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देवेन्द्र आर्य की पांच ग़ज़लें


(1)
तुझ को भले पता न हो ,पेड़ों को पता है
किस ओर पीठ है तेरी किस और हवा है।

बारिश में भींगने को मचलने लगा मौसम
शायद तुम्हारी आँखों में घिर आई घटा है।

शर्मिंदगी सी लगती है तब नींद को खुद पर
जब रात पूछती है ‘अभी कितना बजा है। ’

स्वागत में जिसके लोग खड़े घुटने टेक कर
सोचो कभी वो शख़्स भी घुटनों पे चला है।

हसरत ही रह गयी कि कोई बात हो ऐसी
मैं भी कहूँ कि वाकई धरती पे खुदा है।

मेरी तबाहियों का सबब थे जो कुछ एक लोग
सुनते हैं सुन के उनको भी अफ़सोस हुआ है।

लफ़्जों की या हुनर की या बाज़ार की बोलो
भाषा अगर खामोश है तो किसकी खता है।
**
(2)
उसी रंगो बू की कहानी रही
कभी जिसकी मीरा दीवानी रही।

जिसे अपना दिल आज कहती हो तुम
कभी वह मेरी राजधानी रही।

वही मेरी राहों के रोड़े हुए
कि जिस पर मेरी मेहरबानी रही।

हमारे ज़माने में मिलने की शर्त
रही भी अगर तो ज़बानी रही।

मेरे होंठों पर हँस रही तिश्नगी
बुज़ुर्गों की अंतिम निशानी रही।

बड़ी गर्म जोशी से बोली ग़ज़ल
मिलेंगे अगर ज़िंदगानी रही।

है दिल्ली अगर तेरी आलोचना
तो कविता मेरी हल्द्वानी रही।
**
(3)
कोई भी वक़्त हो एक दिन पुराना होगा ही
जो आया है उसे एक रोज़ जाना होगा ही।

मना करूँ भी अगर उसका आना होगा ही
कि उसके पास भी कोई बहाना होगा ही।

यूँही तो कोई नहीं खींचता है अपनी कमान
चढ़ा है तीर तो कोई निशाना होगा ही।

अगर अभी भी हैं ज़हरीले साँप दिल में तेरे
ग़मों का उसमें यकीनन खज़ाना होगा ही।

खुशी हो ग़म हो गिले शिकवे या सुखन की बात
मिलेंगे लोग तो सुनना सुनाना होगा ही।

मैं कामयाब हूँ माज़ी को बेच के अपने
तुम्हारे पास भी गुज़रा ज़माना होगा ही।

तबाहियां हैं हमारी तरफ़ तो ज़ाहिर है
तुम्हारी ओर का मौसम सुहाना होगा ही।

यक़ीन आज भी करता है दिल न जानें क्यों
दिलों में लोगों के अपना ठिकाना होगा ही।

हमारे दौर के बच्चों को इल्म है कि उन्हें
बड़ों के वास्ते बचपन बचाना होगा ही।
**
(4)
मुझको इंकार करना आता है
ग़म को त्यौहार करना आता है।

गाल सहला के पूछा खुशबू ने
फूल को प्यार करना आता है?

चाँद जितना भी छिप ले बदल में
हमको दीदार करना आता है।

हम से बेहतर हमारे बच्चों को
वक़्त पर वार करना आता है।

ठग नहीं पातीं हैं उनको बातें
जिनको तकरार करना आता है।

छाप के स्वस्तिक तिरंगे पर।
उनको बाज़ार करना आता है।

मुतमइन था नदी के तट पर मैं
मुझको तो पार करना आता है।
**
(5)
जी भर के देख ले मुझे तरसेगा बाद में
अब इसके बाद होगी मुलाकात याद में।

सम्मान और प्यार से जब तक न दीजिये
मुँह डालते नहीं हैं मवेशी भी नाद में।

मारे हुए हैं धर्म के ये सीधे सादे लोग
इनको नशा खिलाया गया है प्रसाद में।

कोई कदम उठाने के पहले ये सोच ले
जानें गयी हैं किनकी अभी तक फ़साद में।

सदियों सताई औरतें और हाशिये के लोग
घुलने लगीं हैं मुक्ति की इच्छाएं स्वाद में।

जब ख़्वाब सोशलिज्म के बेकाबू हो गए
थोड़ा सा अर्क डाला गया पूँजीवाद में।

तुम को पता है फिर भी क्यों देते हो गालियां
अपनी जड़ें कभी न थीं काबुल, रियाद में।

रोटी नहीं नसीब जिन्हें उनसे यह सवाल
भोजन के साथ लेते क्या हो तुम सलाद में।

किस हैसियत से पूछो ज़रा आसमान से
देने लगा है दख्ल ज़मीनी विवाद में।
*****
देवेन्द्र आर्य
A -127 आवास विकास कालोनी ,शाहपुर
गोरखपुर -273006
मोबाइल – 09794840990

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