इमरजेंसी में मुझे लेकर आये। चिकित्सकों की सलाह पर मुझे न्यूरो विभाग में शिफ्ट किया जाना था। जाहिर है चल कर जा नहीं सकता था। इस लिए एक ट्राॅलीमैन को इसकी जिम्मेदारी दी गयी, लेकिन ये क्या! ट्राॅलीमैन ने 20 कदम चलकर एक सीढ़ी के नीचे ले जाकर यह कहते हुए छोड़ दिया कि अब आप लोग इस सीढ़ी से ऊपर रोगी को उठाकर न्यूरो में ले जायें। इसपर मेरे मित्र ने ट्राॅलीमैन से कहा कि बीच में यहाँ तुम कैसे छोड़ सकते हो? तो ट्राॅलीमैन के मुख पर एक विद्रूप-कुटिल मुस्कान उभरी। लगा कि सामने कोई रक्षक के भेष में भक्षक खड़ा हो। ऐसा अनैतिक कृत्य आखिर क्यों? इसी अस्पताल के एक चिकित्सक मित्रा ने कझ्छ दिन बाद इसी अस्पताल की व्यवस्था पर बातचीत में बताया कि फिलहाल इस अस्पताल में अव्यवस्था व्याप्त हो गयी है उसके पीछे बड़े अधिकारी और संचालक का गैरजिम्मेदराना कार्य है? इसके पहले डाॅ0 अमुक (निजता के मान को ध्यान में रखकर यहाँ नाम नहीं लिखा जा रहा है) इसके संचालक हुआ करते थे, तब यहाँ की व्यवस्था चाकचैबंद थी लेकिन वर्तमान संचालक के अनैतिक कार्य में लिप्त रहने के कारण ही नीचे के लोग कत्र्तव्यविमुख हो गये हैं। चिकित्सक मित्रा की बातों से मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हमारे आस-पास के वातावरण में अनैतिकता का जहर घुल गया है। हमारे चिकित्सक मित्रा की सोच पर नैतिक व्यक्ति को घोर आश्चर्य होगा। इनकी सोच से यहाँ पर एक बड़ा नैतिक प्रश्न उठता है कि हम ऐसा क्यों चाहते हैं कि हमारे पीछे हर पल कोई कोड़ा लेकर पड़ा रहे, हमारे कत्र्तव्य का बोध् कराते रहने के लिए। यदि अस्पताल के संचालक या फिर बड़े अध्किारी ने अपना कर्त्तव्य छोड़ दिया हो तो क्या हम भी अपने कत्र्तव्य से पलायन कर जायें? यह कैसी नैतिकता है? इसी चिकित्सक मित्रा ने मुम्बई कांड के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाते हुए तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्राी के आचरण पर प्रश्न उठाते हुए कहा था कि एक ओर जवान जनता के लिए खून बहा रहे थे, वहीं गृहमंत्राी अपने लिबास में उलझे हुए थे। मैंने कई बार महसूस किया है कि उक्त मित्रा चिकित्सक के पास मरीज घंटों उनके दरवाजे पर खड़े कराहते रहे और चिकित्सक मित्रा अपनी सुविधनुसार ही घर से निकले। उनके दरवाजे पर काॅलबेल लगा हुआ तो है लेकिन उसका विद्युत-विच्छेद कर दिया गया है। इस बावत उनसे पूछने पर पता चला कि वक्त-बेवक्त लोग काॅलबेल बजा देते हैं, इसी कारण ऐसा किया गया है। और तो और उनका मोबाइल भी रात में बन्द होता है। अब यहाँ भी एक प्रश्न उभरता है कि एक अनैतिक कार्य करने वाला दूसरे की अनैतिकता पर मौका मिलते ही हमला क्यों करता है? क्या यह नैतिक है? हम क्या पाना चाहते हैं? क्यों, आखिर क्यो? हम इतिहास से सीख क्यों नहीं लेते? कैसी मरीचिका में हम फँसे हुए हैं?

