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गन्दी मानसिकता की सफाई कौन करेगा?


जिस व्यक्ति के आचार.विचार में, आचरण में, व्यवहार में, दैनिक जीवन में स्वच्छता का भाव नहीं हो वह पूर्ण सभ्य नहीं हो सकता। सभ्य व्यक्ति से ही सभ्य समाज का निर्माण संभव है। जिस समाज और देश के जेहन में जितनी सफाई के भाव होंगे वह उतना ही सभ्य समाज कहलाने का अधिकारी होगा। दुनिया में अभी बहुत से देश ऐसे हैं जो पूर्णरूपेण सभ्य नहीं हो पाये हैं। परन्तु दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं जो पूर्ण सभ्य और स्चच्छता में अव्वल हैं। उदाहरण के तौर पर जापान और सिंगापुर का नाम लिया जा सकता है।
स्वच्छता और सभ्यता आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करता है तो दूसरी ओर जिम्मेदारी और चेतना बोध भी प्रमुख कारण हो सकते हैं। भारत अभी पूर्णतः सभ्य नहीं हो पाया है। इसका उदाहरण भारत के कई प्रान्त और उनके जिले हैंए वहाँ की सरकार और जनता इतनी ढीली.ढाली हैं कि सफाई और स्वच्छता जैसी मौलिक जरूरतों को अपने जीवन से नजरअंदाज करती रही हैं। नतीजतन अपने परिवेश को गंदगियों से भर लिया है और खुश भी हैं।एक सवाल है कि आखिर ऐसा क्या है कि हम गंदगी में जीने के आदी हो गयेघ् इस पर विचार करने से यही लगता है कि हमारा (कुछ खास व्यक्तियों और कुछ समाज को छोड़ करए जिनकी संख्या नगण्य है) प्रारंभिक संस्कार ही गलत तरीके से निर्मित हुआ है। एक दृष्टांत देखिए . मैं जिस शहर में रहता हूँ यहाँ विभिन्न संस्कृतिए जाति और धर्म के लोग रहते हैं। एक बार मैं अपने रिश्तेदार के घर गया हुआ था। शादी का माहौल थाए रहने की जगह की कमी के कारण मेरे रिश्तेदार ने अपने एक खास रिश्तेदार के यहाँ रहने का प्रबंध् किया था। जहाँ मुझे ठहरना था वह जगह मेरे रिश्तेदार के घर से मात्रा 100 मीटर की दूरी पर थी। उनका घर सरकारी क्वार्टर थाए लेकिन अब उसे खरीद लिया गया है। वह क्वार्टर कतारबð था और दोनों ओर कतार में ही क्वार्टर बने हुए थे। बीच में एक गली थीए जिससे होकर अपने.अपने घरों में लोग जाते थे। लगभग 12 क्वार्टर थे दोनों ओर। मेरे रिश्तेदार का घर अंतिम थाए यह मुझे पता नहीं था। ज्योंही मैं उनकी गली में घुसा कि कोई कीट मेरे मुँह में आ गया, मैं तुरंत थूकना चाहा लेकिन मैं लाख कोशिश कर भी उस गली में थूक नहीं पाया। मैं अपने मुँह में थूक लिये उनके घर तक चलता रहा। मुँह में भरे थूक को वाशरूम में ही जाकर थूक पाया। आप सोच सकते हैं कि आखिर ऐसी क्या वजह थी कि इतनी देर मैं थूक अपने मुँह में ही रखे रहा। इसकी वजह बहुत ही खास थी जिसे मैं अपने पूरे जीवनकाल में शायद ही कभी भूल पाऊँगा। जिस गली से होकर मैं जा रहा था वह गली इतनी साफ.सुथरी थी कि मैं चाहकर भी डर से थूक नहीं फेंक पा रहा था। मुझे डर था कि शायद कोई देख लेगा या नहीं भी देखेगा फिर भी यह जान जायेगा कि जो भी इस गली में नया आदमी आया होगाए वही यह गंदा काम कर सकता है। तो यह हुआ उस मोहल्ले का संस्कार! लेकिन जनाब यहाँ तो बड़ी.बड़ी सरकारी इमारतों के कोने.कोने को रंगबिरंगी थूकों और पान की पीकों से लोग सुशोभित करते रहते हैं। आखिर यहाँ इतने लोगों की आवाजाही होती हैए अफसरान और सरकारी बाबू से लेकर चपरासीजी आते.जाते हैं फिर भी लोग क्यों नहीं झिझकते.डरतेए दीवार को गंदा करने सेघ् इसका खास कारण है कि यहाँ के बाबूए चपरासी से लेकर अधिकारी महोदय भी इस कार्य में अपना योगदान बढ़.चढ़कर देते हैंए जिसे देख बाहरी लोगों को आसानी होती है थूकने और गंदा करने में। पूरे देश के समाहरणालयए पंचायत भवनए प्रखंड भवन हो या नगर निगमए निकाय सभी जगह की एक ही स्थिति है। कोई इस प्रतियोगिता में पीछे छूटना नहीं चाहता।
एक बार राज्य सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की एक इकाई (वर्ल्ड बैंक प्रायोजित) जो निजी भवन में चल रही हैए वहाँ जाने का मौका मिला। मेरे एक खास मित्रा मेरे साथ में थे। उन्होंने यहाँ की सफाई. व्यवस्था की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘देखिये यहाँ की सफाई. व्यवस्था! कितनी चाकचौबंद है! क्या आप यहाँ थूक सकते हैं?’’ मैंने कहा, ‘‘हरगिज नहीं।’’ इस पर मेरे मित्रा ने तपाक से पूछा, ‘‘आखिर क्यों?’’ यही ‘आखिर क्यों?’ का जवाब हमसब को मिलकर खोजना है। इसके लिए भारत के प्रधानमंत्री को कहना पड़े कि आप स्वच्छ रहिए अपने आस.पास के परिवेश को स्वच्छ रखिए तो यह हम भारतीय जनता के लिए गर्व की बात नहींए शर्म की बात है। जो काम हम अपने बच्चों को करने के लिए कहते हैं वही बात देश के प्रधनमंत्री हम से कहंे और हम फिर भी मूक बने रहें और इसका मजाक उड़ायें यह बहुत बड़ी विडंबना है हमारे लिए। यह हमारी सभ्यता को गाली हैए हमारे संस्कार को चुनौती है।

