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डरो, अमरिका डरो!


ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटनए

सुना है अमरीकी इस बार एक-दूसरे को डरने-डराने पर सात अरब डॉलर खर्च करेंगे. हैलोवीन का मौसम है, मुखौटे और कालिख पोतकर पार्टियों में जाने का मौसम, घरों के बाहर डरावनी तस्वीरें लगाने का मौसम, कम कपड़ों में चुड़ैल का मेकअप लगाकर सेक्सी दिखने का मौसम और हां बच्चों के लिए कैंडी और चॉकलेट जमा करने का मौसम.
बड़ा मुल्क है, राजा मुल्क है, उधार लिए पैसों से ही सही, दुनिया का सबसे अमीर मुल्क है, उसकी जो मर्ज़ी हो वो करे.

लेकिन जो बात मेरी समझ में नहीं आ रही वो ये कि अमरीकियों को तो चौबीस घंटे और 365 दिन डरा रहना चाहिए, और बहुत सारे डरे हुए हैं भी, फिर एक दिन का ये तमाशा क्यों?
अब रिपबलिकन पार्टी की तरफ़ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में सबसे आगे चल रहे डोनाल्ड ट्रंप हर गली, मोहल्ले, चौराहे पर चीख-चीख कर कह रहे हैं कि वो अगर राष्ट्रपति बन गए तो इस देश में एक करोड़ के लगभग ग़ैरक़ानूनी तरीके से रह रहे लोगों को एक झटके में बाहर निकाल देंगे.

बरसों से यहां रह रहे इन लोगों पर क्या बीतेगी, वो तो एक अलग कहानी होगी, अमरीका पर क्या गुज़रेगी ये सोचकर ही सैम चाचा के सपूतों की घिग्घी बंध जानी चाहिए.

खेतों में काम करनेवाले नहीं होंगे, दुकानों में सामान ढोने वाले नहीं होंगे, नलका और बिजली ठीक करनेवाले नहीं होंगे, रेस्तरां में खाना बनाने और परोसने वाले नहीं होंगे, घरों की मरम्मत करने वाले नहीं होंगे.
ये डरने के लिए काफ़ी नहीं है तो ट्रंप साहब ये भी कह रहे हैं कि उनके राज में दफ़्तर हो या दुकान, देश में कोई कोना नहीं होगा जहां बंदूक ले जाने की आज़ादी नहीं होगी. यानी बॉस पर ग़ुस्सा आए तब बंदूक निकालो, बार में ग़ुस्सा आए तब बंदूक निकालो, पुलिस पर ग़ुस्सा आए तब बंदूक निकालो, जब जी चाहे तब बंदूक निकालो.

अगर ट्रंप साहब की बातें काफ़ी नहीं हैं तो दूसरे उम्मीदवार भी हैं. कोई इस्लाम के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की बात कर रहा है, तो कोई समलैंगिकों के ख़िलाफ़, किसी को दोबारा से इराक़ में अमरीकी फ़ौज चाहिए तो कोई रूस को सबक सिखाने को कह रहा है.
चौबीसों घंटे फ़ोन सुने जाने का डर, ईमेल पढ़े जाने का डर, दवा कंपनियों की तरफ़ से अचानक से क़ीमत में पांच सौ गुना बढ़ोतरी का डर, बैंकों के दिवालिया हो जाने का डर, बच्चों के किम कारदाशियां और माइली सायरस के बहकावे में आने का डर, काले समुदाय का डर, मुसलमानों का डर, चीनियों का डर, फ़ेसबुक के डिस्लाइक बटन का डर–और इन सबके बावजूद हैलोवीन?

वैसे इस मौके पर ट्रंप साहब के मुखौटे भी धड़ाधड़ बिक रहे हैं और आपको लगेगा कि चलो लोगों को इतनी तो समझ है कि ये डरावनी बातें कहनेवाला चेहरा है, तो शायद उसे वोट नहीं देंगे.
जनाब ये अमरीका है, बड़े लोगों की बड़ी बात होती है. यहां मुखौटे की बिक्री उस शख्स की लोकप्रियता से भी आंकी जाती है.

हैलोवीन कॉस्ट्यूम बेचनेवाली वेबसाइट स्पिरिट हैलोवीन की मानें तो 1996 के बाद से हर चुनाव में जिस उम्मीदवार के मुखौटे सबसे ज़्यादा बिके हैं उसी को व्हाइट हाउस की चाभी मिली है.
तो 1996 में जिन मुखौटों की सबसे ज़्यादा बिक्री हुई, उनमें 71 प्रतिशत बिल क्लिंटन के थे, साल 2000 में बुश साहब के मुखौटे 57 प्रतिशत पर रहे और इराक़ की जंग के बाद 2004 के चुनाव में 65 प्रतिशत मुखौटे उन्हीं के बिके. ओबामाजी के मुखौटों की बिक्री 2008 और 2012 दोनों ही में 60 प्रतिशत रही.
वैसे सुना है इन दिनों भारत और पाकिस्तान में भी आप लोग हैलोवीन मनाने लगे हैं. बढ़िया है. मुखौटा किसका लगाना चाहिए, ये यहां से बैठकर मैं क्या बताऊँ, आप तो ख़ुद ही समझदार हैं. सोच समझकर लगाइएगा!
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bbc हिंदी से साभार

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