Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक
Rajiv Anand
राजीव आनन्द
संपादक
Vinay Kumar Mishra
विनय कुमार मिश्र
संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

नवल किशोर कुमार की कविता


ये इश्क नहीं है आसान प्रिये
तुम कल्पना, मैं कड़वा यथार्थ हूं,
तुम जीवन, मैं मुसीबतों का पहाड़ हूं
इसलिए, ये इश्क नही है आसान प्रिये।
तुम अनन्त, मैं शून्यता का प्रमाण हूं
तुम ज्योति, मैं चहुंओर फ़ैला अंधकार हूं
इसलिए, ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।
तुम अर्चना और उपासना जैसी हो,
मैं विधुर अर्द्ध कुमार हूं
तुम सोलह साल की मराठन बाला हो,
मैं लालू का रिश्तेदार हूं
तुम राजनीति की ऐश्वर्या हो,
मैं नौटंकी का एक किरदार हूं
इसलिए ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।
तुम सत्ता की मीठी चासनी हो,
मैं नीतीश जैसा खट्टा आचार हूं
तुम नरेंद्र मोदी की गर्मागर्म चाय हो,
मैं मुलायम जैसा बासी आहार हूं
तुम बिजली तुम ऊर्जा हो
मैं लोडशेडिंग का शिकार हूं
इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।
तुम कोसी की तेज लहरें हो
मैं सुशासन का बाढ हूं
तुम सरकारी फ़ैमिली पैक राहत हो
मैं पीड़ितों का खंडित जीवनाधार हूं
तुम बांध बनाने वाली कंपनी हो
मैं बाढ में डूबा एक इंसान हूं
इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।
तुम चुनावी घोषणापत्रों की जान हो
मैं सरकारी आदेशों के उपेक्षा का शिकार हूं
तुम अफ़सर लोगों के टेबल की शोभा हो
मैं आम आदमी का धुल खाता दरखास्त हूं
तुम नेताजी की लक्ष्मी हो,
मैं नगर निगम का चौकीदार हूं
इसलिये ये इश्क नहीं है आसान प्रिये।

दामिनी के नाम

हर रोज जन्मती और दम तोड़ती है
कहीं न कहीं एक या फ़िर अनेक दामिनी
कभी कहीं कोई जबरन उसकी अस्मत लूटता है
कानून अपने पन्ने फ़ड़फ़ड़ाता है
थाना वाले दामिनी की लाश से
वारदात का पूरा हाल पूछते हैं
देश का राजा मुंछों पर ताव दे
अखबारों में अपना नाम छपवाता है।

दामिनी तब भी न कुछ बोली थी
अब भी कहां कुछ बोलती है
समाज कहीं उसे तिरस्कृत न कर दे
न्यूज चैनलों पर चोरी छुपके कहती है
समाज दोनों कान के परदे नहीं गिराता
झट से चैनल चेंज कर लेता है
दामिनी की बात आने पार कभी कभी
मोमबत्तियां ले समाजसेवा के शौक आजमाता है।

दामिनी फ़िर आज और कल
और शायद हर दिन अवतरित होगी
कहीं किसी झाड़ी में फ़ेंकी हुई उसकी लाश मिलेगी
कभी किसी ट्रेन या बस या फ़िर किसी होटल के लिफ़्ट में
अपने आपको सम्भालते कातर निगाहों से देखेगी
समाज फ़िर उसे ही “दामिनी” कह उसका तिरस्कार करेगा
लेकिन “दामिनी” समाज के लिए
अपना मुंह बंद रखेगी
अखबारों में उसकी खबरें पढ
समाज की आंखें नहीं चुंधियायेंगी
वह तो “टी विद न्यूज” के मजे लेगा
जरुरत पड़ने कर कभी-कभी चर्चे भी करेगा
हां भाई एक दामिनी थी
आज ही के दिन बेचारी…।

Comments are closed.

Youtube
Sensex

अन्य ख़बरें

Submit Your Article

Copyright © 2015. All rights reserved. Powered by Origin IT Solution