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धरती जीने और संसद चलने लायक लायक कैसे होगी ?

सीता राम शर्मा " चेतन "


 मानव जिंदगी का अंतिम सच मृत्यु है और पूरा सच सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए इसकी वह अनंत सार्थकता है जिसे उसे पूरी मानवीय ईमानदारी के साथ जीने में सफल होना होता है। मानव होकर इस पूर्ण मानवीय ईमानदारी के साथ जीने का प्रयास करने वालों की संख्या दुर्भाग्य से अभी धरती पर कम है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय कलाम साहब अपनी अंतिम यात्रा के समय जिन दो बातों को लेकर ज्यादा चिंतित थे वो यह थी कि धरती को जीने लायक कैसे बनाया जाए और भारतीय संसद कैसे सुचारू रूप से चले ? एक शिक्षित,सभ्य,विकसीत और विश्व के लिए कल्याणकारी राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण का सपना उनके रोम – रोम में बसा था। वे जानते थे आदिकाल से चली आ रही रूढ़ियों,सामाजिक विसंगतियों और आधुनिक आवश्यक मानवीय संसाधनों की कमियों के बावजूद विश्व बंधुत्व की आत्मीय भावना वाले इस देश को यदि दुनिया में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाना है, जिसका वह सदियों से अधिकारी है तो इस देश के भविष्य रूपी नन्हें बच्चों और असीम ऊर्जा से भरे युवाओं को सही मार्ग पर अग्रसर करना होगा। उन्हें बड़े सपने देखने और दिखाने के योग्य बनाना होगा। उन्हें सपनों को पूरा करने का रास्ता दिखाना होगा। वे जानते थे इस देश की मिट्टी में आत्म शक्ति भरी पड़ी है। जरूरत है तो बस उस दिव्य शक्ति को सही दिशा देने की। वे जीवन के अंतिम क्षणों तक इसी काम में लगे रहे। धरती को जीने लायक बनाने के लिए जल ,वायु, ध्वनि प्रदूषण के साथ – साथ वृक्षों-जंगलों और निरीह पशु – पक्षियों पर हो रहे अत्याचारों पर ध्यान जाता है, जिसकी दोषी मनुष्य जाति है। इसी मनुष्य जाति ने विकास के नाम पर स्वार्थ,घृणा और हिंसा का जो माहौल बनाया है और उसके परिणाम स्वरूप दुनिया को जिस आतंक के साये में ला खड़ा किया है, वह सार्वधिक चिंतनीय है। संक्षिप्त में कहा जा सकता है कि धरती को यदि जीने लायक बनाना है तो सबसे पहले धरती के मनुष्यों को जीने लायक बनना होगा ! यह अकाट्य सत्य है कि आज हमारी दुनिया की बड़ी मानवीय आबादी अपने मानवीय शरीर और धरती के पर्यावरण के विरुद्ध आचरण कर रही है। इसमें क्रांतिकारी बदलाव लाना जरूरी है। अब सवाल यह उठता है कि यह बदलाव आएगा कैसे ? निःसंदेह शुरूआती तौर पर विचारों को बदलना, मानवीय सोच को बदलना प्राथमिकता के साथ आवश्यक है और ऐसा करते हुए हमें प्रथम दृष्टया कई अमानवीय लगते कठोर मानवीय फैसले भी लेने होंगे। घृणा,नफरत और आतंकवाद के विरुद्ध हमे एक कठोर वैश्विक संविधान बनाना होगा। जिसकी मॉनिटरिंग कमिटी के लिए वर्तमान संयुक्त राष्ट्र से सहस्र गुना ज्यादा प्रभावशाली एक वैश्विक संस्था को अस्तित्व में लाना होगा क्योंकि आज के वर्तमान आतंकवाद का जो परिदृश्य और इसके पीछे का घिनौना चेहरा है,उसमे मनुष्यता के सुधार के दायरों को लांघ चुके कई लोगों,गिरोहों,देश की सरकारों का ऐसा हुजूम है जिनके विरुद्ध पूरी दुनिया का हित चाहने वाले लोगों और देशों को संगठित होकर कठोर कदम उठाना जरूरी है। मानवता और दुनिया के हित के लिए यह काम मनुष्य जाति को देर – सबेर करना ही