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थी कोई आवाज या सचमुच खुदा


महान लोक गायिका रेशमा की पुण्यतिथि पर

-मालविका हरिओम
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सहरा-सहरा, रेतीली पगडंडियों पर चलती और जलती, तप-तप कर सोना बनती हुई कला ने जिस कलाकार को नवाज़ा, साधा, रूखी गर्म हवाओं ने जिसके सुरों को दिन-रात माँजने का काम किया और शाख से टूटते पत्तों की चटखन ने जिसके बोलों को ताल बख़्शी, उस बेमिसाल गायकी को जीने वाली आवाज़ एक ही थी, जिसका नाम था रेशमा। अपने नाम के ठीक उलट उनकी आवाज़ मे रेशम जैसा कुछ भी न था। न तो वह आवाज़ मुलायम थी और न ही बारीक। रेशम मे भरे जाने वाले लाल-पीले रंग भी वहाँ नदारद थे। उस आवाज़ मे अगर कुछ था तो वह था जंगली पेड़ों की मादक महक, ऊबड़-खाबड़ और पथरीले रास्तों का नुकीलापन, बंजर ज़मीनों पर फूटती हुई दरारों की थाप, दूर क्षितिज तक पसरे निचाट रेगिस्तानी सन्नाटे की सदा और काले, घने बादलों के बीच चमकती बिजलियों का-सा रंग। कुदरत ने रेशमा को अपनी सोहबत का जो अप्रतिम तोहफ़ा प्रदान किया वैसा कम ही कलाकारों को नसीब होता है। इस मामले मे रेशमा खुशनसीब साबित हुईं और उन्हें सुनने वाले भी। रेशमा की आवाज़ के बहाने हम सभी को प्रकृति के निकट जाने का, उसके कण-कण मे बसने और बहने वाले संगीत को सुनने का अवसर मिला।

रेशमा आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन वह बंजारा आवाज़ जो बन्दिशों को गाते हुए भी कभी बन्दिशों मे क़ैद न हुई, हमारे लिए संगीत के नए पैमाने तय करती है। कोई भी कला व्यक्ति को आज़ाद करने की एक पहल है। उस कला को साधना दरअसल मुक्त होना ही है। इन अर्थों मे रेशमा एक सच्ची कलाकार थीं। आज के इस दौर मे जब कलाएँ साधना न होकर साधन बन गई हैं, साधन जीविकोपार्जन का, साधन कम समय मे प्रसिद्धि अर्जित कर लेने रूपी चाहतों का, तो ऐसे मे कला मुक्त कहाँ करती है! वह तो आपको और अधिक बाँधती चली जाती है और धीरे-धीरे हम स्वयं उसकी गिरफ़्त में आते चले जाते हैं। हम सभी जानते हैं कि भूमंडलीकरण के चलते घर-घर में बाज़ार की सफल और सुनियोजित पैठ से सबसे ज़्यादा नुकसान परंपरागत लोक-कलाओं का ही हुआ। पिछले कई दशकों से लोक-संगीत को जो ग्रहण लगा है, उससे उबर पाना मुश्किल होता जा रहा है। कला ही है जो मनुष्य को मनुष्यता प्रदान करती है, उसे मशीनी हो जाने से बचाती है। संगीत को सभी कलाओं मे श्रेष्ठ माना जाता है। कहते हैं कि संगीत तो सृष्टि के रोम-रोम से झरता है। शीतल मंद बयार का संगीत हो या इठलाती चलती नदी का, सूखी धरती को अपनी मदमस्त फुहारों से सराबोर करती बारिश की बूँदों का संगीत हो या फिर पेड़-पौधों, फूल-पत्तों, पशु-पक्षियों की सदियों से चली आती आलापचारी। जीव-जगत का कोई भी पक्ष संगीत के रंग से अछूता नहीं। संगीत जब प्रकृति की आगोश मे, खुले आसमान तले, आत्मा की आवाज़ पर रचा जाता है तो वह आनंद का सृजन करता है, सुख की प्राप्ति बनता है, शांति एवं संतोष का अनहद नाद कहलाता है लेकिन वही संगीत जब बाज़ार की मांग पर तैयार किया जाए तो एक जानलेवा भब्बड शोर से ज़्यादा वह कुछ नहीं। रेशमा पहली वाली धारा से निकलीं और उन्होने ताउम्र बड़े अदब से उसकी खूबसूरती का मान रक्खा। रेशमा को सुनकर लगता है कि उनकी नसों मे लहू नहीं, संगीत ही बहता रहा होगा। एक ऐसी आवाज़ जिसने मुल्की सरहदों के भ्रम को मिटा डाला। वे हिंदुस्तान की थीं या पाकिस्तान की, कहना मुश्किल है। उनकी गायकी की गमक तो आसमानों की सरहदों तलक गुंजायमान थी।
