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यह कैसी भूख है?


पूरी दुनिया बेचैन है। गरीब से अमीर तक सभी बेचैनी में जी रहे हैं। हमारे मन और प्राण पर भूख का भूत सवार है। भूख पेट तक ही सीमित होती तो कोई बात होती। भूख असीमित है। धन की भूख, सुन्दर तन की भूख, मन की भूख, ओहदे की भूख, अहंकार की भूख, दुनिया को गुलाम बना लेने की भूख, दूसरे को छोटा दिखाने की भूख! हम मनुष्य इस भूख के कारण ही हिंसक पशु से भी बदतर व्यवहार करते दिख जाते हैं। अमर्यादित भूख के अलावा जितनी भी भूख है, उनको मिटाने की दिशा में हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, त्यों-त्यों हम हिंसक बनते जाते हैं। हिंसा ने हमारे चित्त पर स्थायी घर बना लिया है। हिंसक हम भले ही सूरत से न दिखें लेकिन हमारे विचार और हमारी आत्मा में हिंसा विद्यमान है।
किसी चीज को पाने की इच्छा जब जाग्रत होती है, उसे पाने के लिए हम अपने मूल स्वभाव से विचलित हो जाते हैं। परिणाम की चिंता भी नहीं रहती कि हम जिसे पाना चाहते हैं उसकी उपयोगिता हमारे लिए, समाज के लिए कितनी है! फिर भी हम बेचैन हो मरीचिका में भागते हुए नजर आते हैं। हम घर में हों या कार्यालय में। हमारे जिम्मे जितनी जिम्मेदारी तय की गई है, उसके एवज में हमें पारिश्रमिक भी तय है (यहाँ कुछ विसंगतिया हो सकती हैं) तो फिर हम साजिश और खुराफात में क्यों लग जाते हैं? यह तो हुई छोटे पैमाने की बात। वृहद पैमाने पर तो हम अपनी क्रøरता और अध्मता को ही अपने चरित्रा का एक हिस्सा बना लेने में अपनी ‘शान और मान’ समझ बैठतेे हैं। हमारे देश में ऐसे कई उदाहरण हैं। आपने कई-कई बार देखा-सुना-पढ़ा होगा कि एक अरबपति व्यापारी ने अपने ही होटल के पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली। एक बड़ी फिल्मी हस्ती ने छत से कøद कर जान दे दी। किसी राजनीतिक घराने की बड़ी हस्ती ने जहर खा कर अपनी जान गँवाई तो भारत के जाने-माने बड़े व्यवसायी ओर समाजसेवी जनता के पैसे को हड़पने के कारण 10 साल की सजा भुगतेंगे या भूतपूर्वमंत्राी के घर से 200 करोड़ की अवैध् संपत्ति बरामद हुई। अपने ही बाॅडीगार्ड की हत्या की साजिश रचने के कारण कोई दोषी करार दिया गया। कोई बाबा 2 हजार करोड़ की संपत्ति के साथ नाबालिग के साथ यौनाचार में लिप्त पाया गया।
यह सब क्या है! जब अमर्यादित भूख नहीं मिटती तो इसका अंत इसी प्रकार के हिंसक रूप में प्रकट होता है। हिंसा के हजारों रूप हैं। विश्व की राजनीति ने अहिंसा का पैमाना बदल कर रख दिया हैै। अहिंसा को नये रूप में परिभाषित किया गया है। एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है – अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद प्रेस को एक साक्षात्कार में कहा था कि शांति के लिए युद्ध जरूरी है। इस प्रकार का नोबेल पुरस्कार तो विश्व समाज को अस्थिर करने के लिए एक साजिश ही कहा जायेगा। लेकिन इसको प्राप्त कर हम फझ्ले नहीं समाते। यह कैसा दर्शन है- अहिंसा और शांति का?
