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गिरीश पंकज
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जिंदगी प्यार का गीत है


मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है, कोई अब तक तय नहीं कर पाया। शास्त्रों में इसका कोई ठोस उल्लेख नहीं मिलता। अगर है भी तो इसकी व्याख्या लोग अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हम अंधकार में भटक रहे हैं- रोशनी की तलाश में। लेकिन वह कौन सी रोशनी चाहिए, यह हमें ज्ञात नहीं है। रोशनी एक मृगमरीचिका है। उसी की तलाश में हम अपने विवेक पर अज्ञानता की कई-कई तह डालते जा रहे हैं। मनुष्य को जिस दिन यह ज्ञात हो जायेगा, वह उसी दिन पूर्णता को प्राप्त हो जायेगा। लेकिन अज्ञानी मनुष्य वैभव और मौद्रिक सम्पन्नता को अब तक सबकुछ माने हुए बैठा है। भटकन के ही उदाहरण है- विभिन्न प्रकार के धर्म और सम्प्रदाय। धर्मगुरुओं का अवतरण और मौद्रिक मोचन इसी के परिणाम हैं। मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए आदिकाल से ही पृथ्वी के हर हिस्से में ऐसे संत-महात्माओं का अवतरण होता रहा है। आदि इष्ट से लेकर बुद्ध और ईसा मनुष्यों के जीवन में स्थाई रोशनी की व्यवस्था नहीं कर पाएँ। कालक्रम में बाबाओं, और छोटे-मोटे बापुओं का आना-जाना लगा हुआ है। ये लोग मजमा लगा कर बड़े-बड़े आयोजनों मनुष्य जीवन का अभीष्ट लक्ष्य बतलाने के बहाने अपना उल्लू सीध करते रहे हैं। तलाश जारी है…। यह सिलसिला अनादि और अनन्त है। जब तक मनुष्य जाति यह नहीं मान लेती कि भौतिक समृद्धि ही अन्तिम लक्ष्य नहीं है, तब तक मनुष्य जीवन का यह भटकाव समाप्त नहीं होगा। जितने भी तथाकथित ज्ञानी-महात्मा और धर्मगुरुओं का इस धरती पर आगमन हुआ, वह सब एक ढोंग है। लगभग सारे गुरु हमें भटकाते रहे। हम कितनी भी भौतिक सम्पन्नता हासिल कर लें फिर भी हम अतृप्त ही रहेंगे। एक छोटा सा उदाहरण् देखिए – अपने देश में अम्बानी जैसे लोग भी हैं। उन्हें अब क्या चाहिए? फिर भी वे प्यासे हैं। धर्मगुरुओं के पास जाते हैं। यज्ञ के आयोजन में लाखों दान देते हैं। अम्बानी के सामने हम साधरण मनुष्य की विसात? इसे कोई नहीं समझता। सारी दुनिया ने आर्थिक समृद्धि और भौतिक सम्पन्नता के लिए अपने विवेक को गिरवी रख दिया है। एक दूसरे को ठगने और मूर्ख बनाने के चक्कर में स्वयं को ही ठग रहे हैं। मनुष्यता से कोसों दूर होते जा रहे हैं। यह एक ऐसा अभ्यास है, जो सतत मनुष्य से मनुष्यता को छीनते जा रहा है। मनुष्य जीवन के भटकाव का एक अन्य उदाहरण है- वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था। इस व्यवस्था में स्वार्थी लोग बाबाओं की तरह ही लोग को भोलाभाला कह कह कर मूर्ख बनाते रहे हैं – कभी दलित तो कभी अल्पसंख्यक तो कभी जाति-धर्म तो कभी लोकतंत्र और गणतंत्र के नाम पर। मनुष्य से मनुष्यता दूर करने का सारे उपक्रम जारी है। जब तक हम अपने अन्दर के स्वार्थ एवं समृद्धि की लालसा से विलग होकर सहअस्तित्व की भावना को अपने हृदय में दीये की तरह जला नहीं लेते, यूँ भटकते रहेंगे। हमारा हाथ दूसरों के लिए जिस दिन समर्पित हो जायेगा, उसी दिन मनुष्य अपने वास्तविक लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए पायेंगे। हमें अपना पहला कदम बढ़ानेके लिए साहस जुटाने की जरूरत है। जिस दिन हमारा पहला कदम बढ़ेगा, उसी दिन हम अपना खोया हुआ बहुत हद तक पा लेंगे। इसी अभ्यास से मनुष्य जीवन के अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। उसके बाद सारा तंत्र सजीव और प्यारा लगने लगेगा। अरुण कुमार झा प्रधान सपादक

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