बीकानेर (राजस्थान) के एक छोटे और नामालूम से गाँव ‘लोहा’ मे पैदा हुई रेशमा के जन्म की कोई तारीख़ नहीं मिलती। विभाजन के दौरान इनका जन्म हुआ और जब ये एक माह की थीं तो माता-पिता और अपने कबीलाई काफ़िले के साथ पाकिस्तान पहुंचीं, जहाँ से फिर वापिस आना न हुआ। रेगिस्तान मे गूँजने वाली इस बंजारन आवाज़ ने मीलों का सफ़र तय किया। ऊँटों के काफ़िलों के साथ गाती चलती एक नन्ही बच्ची रेशमा, जिसने गायन की शुरुआत, ‘सा, रे, गा, मा’ रूपी ठेठ रियाज़ से न करके मज़ारों पर गायी जाने वाली पारंपरिक धुनों और लोक-गीतों से की जो कि सदियों से उसकी बंजारा संस्कृति का एक हिस्सा थे। खानाबदोशी के उस आलम मे संगीत उन सबके लिए एक संबल था, जीवन को महसूस करने का, उससे ताल-मेल बैठाने का। जहाँ- जहाँ काफ़िला रुका, वहाँ-वहाँ सुरों की एक नयी इबारत गढती गई रेशमा और जब-जब काफ़िला चला, सुर भी चलते चले गए, नयी-नयी मंज़िलों की ओर। अपनी सामाजिक स्थिति के मद्देनज़र उस कबीलाई दुनिया मे जहाँ न लिखाई न पढ़ाई, न घर न ठिकाना, रेशमा की झोली मे जो गिरा उसे उन्होंने ख़ुदा की नेमत मानकर सिर-आँखों से लगाया। ऐसी व्यवस्था जहाँ वर्तमान की जद्दोजहद के बीच भविष्य के तमाम सपने दिन-रात चूर हो जाते रहे हों, एक दर्द लाज़िम था जो रेशमा की आवाज़ मे भरपूर नज़र आता है। वह आवाज़ दरअसल आवाज़ नहीं, एक ‘हूक’ थी जिसकी बानगी पर सुर मानो ख़ुद फ़िदा हो गए हों। न संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा और न ही कोई परंपरागत रियाज़ लेकिन दिन-रात की उसी हूक के सहारे संगीत सधता चला गया। उनके गाँव के नाम का जैसे कुछ लेना-देना रहा हो उनकी आवाज़ से। लोहा गाँव की रेशमा की आवाज़ भी तपे हुए लोहे से कम न थी। अनगिनत चिंगारियों, शोलों से लबरेज़ ठोस लोहा। जब वे तान खींचतीं थीं तो सुरों का बच कर निकलना या इधर- उधर हो जाना मुश्किल हो जाता था। सधे और ठोस सुर ऐसे मानो उनमे से लपटें निकलती हों।
सच्चा संगीत सादगी की माँग करता है। रेशमा का पूरा जीवन, पहनावा-ओढ़ावा और बातचीत का कच्चापन, मासूमियत सब कुछ सादगी से परिपूर्ण था। बुलंदियों पर पहुँच कर भी उसकी हनक से ख़ुद को बचाए रखना कठिन काम है लेकिन रेशमा ने इस काम को बख़ूबी अंजाम दिया। सादगी के इस धर्म को आजीवन निभाया। दुनिया भर मे अपनी गायकी का लोहा मनवा लेने के बाद भी किसी को अपना पता बताते हुए वह सचेत रहती थीं। गली, शहर और बाक़ी निशानियाँ भी ठीक से समझाती थीं, इस बात से बिल्कुल अंजान कि वह गली और शहर तो अब उन्हीं के नाम से जाने जाते हैं। उनकी आवाज़ ने जो पहचान क़ायम की, वह अब किसी पते की मोहताज कहाँ ! ‘हायो रब्बा नहियों लगदा दिल मेरा’, ‘अँखियाँ नू रैन दे’, ‘वे मैं चोरी-चोरी तेरे नाल’ और इन सबके बीच ‘दमादम मस्त कलंदर’ जिसे उन्होंने सेवन गाँव मे ‘कलंदर की मज़ार’ पर गाया, ने उन्हें दुनिया भर मे मशहूर कर दिया। इस गीत को उनके बाद कई कलाकारों ने अपनी आवाज़ दी लेकिन जितनी शिद्दत से अपने पीर को याद