होगा। धरती के मनुष्यों और इसके पर्यावरण की रक्षा के लिए कुछ कठोर फैसले लेने होंगे और इसके लिए इन्हें अपने कुछ तुच्छ स्वार्थों की तिलांजलि भी देनी ही होगी। यदि ऐसा हुआ तो सचमुच धरती जीने लायक हो सकती है। कलाम साहब अंतिम यात्रा के दौरान इस बात पर चिंतित थे कि देश की संसद सुचारू रूप से कैसे चले ? वे जानते थे कि यदि संसद समयबद्ध तरीके से नही चलेगी तो देश और लोकहित का बड़ा नुकसान होगा। भारतीय राजनेताओं के गिरते चरित्र और बोझिल होते कर्तव्यबोध से वह भलीभांति परिचित थे। विशेषकर कुछ सत्तालोभी अहंकारी और कथित धर्मनिरपेक्ष ढोंगियों के द्वारा जिस तरह पिछले दिनों संसदीय कार्य को बाधित किया गया, उससे उन जैसे राष्ट्रहित का चिंतन करनेवाले ईमानदार सेवक का चिंतित होना लाजमी था। अपने अस्तित्व को बचाने में असफल संघर्ष करती कॉंग्रेस जिस तरह राजनितिक रूप में एक अयोग्य खानदानी बड़बोले कुमार के हाथों की कठपुतली बनी चाटुकारिता के गर्त गिरती जा रही है और समाजवाद का चोला पहने नेताओं की समझ देश – समाज से विमुख होती जा रही है, यह गहरी चिंता का विषय है। इसलिए भी कि राष्ट्र को एक ईमानदार सत्तापक्ष के साथ – साथ राष्ट्रहित का पक्षधर सशक्त विपक्ष भी चाहिए। फ़िलहाल ये पार्टियां इस योग्य भी नहीं दिखती। वर्तमान परिस्थितियों में अतित की सारी वर्जनाओं से बाहर निकलकर इन्हें देश और संसद की मर्यादा बचाने और बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रयासधर्मिता में हर एक सांसद को सबसे पहले अपनी राष्ट्रीय और लोकहित की जिम्मेवारियों के प्रति उत्तरदायी होना होगा। स्वहित और पार्टी हितों से ऊपर उठकर जनता और राष्ट्र का ख्याल करना होगा। भारतीय राजनेताओं को यदि अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने योग्य बनाना है। संसद और विधानसभा – राज्यसभा की मर्यादा के रक्षक के तौर पर विकसित करना है। जनता और राष्ट्र के प्रति पूर्ण ईमानदार और जिम्मेवार बनाना है तो निःसंदेह सबसे पहले इन्हें इनके कर्तव्यबोध और राष्ट्रबोध से सुशिक्षित करना होगा। इनमे राष्ट्रबोध का विकास करना होगा और यह काम बिना संवैधानिक नियम – कानून और कठोर अनुशासन के पूरा नहीं हो सकता। संसद सुचारू रूप से तभी चलेगी जब सांसद संसद के योग्य होंगे। योग्य बनेंगे। राजनेताओं के चरित्र में यही सुधार राज्य और विधानसभाओं में भी अपेक्षित है। भारतीय राजनीति को यदि भारत और जनता के प्रति ईमानदार और जिम्मेवार होना है तो इसे अपने काले – दागदार अतित से मुक्ति पानी होगी अन्यथा पहले इसने और उसने भी ऐसा ही किया था, के कुतर्क दिए जाते रहेंगे और अंततः नुकसान सिर्फ देश और जनता का होगा। जनता को भी कलाम साहब की इस चिंता पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है क्योंकि अंततः वही इस कलंकित इतिहास से मुक्ति दिलाने में सक्षम है। होते हुए भी नही है तो होना होगा। अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी। संसद और इसके नियमित कार्य करने और कराने वाली सभी जिम्मेवार संस्थाओं को चाहिए की वे अब संसद को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था बनाएं। यदि आवश्यक हो तो नियम और कानून कायदों में सुधार करें। यह तो अवश्यंभावी है कि संसद अब ज्यादा समय तक अपना मान मर्दन नही होने देगी क्योंकि आखिरकार संसद को चलाने