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निर्भीक, स्वाभिमानी और सिद्धांतवादी संपादक थे बबनप्रसाद मिश्र


7 नवम्बर, 2015 की मनहूस शाम हम कभी नहीं भूल पाएंगे, जब छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष बबनप्रसाद मिश्र जी हम सबको छोड़ कर चले गये. उनके जाने के साथ ही पत्रकारिता का एक ऐसा शिखर ढह गया, जो हम सबके लिए प्रेरणा का काम करता रहा. नई पीढ़ी भी उनके बार में जब जानेगी तो चौकेगी कि क्या संपादक ऐसे संपादक भी होते थे? बात बहुत पुरानी नहीं है. बबनजी रायपुर के एक बड़े अखबार में संपादक थे। एक दिन बिना उनकी जानकारी के एक तेल कंपनी का पूरे पेज का विज्ञापन प्रथम पृष्ठ पर छप गया. इस बात को लेकर मिश्र जी नाराज हुए. बस्त इतनी बढ़ी कि बाद में उन्होंने वो अखबार ही छोड़ दिया. आज जैसा कितने संपादक कर पाएंगे? यह सोचने की बात हैं. तो ऐसे निर्भीक, स्वाभिमानी और सिद्धांतवादी संपादक थे बबनप्रसाद मिश्र। छत्तीसगढ़ में हिंदी पत्रकारिता को अपने खून-पसीने से सींचने वाले।

पिछले छह दशक से हिंदी पत्रकारिता में पहले जबलपुर( मध्यप्रदेश) और बाद में रायपुर (छत्तीसगढ़ ) में अपनी धमक और चमक बनाए रखने वाले श्री मिश्र से मेरा भी रिश्ता 35 साल पुराना था. मैंने अपनी पत्रकारिता की दूसरी पारी उनके सानिध्य में ही रह कर शुरू की. मनेन्द्रगढ़ में रहते हुए मैंने ”बिलासपुर टाइम्स” के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति का शौक पूरा कर रहा था, लेकिन मुझे संतोष नहीं मिल रहा था तब रायपुर की पत्रकारिता का अपना क्रेज था ही . मेरा मन भी करता था कि रायपुर के किसी अखबार से जुड़ जाऊं, तभी किसी मित्र ने सुझाव दिया कि ‘युगधर्म’ में ट्राई करो. उस समय युगधर्म एक नामी अखबार था. मैंने संपादक बबन जी को पत्र भेज दिया तो कुछ दिन बाद उनका बुलावा आ गया. ‘बिलासपुर टाइम्स’ की अनेक कटिंग्स मेरे पास थी. बबनजी उन्हें देखकर प्रसन्न हुए । साक्षात्कार जैसी हल्की-सी औपचारिकता भी हुयी और फिर उन्होंने कहा- ”फौरन ज्वाइन कर लो”. यह बात है सन 1978 के उत्तरार्ध की। मनेन्द्रगढ़ जा कर माता-पिता का आशीर्वाद लेकर और अपने कपडे-लत्ते के साथ मैं रायपुर आ गया. रायपुर में फौरन किराया का मकान मिलना संभव नहीं था, इसलिए मिश्र जी ने युगधर्म कार्यालय में ही संपादक कक्ष के साथ लगे अतिथि कक्ष में रहने की व्यवस्था कर दी. इस अतिथि कक्ष में बाहर से आने वाले कुछ लेखक -पत्तरकार भी रुका करते थे, जबलपुर के प्रख्यात कवि रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ भी वही रुकते थे . अंचल जी से मेरी भेंट वही हुई. कुछ महीने बाद मैं पंडरी में सिन्हा लाइब्रेरियन के मकान में रहने लगा. जो प्रेस से बहुत दूर नहीं था.