किसी भी काल में हम चाहे कितने भी समृद्ध और वैभवशाली क्यों न हो जायें समाज में छल-प्रपंच का वजूद मौजूद रहता है। बुðकाल हो या रामराज काल। सभी काल खण्डों में यह बात देखने को मिलती है। जिसका परिणाम अंततः कष्टकारक और अप्रिय ही होता है। यह समझ में नहीं आता कि मनुष्य सारे परिणामों को जानते-बूझते-समझते पुनः-पुनः उसी प्रवृत्ति को क्यों अपनाता है? अंगुलिमाल वाल्मीकि बन जाता है। सम्राट अशोक से लेकर अजातशत्राु तक हथियार डाल कर अहिंसा का पुजारी बन जाता है, फिर वर्तमान समाज हिंसा को क्यों इतना महत्व देने लगा है? मुझे लगता है शायद हमारी शिक्षा में कोई बड़ा खोट है या मौलिक शिक्षा की जगह पर हम कोई अवांछित शिक्षा पðति को अपनाये हुए हैं। शिक्षण और शिक्षक के उच्च चरित्रा और उनके आदर्श पर पुनः विचारने की जरूरत है। शिक्षक उच्च शिक्षा के हों या निचले स्तर की शिक्षा व्यवस्था के, सभी का चरित्रा कहीं न कहीं हिंसक और छलिया प्रवृत्ति का हो गया है, जो सिर्फ अपने लिए ही जीना चाहता है। शिक्षण के लिए जो शिक्षक नियुक्त होकर आते हैं वे मूल रूप से शिक्षक प्रवृत्ति के व्यक्ति नहीं होते। इस विषय पर सरकार और समाज को गहन चिंतन करने की जरूरत है। शिक्षक बनने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान और डिग्री ही काफी नहीं है। इसके लिए मनोवैज्ञानिक स्तर पर भावी शिक्षकों की आउंसेलिंग की जरूरत है। उन्हें कठिन प्रक्रिया के तहत गुजारने की अनिवार्यता होनी चाहिए। मन, वचन और कर्म में एकरूपता होनी चाहिए। जिनमें शिक्षक का नैसर्गिक गुण नहीं हों उन्हें सिर्फ गोल्ड मेडलिस्ट के पैमाने पर बहाली नहीं करनी चाहिए। वर्तमान में शिक्षकों की जो दिशा और दशा है वह पूरे शिक्षा जगत को शर्मसार करती है। प्राथमिक शिक्षक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षक सुबह से शाम तक छल-प्रपंच और घटिया मानसिकता को लिए एक दूसरे को नीचा दिखाने और दूसरे को पटखनी देने में गुजार रहे हैं। इसी में मस्त रहते हैं। इन्हें शिक्षण कार्यों में कोई रूचि नहीं रह गई है। कैसे ज्यादा से ज्यादा धन प्राप्त किया जाये, इसी उढेड-बुन में इनका दिन समाप्त होता है। मेरिट की जगह चरणस्पर्शी प्रवृत्ति के शिष्यों की फौज खड़ा कर उनका अंध्कारमय भविष्य गढ़ने वाले विश्वविद्यालय आज घटिया राजनीति का अखाड़ा बनता जा रहा है। कुलपति और उप-कुलपति अपने मेरिट पर बहाल नहीं होते, बल्कि राजनीतिक पैरवी अथवा दूसरे रास्ते से बहाल होते हैं। इनका मानसिक स्तर शिक्षण कार्य के अनुरूप नहीं होता।
आज-कल एक बात बहुत ही तेजी से उभरने लगी है ;हो सकता है मेरा ज्ञान इस मामले में अध्ूरा हो।द्ध कि अपनी हैसियत को अपने लेखक समाज में ऊँचा दिखाने के लिए साहित्य के क्षेत्रा में कझ्ंठित लोग अपने स्तर पर साहित्य और साहित्यकार के सम्मान में थोड़ी ज्यादा ही उदारता दिखाने लगे हैं यह शुभ सूचक है। लेकिन इससे ज्यादा अच्छा होता यदि नवोदितों के लिए इस दिशा में इसी प्रकार के कार्य अपनी शुभेच्छा एवं सद्-इच्छा के साथ किये जाते जिसमें महिला और पुरुष नवोदितों को इस क्षेत्रा में प्रोत्साहित और उत्साहवर्घन कर उन्हें आर्थिक और मानसिक सपोर्ट दिया जाता तो शायद इससे समाज को प्रखर और मौलिक साहित्यकार-रचनाधर्मी मिल पाता!

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