की शक्ति भी जनता के हाथों में ही है। \” झारखंड इन दिनों \” झारखंड बदल रहा है। मोदी सरकार की तरह रघुवर सरकार भी राज्य में सकारात्मक सोच और माहौल बनाने में कामयाब होती दिख रही है। नित्य नई सार्थक,जरूरी और बहुपयोगी घोषणाएं हो रही है। राज्य के लोगों में विकास का आत्मविश्वास दिखने लगा है। कमी है तो बस पूरी ततपरता से क्रियाशील होने की, घोषणाओं को जमीन पर उतारने की और जो जमीन पर उत्तर चुकी हैं उनके सदुपयोग की। इन दिनों समाचारपत्रों में कई खबरें आ रही है कि व्यवस्था और विकास में सहयोग की कई इमारतें बन चुकी हैं और बेकार पड़ी हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के मुलभुत संसाधनों में अभी भी कोई बड़ा सुधार नही दीखता। कानून व्यवस्था थोड़ी चौकस हुई है पर अभी भी सुरक्षा संदेह के दायरे में है। कृषि – पशुपालन के क्षेत्र में यह राज्य देश का अग्रणी हो सकता है,जिसमे प्रयास काफी धीमा है। पिछले दिनों राजधानी रांची में स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। कारण एक बड़े समुदाय की आस्था का प्रतीक गाय थी। राज्य में २२ नवंबर २००५ से गो वध निषेध अधिनियम लागू है। बावजूद इसके राज्य में गो वध और तस्करी जारी है। जो काम कानून व्यवस्था का है वह राज्य के गौ भक्तों को करना पड़ रहा है अर्थात कानून और प्रशासन का काम कुछ गौ भक्त कर रहे हैं और दुर्भाग्यवश उन्हें ही प्रताड़ित किया जा रहा है। रांची की घटना इस संदर्भ में राज्य प्रशासन की विफलता को दर्शाती है, जिस पर समय रहते सरकार को ठोस कदम उठाना होगा। गो वध निषेध अधिनियम को सख्ती से लागू करना होगा। पिछले महीने मुख्यमंत्री ने राज्य के बड़े उधोगपतियों – व्यापारियों से मिलकर उन्हें सामाजिक क्षेत्र में काम करने को प्रेरित किया था। यह एक अच्छा प्रयास था,जिसे जारी रखने की जरूरत है। बड़े व्यापारियों के साथ – साथ राज्य की सामाजिक संस्थाओं और आम जनता से भी ऐसे आत्मीय अनुरोध करने की जरूरत है। हर एक आदमी को उसके नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया जाना चाहिए। उन्हें उनके नागरिक कर्तव्यों के प्रति ईमानदार बनाने का प्रयास निरंतर होना चाहिए। लेखन और साहित्य से जुड़ा होने के कारण बार – बार राज्य में हिंदी अकादमी की मांग मैं स्वयं कई मंचों से करता रहा हूँ। मुख्यमंत्रीजी से भी मिल चूका हूँ। झारखंड के साथ छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल दो राज्य बने थे जहाँ हिंदी अकादमी का गठन कब का हो चूका पर झारखंड में साहित्य की चिंता करनेवाला कोई नही दीखता। साहित्य संस्कृति और सभ्यता को गढ़ता है। मनुष्य के शरीर में मनुष्यता के गुण भरता है। उसे जीने का सलीका सिखाता है। इस दिशा में त्वरित ध्यान देने की जरूरत है। स्वच्छ्ता अभियान के साथ – साथ प्रधानमंत्री ग्राम योजना पर प्रभावशाली ढंग से काम करने की जरूरत है। नशों के प्रति जनता को जागरूक करना राज्य सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए,जिसका फिलहाल अभाव दिखता है। झारखंड पर चिंतन का अंतिम निष्कर्स यही निकलता दीखता है कि झारखंड के लोगों की आँखों में आशा और विकास की चमक तो है पर इस चमक को बनाये रखने और साकार करने का बड़ा दायित्व सरकार का है,जिसे अभी उसे पूरा करना है।

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