मुझे याद है. बचपन में मैं गाँव के एक सरकारी पाठशाला में पढ़ता था। हमारे पाठशाला के गुरुजी के कहने पर हम सभी विद्यार्थी सप्ताह में एक दिन पाठशाला की ओर से गाँव के ही सार्वजनिक स्थलों की सफाई करते थे। इतना ही नहीं बाढ़ आने और किसी प्रकार की छोटी.मोटी आपदाओं के आने पर हम विद्यार्थियों को उस काम में लगना पड़ता था। सामूहिक भावना सफाई और सार्वजनिक काम को करने की प्रेरणा देती थीए जो अब वाई.फाई अंग्रेजी विद्यालयों से भी गायब है। गाँधीजी ने बुनियादी शिक्षा की ओर अधिक बल देने की बात कही थी। उसके पीछे स्वच्छता के प्रति सामूहिक भाव थे जो हमारे जीवन से तिरोहित हो चले हैं।
इसमें हमारे स्थानीय प्रशासन और स्थानीय सरकार में बैठे हुए गैरजिम्मेदराना अध्किारी और बाबुओं के ढीले.ढाले आचरण हैं। जिनके चलते आपके दरवाजे पर जब गंदगी का उठाव नहीं होता तो आप क्या करेंगे। सड़ांध के कारण आपके मुँह से थूक तो निकलेगी ही। और ऐसे में आप पच्च से वहीं थूक देंगे। और तो और एक बार केन्द्रीय सरकार के एक महकमा के पुस्तकालय में वहीं कार्यरत् अपने एक मित्र के साथ वहाँ जाने का अवसर मिला। लेकिन वहाँ की गंदगी देख मैं दंग रह गया। किसी तरह साँस रोक कर ऊपर के तल्ले के गलियारे पार कर पुस्तकालय में तो प्रवेश कर गया लेकिन पुस्तकालय के प्रवेश द्वार से सटे संडास की बदबू ने जीना हराम कर दिया। लौटने की हिम्मत नहीं हो रही थी। जितनी देर रहाए लगाए मुझे यातना गृह में डाल दिया गया हो। लेकिन वहाँ के किसी भी कर्मचारी को इसकी कोई शिकायत नहीं। लघुशंका के लिए जाते हैं बिना पानी गिराये वापस हल्का होकर चले आते हैं। उन्हें कोई फर्क भी नहीं पड़ता। ऐसी ही स्थिति शहर के एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय की है। इस महाविद्यालय से पढ़कर निकले बड़े.बड़े अधिकारी और नेता देश के विकास में विभिन्न रूपों में अपनी भूमिका निभा रहे हैंए लेकिन महाविद्यालय के प्राचार्य को जैसे गंदगी की कोई फिक्र नहीं। इस उदासीनता का क्या मतलब लगाया जाये? सवाल सिर्फ इसी बात का नहीं है। सवाल इस बात का भी है कि आखिर यही लोग अपने घर के भीतर तो सफाई पर इतना ध्यान देते हैं जिसका कोई हिसाब नहीं। लेकिन अपने घर (फ्लैट) के बाहर बरामदे से शुरू होती हुई अपने कार्यस्थल के अलावा सार्वजनिक स्थल की गंदगी में इनका योगदान और इनकी गंदी मानसिकता का आखिर कौन ‘वाश’ करेगा। क्या मोदी जी ‘वाश’ करेंगे या गाँधी जी को पुनर्जन्म लेना होगा?
अरुण कुमार झा/ प्रधान संपादक

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