उस वक्त मैं 21 वर्ष का था। पत्रकारिता और साहित्य में गहरी रूचि थी। मेरे रुझान को देख कर बबनजी ने मुझे भरपूर अवसर प्रदान किये. युगधर्म के हर डेस्क में काम करने का अवसर दिया और पत्रकारिता की मेरी समझ को बेहतर दिशा दी. कुछ महीने बाद मुझे उन्होंने संभागीय प्रतिनिधि बना कर बिलासपुर भेज दिया। डेढ़-दो साल तक बिलासपुर रह कर पूरे संभाग का दौरा करके युगधर्म को जमाने का काम करता रहा. एक-दो बार बबनजी के साथ संभाग के कुछ शहरो का दौरा भी किया. एक बार वे मेरे साथ मनेन्द्रगढ़ भी आये। मेरे घर पर रुके। पिताजी ने उनकी काफी आवभगत की. बबनजी का आत्मीय व्यवहार देखकर पिताजी ने संतोष व्यक्त किया, मेरे प्रति वे आश्वस्त हो गए की ये लड़का सही जगह और सही व्यक्ति के साथ जुड़ गया है. सन 81 -82 में युगधर्म में आफसेट मशीन लग गयी, तो साहित्य का परिशिष्ट रायपुर से प्रकाशित होने लगा. पहले ये परिशिष्ट नागपुर से छप कर आता था. मेरी साहित्यिक रूचि देखते हए मिश्रजी ने मुझे रायपुर बुलवा लिया और साहित्य संपादक बना दिया. बाद में मैंने सिटी रिपोर्टिंग भी की. यह वह दौर था, जब एक पत्रकार अनेक मोर्चो पर तैनात कर दिया जाता था. वक्त आने पर बाजार भाव भी लेना पड़ता था. इन सब कामो में मुझे बड़ा आनंद आता था. बबन जी ने मुझे अनेक सुंदर अवसर प्रदान किये. जैसे कला-साहित्यिक गतिविधियों की रिपोर्टिंग करना. सामयिक विषयों पर सम्पादकीय लिखने का मौका और सम-सामयिक मुद्दों पर लेख लिखने की प्रेरणा. व्यंग्य साहित्य में मेरी रूचि देख कर उन्होंने मुझसे न केवल व्यंग्य लिखवाए वरन ”देखी-सुनी” नामक व्यंग्य-स्तम्भ लिखने का सुअवसर भी प्रदान किया. कहने का मतलब यह कि बबनजी के प्रोत्साहन और फ्री-हैण्ड के कारण ही मैंने अपने लेखन कर निरंतर मांजने का काम किया। यह कहने में संकोच नहीं है है कि अगर बबनजी जैसे योग्य सहृदय संपादक न मिलते तो शायद मैं पत्रकारिता और साहित्य में वो सब न कर पाता जो आज तक कर सका. आज तो संपादक बुद्धिहीन हो गए हैं. अपने अधीनस्थ से अभद्र व्यवहार करते हैं मगर जब मैं बबनजी को आज याद कर रहा हूँ तो सच कहता हूँ उन्होंने मुझसे कभी दिल दुखाने वाला व्यवहार नहीं किया. अगर मुझसे कहीं कोई चूक हुयी तो प्रेम से समझाया ही.

१९८४ के अंत में जब एक अन्य अखबार ‘नवभारत’ से मेरे पास बुलावा आया तो मैंने बबनजी को उसकी जानकारी दी. उस वक्त युगधर्म संक्रमण काल से गुजर रहा था,. बबनजी ने मुझे रोका नहीं, वरन बधाई दी। मैंने नवभारत ज्वाइन कर लिया.तो मुझे वहाँ काम करने में कोई दिक्क़त नहीं हुयी क्योंकि बबनजी के मार्गदर्शन में मिला ”युगधर्म’ का कुशल अनुभव मेरे पास था. मैं नवभारत में सभी संस्करणों का साहित्य संपादक बना. बाद में सिटी चीफ के रूप में भी काम किया। दस साल तक नवभारत में काम करते हुए मैं अक्सर बबनजी से मिलता रहा. उनके घर आना-जाना लगा रहता था. उनके पुत्र गिरीश और सतीश मुझे और बाकी मित्रो को चाचा जी कह कर बुलाते थे। (आज भी उसी तरह आदर देते हैं.) उस पूरे परिवार से गहरा आत्मीय सम्बन्ध जो युगधर्म के समय से बना, वो आज तक कायम है. बबनजी के छोटे भाई सुभाष मिश्र उर्फ़ ‘राजू’ के साथ तो मैंने हिंदी में एमए किया। सुभाष आज भी मेरा प्रिय मित्र है. युगधर्म में काम करते हुए मैंने छत्तीसगढ़ महाविद्यालय के रात्रिकालीन चम्पादेवी महाविद्यालय में एमए किया. बाद में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय से बीजे भी किया. ऐसा इसलिए कर सका कि बबनजी ने प्रोत्साहित किया। जब बीजे में मैंने प्रावीण्य सूची में टॉप किया तो मिश्रजी ने मुझे मिठाई खिलाई और कहा- ”तुमने हम सबका सर गर्व से ऊंचा कर दिया है.”

आज जब बबन जी नहीं हैं, पुरानी यदि एक-एक करके सामने आ रही हैं. किसके पकडूँ, किसको छोड़ूँ, समझ में नहीं आ रहा है. अपने संस्मरणों की एक किताब जो लिख रहा हूँ, उसमे विस्तार से उन यादों को समेटूंगा. फिलहाल बबन जी को नमन करता हूँ। हमारी पीढ़ी के अनेक मित्र उनको याद करते हैं कि उनके साथ रह कर हम लोगों ने पत्रकारिता की तमीज सीखी. पांच साल तक मैं साहित्य अकादमी, दिल्ली का सदस्य रहा। उसके बाद संस्कृति विभाग ने तीन नाम साहित्य अकादमी को भेजे, इनमे एक नाम बबनजी का भी था. जब अकादमी में मेरे पांच साल पूर्ण हुए तो मुझसे ही पूछा गया कि तीन नामो में कौन-सा उपयुक्त है, तो मैंने बबनजी का ही नाम लिया. और वे साहित्य अकादमी के हिंदी परामर्श मंडल के सदस्य बन गए. इस बात से वे बहुत खुश हुए, उन्होंने मुझे खीर खिलायी और बोले-”अब दो-दो गिरीश का मुझे सहारा है.” उनकी इस बात ने मुझे भावुक कर दिया.