करते हुए एक अदब और अक़ीदत के साथ रेशमा ने इसे गाया, वैसा फिर कोई नहीं गा पाया। पीर कलंदर की मज़ार पर गाते हुए जब पाकिस्तानी रेडियो के डायरेक्टर ने इन्हें सुना तो रेडियो पर गाने के लिए आमंत्रित किया। खुले आसमान तले, खुली आवाज़ मे गाने वाली रेशमा के लिए बंद स्टूडियो में बँधी-बँधाई ताल पर गाना रोचक कम और त्रासद ज़्यादा था। किन्तु उसी माध्यम ने ‘सहरा की बुलबुल’ नाम से नवाज़ी जा चुकी रेशमा की ख़ानाबदोश आवाज़ को घर-घर तक पहुँचा दिया। इसके बाद रेशमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा कभी। दुनिया भर में कई मंचों से अपनी जादुई आवाज़ का लोहा मनवाया। उस आवाज में एक ऐसी कशिश थी कि सुनने वालों का रोम-रोम रोमांच से भर उठता था और आँखें भीग-भीग जाती थीं। हिन्दी फिल्मी दुनिया भी इस मायने में खुशकिस्मत है कि रेशमा का एक गीत उसके हिस्से भी आया। कहने को वह गीत फ़िल्म में इस्तेमाल करके फ़िल्मी हुआ लेकिन इससे पहले भी रेशमा उसे अपने अंदाज़ मे गा-गाकर मशहूर कर चुकी थीं। हिन्दी फिल्मी गानों की एक लंबी फेहरिस्त में रेशमा का ‘लंबी जुदाई’ मील का पत्थर साबित हुआ। अपने एक ही गीत से उन्होने यहाँ भी अपनी पहचान कायम की। पंजाबी लोक-गीतों को उन्होंने जिस तरह अपनी आत्मा से गाया, वे अमर हो गए और बदले में उन गीतों ने अमर कर डाला रेशमा को।
एक ऐसा भी वक़्त था जब लोक- गीत हमारे जीवन, हमारी चेतना का हिस्सा हुआ करते थे। खुशी हो, ग़म हो, शादी-ब्याह हो, बदलता मौसम हो, खेती हो, बारिश हो या सूखा हो, किसी का जन्म हो अथवा दुनिया से रुख़सती, हर मौके पर लोक-गीतों के गाये जाने का चलन था। ये गीत दरअसल जीवन की नीरसता और एकरसता दोनों को तोड़ने का काम करते थे। उसकी कड़वाहटों मे सुर और शब्दों से मधुरता भरने का काम करते थे, उसके सफ़ेद कोरे कैनवास पर रंग भरने का काम करते थे। उमंगों-तरंगों से भरे ये गीत जीवन भीतर एक नए जीवन का संचार करते थे। इन गीतों के माध्यम से जहाँ दर्द, पीड़ा और कष्टों को झेलने का बूता मिलता था वहीं उनसे लड़ने और निपट लेने की ताक़त भी। किन्तु आज लोक के ये गीत आपा-धापी भरी इस अंधी आधुनिकता मे कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं। हम इन्हें देख तक नहीं पा रहे, सुनना तो दूर। संगीत अब ‘सुकून’ नहीं ‘सनसनी’ का पर्याय बन गया है। रीमिक्स के इस दौर मे कहाँ क्या मिक्स हो रहा है और कहाँ क्या मिस, कहना कठिन है। संगीत जिसका इस्तेमाल एक थैरेपी (रोगों के उपचार) के रूप मे किया जा सकता है वहाँ उसका बे-सुरताल इस्तेमाल नए-नए रोगों को पैदा कर रहा है। ऐसे में रेशमा जैसी आवाजों का चले जाना एक डर भी पैदा करता है। जो लोग-संगीत का अर्थ जानते हैं, सच्ची आवाज़ पहचानते हैं, उनके लिए अब यह डरना ज़रूरी होता जा रहा है। गीत-संगीत के नाम पर जो परोसा जा रहा है उसमें पंछियों की चहचहाहट नहीं है बल्कि सीमेंट-गारा बनाती मशीनों का शोर है। हमें तय करना होगा कि हमें क्या चुनना है ! जीवन के किसी भी मोड़ पर कभी-भी हम एक सीधा और सही सुर लगा पाएँ, यही रेशमा जैसे मिट्टी से जुड़े कलाकारों को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
http://www.jankipul.com/ से

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