सब कझ्छ त्यागकर सिद्धार्थ  बुद्धत्व को प्राप्त होते हैं। नैतिकता की पराकाष्ठा पार कर जाते हैं। लेकिन आज के राजनीतिज्ञों ने सबकुछ पाने के लिए अपनी नैतिकता और देशकी जनभावना, उनके विश्वास को बली बेदी पर चढ़ा दिया है। अनैतिकता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढते हुए पूरी मनुष्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। इन राजनीतिज्ञों के अनैतिक आचरण के सामने नैतिकता और आत्मानुशासन के क्या मायने है कि एक जनप्रतिनिधि सत्ता की लालच में अपने क्षेत्रा की जनता के विश्वास को खण्डित करते हुए दूसरी पार्टी के साथ जा मिलता है और मौका मिलते ही पशुओं की तरह ऊँची बोली वाले के हाथों बिक जाता है। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन में इनका क्या मोल है, इन्हें महत्वहीन कर दिया गया है। इन्हीं अनैतिक राजनीतिज्ञों के कारण अब तो माँ की कोख भी अनैतिक होती जा रही है। परिणामस्वरूप माता अपने गर्भ को भी असमय समाप्त करने मंे पीछे नहीं रहतीं। बच्चा पैदा होता नहीं कि हमारे ख्वाब अनैतिकता के साथ विकासमान होने लगते हैं। भौतिक समृद्धि के ऐसे ताने-बाने मन में बुनने लगते हैं कि उसमें लेश मात्रा भी नैतिकता के अंश नहीं होते। बच्चा बड़ा होकर फिर उसी रास्ते चल पड़ते हैं। जिन्हें नैतिकता और आत्मानुशासन के पाठ पढ़ाने चाहिए वो स्वयं दिशा-भ्रमित होकर अनैतिक आचरण को अपने जीवन की सफलता मान बैठे हैं। ऐसे में राष्ट्रनिर्माता की भूमिका ही सवालों के घेरे में है। उच्च शिक्षा के अध्ष्ठिाताओं ने तो अध्मता को ही अपना ध्र्म और देवता बना लिया है, वो अम्बानी बनने की होड़ में पैसे लेकर शोध्-पत्र तैयार करने के कारखाने अपने घर में ही स्थापित कर चुके है। और उन शोध्-पत्र के प्रकाशन के नियत मापदण्ड को ताक पर रख कर कुछ अनैतिक शिक्षकों की मिलीभगत से फरेबी-पत्रिका का अवैध प्रकाशन भी अनवरत जारी कर रखा है। यह प्रतीकात्मक नंगा सच है जो सारे भारत में चल रहा है। लज्जा और शर्म-बोध् ऐसे लोगों के आचरण से कोसोंदूर हैं। और क्यों न ऐसा हो, उन्हें तो अम्बानी बनना है। ऐसे लोग साधन को ही साध्य माने कर बैठे हुए हैं। लेकिन इनके आचरण से समाज और राष्ट्र का चरित्र-पतन हो रहा है। उनकी निष्टा न सच्चे दोस्तों में और न ही अपने आस-पास के पड़ोसी के प्रति होती है। ऐसे लोगों के अनैतिक आचरण की चिन्ता न वर्तमान व्यवस्था को है न ही देश के तथाकथित रहनुमाओं को। कोढ़ में खाज निजी कारपोरेटी कल्चर है जिसने ऊपर से नीचे की सारी व्यवस्था को अनैतिक बनाकर नष्ट-भ्रष्ट कर रखा है। टारगेट पूरा करने के बदले में जिस प्रकार से भी हो कम्पनी का कार्य सम्पन्न होना चाहिए। यही इनकी संस्कृति है जिसने हमारी नई पीढ़ी के बे्रन को एक साॅफ्टवेयर में तब्दील कर दिया है। साॅफ्टवेयर के कारण पेट को अन्न तो मिलने लगा है लेकिन आत्मा मार दी गयी है। और जिसमें आत्मा नहीं, उसमें फिर नैतिकता के भाव कैसे आयेंगे और कैसे टिके रहेंगे? आज राष्ट्र की आत्मा तड़प रही है नैतिक मानव के लिए। आज न्यायिक व्यवस्था मैं नैतिकता का घोर अभाव है, जिसके कारण वर्षों बाद फैसले तो हो जाते हैं मगर न्याय नहीं होता। यदि न्याय होता तो 3 करोड़ से ज्यादा मामले लम्बित नहीं होते। इसके लिए जितना जिम्मेदार सरकार है उससे कहीं ज्यादा न्यायिक व्यवस्था भी जिम्मेदार है। तर्क यह दिया जाता है कि न्यायिक अधिकारी, जज और अन्य पर्याप्त संख्या में नहीं है तो क्यों नहीं इस पर सर्वोच्च न्यायालय संज्ञान लेता है और सरकार को बाध्य करता है कि जरूरत के हिसाब से मैनपावर दिया जाये? इसकी नैतिक जिम्मेदारी किसकी है? मुझे तो लगता है यह देश निश्चित रूप से उन्हीं की बदौलत चल रहा है जिसमें थोड़ी नैतिकता बची हुई है। उनका आचरण निष्पाप और दूसरे के सुख में सुखी रहने वाला होता है। इसी का उदाहरण है- जब मैं दुर्घटाग्रस्त हो सड़क पर पड़ा हुआ था कि एक अनजान व्यक्तिने मुझे 30-40 मूक दर्शकों की भीड़ से उठाकर अपनी कार से मेरी प्राथमिक चिकित्सा के लिए चिकित्सक तक पहुँचा कर अपनी नैतिकता के उच्चादर्श का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मेरा हार्दिक ध्न्यवाद।  ऐसे व्यक्ति पर हम सभी को गर्व है, जिनकी बदौलत नैतिक शब्द का मान जिन्दा है। अन्यथा शब्द गढ़ने वाले तो सिर्फ घृणा, फरेब और बबूल शब्द गढ़ने में ही अपनी नैतिकता समझते हैं।

अरुण कुमार झा (प्रधान संपादक )

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