पत्रकारिता के साथ-साथ बबनजी के भीतर का मौन साहित्यकार भी समय के साथ मुखरित हुआ. और उन्होंने अपना एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया. मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने अपनी पाण्डुलिपि मुझे दिखाई और सुझाव मांगे। यह उनका बड़प्पन ही था. उसके बाद उन्होंने एक उपन्यास भी लिखा. और पत्रकारिता के अनुभव वाली पुस्तक भी. वे यह देख कर बेहद प्रसन्न हुए कि उनके पुत्र गिरीश ने भी साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण कर दिया। गिरीश ने कमाल किया. उसने दो उपन्यास लिख कर न केवल पिता को वरन हम सबको सुखद आश्चर्य में डाल दिया. मैं आज सोचता हूँ कि एक पिता अपने पुत्र में कब, कैसे प्रवेश कर जात्ता है, पता ही नहीं चलता. बबन जी उम्र के ७८ बसंत देख चुके थे. बीच- बीच में उनकी तबीयत भी खराब हो जाती थी, पर वे सतत साधनारत रहते थे। निरंतर लिखते थे। इधर-उधर उनके लेख भी प्रकाशित होते थे। बीच में जब उनकी तबीयत कुछ अधिक खराब हुयी तो मैं उनसे मिलने पहुँचा. तब उन्होंने कहा था- ”मुझे कोई शीघ्रलेखक दिला दो तो उसे डिक्टेट करके लेख वगैरह लिखवा दिया करूँगा।” उनकी इस जीवटता को मैंने प्रणाम किया।

एक दिन सबको जाना है. यहाँ रहने के लिए आया ही कौन है, मगर जब मनुष्य की मृत्य कर्म के मोर्चे पर तैनात रहने के दौरान होती है तो लोग उसका स्वागत करते हैं. पत्रकारिता और साहित्य का यह साधक जब गया, तो ‘वृन्दावन सभाभवन’ में ”साहित्य और समाज” जैसे विषय पर अपने विचार व्यक्त करने पहुंचा था. हालांकि परिचर्चा के ठीक पहले टीवी के लोकल चैनलो के माध्यम देश में जो कुछ अप्रिय घटित हो रहा है, उस पर चिंता व्यक्त कर चुके थे, पर परिचर्चा में भी लोग उन्हें सुनना चाहते थे . वे कुशल वक्ता थे. उनको सुनना हम सबको अच्छा लगता था, मगर 7 नवंबर को यह संभव न हुआ. कार्यक्रम शुरू होने के कुछ समय बाद ही बबनजी अचानक उठ खड़े हुए और घर जाने की अनुमति मांगी, उन्हें हम लोग बाहर तक छोड़ने भी आए मगर कुछ कदम चलने के बाद वे आगे न बढ़ सके. उन्हें कुर्सी बिठाया गया. तब तक सबके आ गया था कि उनको अटैक आया है. दुर्भाग्य से उस दिन जीभ के नीचे रखने वाली गोली बबनजी के पास नहीं थे, जो वे अक्सर साथ रख निकलते थे. मित्र गोपाल अग्रवाल फौरन दवाई दुकान जा कर वो गोली ले कर आए.मगर हालत जस-की-तस ही बनी रही. तब मैंने सुझाव दिया कि इन्हे कुर्सी सहित उठा कर कार तक ले चलते हैं. कार तक ले जाते वक्त उनकी गर्दन इधर-उधर हो रही थी. उसे मैं संभाल रहा था. उनकी गार्डन पसीने से गीली चुकी थी. वेदना से वे कराह रहे थे. उन्हें किसी तरह कार के भीतर लिटाया गया, फिर पास के ही एक निजी अस्पताल में ले गए, लेकिन तब तक वे हम सबसे दूर, बहुत दूर चले गए. अब उनकी यादें हमारे साथ हैं, उनका मृदुल व्यवहार हमारे साथ है, उनका संघर्ष हमारे साथ है, उनका वह प्रदेय हमारे साथ है, जो आज की वर्तमान पीढ़ी के संपादक तो किसी भी हालत में नहीं दे सकते. बबनजी जैसे प्रखर राष्ट्रवादी संपादको की पीढ़ी तो अब लुप्तप्राय हो गयी है. एक कड़ी बची थी, वह भी टूट कर बिखर गयी. बबनजी, आपको मेरा अश्रुपूरित अंतिम प्रणाम।

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