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कीचर में कमल नहीं. हमारी सोच है


हम अपने जीवन के कभी भी पुरा सच बोलना या जानना नहीं चाहते। दुनिया का गजब दस्तूर है। अब देखिए न भला, यह सिð हो चुका है कि सूर्य अपनी ध्ूरी पर स्थिर रहता है, पृथ्वी घूमती है, लेकिन हम हैं कि मानने के लिए तैयार ही नहीं। जिसके कारण समाज में कई प्रकार की भ्रांतियाँ विकास के पथ को यदा-कदा रोक देती हंै। अक्सर लोग यह कहते पाये जाते हैं कि कीचड़ में कमल होता है। लेकिन आप जरा सोचिए और मुझे यह बताइए कि आपने किस जगह पर कमल को कीचड़ से निकलते देखा है? कमल हमेशा जल से बाहर निकलता है। हाँ, उसके तल में जिसे आप कीचड़ कहते हैं, वह जलीय काई और सेवार होता है। कीचड़ में तो आज की राजनीति फøलती-फलती है। परिणास्वरूप हमारी जिन्दगी अस्त-व्यस्त हो गई है। मुगल काल हो या अंग्रेज का काल सभी काल खण्डों की व्यवस्था में एक बात काॅमन रही है। वह यह है कि आम जनता हमेशा से मानसिक और शारीरिक रूप से गुलाम रही है। पहले राजे-रजवाड़े लोग आपस में तलवार और तोप के बल पर हार जीत का फैसला करते थे आज की व्यवस्था में उसका रूप बदल गया है, उसकी जगह वोट यानी हमारा ‘मत’ जो नितांत निजी होता है, को तरह-तरह के प्रलोभनों से हमें फँसा कर हमें अंध, बहरा, गूँगा, लालची बना कर हर लिया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि जिस के ‘मत’ से राजनीतिबाजों की सौदागरी चलती है वह ‘मत’ साफ तौर से गरीब- शहरी, ग्रमीण मजदूर, किसान वर्ग के ही होते हैं, जो हमेशा से किसी की कृपा प्राप्त करने के लिए लालायित होते हैं।
शहरी बाबू लोग जिन्हें हमने प्यार से तथाकथित बुद्धिजीवी की संज्ञा दे रखा है, वे राजनीति के दाँव-पेंच को अच्छी तरह समझते हैं, वो अपना ‘मत’ देने बूथ तक नहीं जाते। उनमें से कझ्छ शहरी लोग राजनीतिक सौदागरों से सौदा कर अपना ‘मत’ देते हैं। ‘मत’ की राजनीति में एक विशेष वर्ग भी होते हैं- जिन्हें हम ‘सेठ-साहूकार’ कह सकते हैं। अपनी दूकान और मकान चमकाने के लिए राजनीतिज्ञ सौदागरों को भरपूर संरक्षण देते हैं, ऐशोआराम और विलासिता के सारे साध्न भी मुहैय्या कराते हैं। ये लोग ही राजनीति के कमल कहे जाते हैं और कीचड़ सारी जनता मानी जाती है। राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर खाती रहती है। जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर! ईमानदारी से सर्वे किया जाये तो स्वतंत्राता के पहले किसान और मजदूरों की स्थिति जैसी थी आज भी वैसी की वैसी ही है। कमजोर तबके के लोग हों या दिहाड़ी पर काम करने वाले, ठेले-खोमचे वाले, उनके जीवन-स्तर में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आज जन-धन योजना सरकारी विज्ञापन के सहारे परवान पर चढ़ी हुई है तो गाँव के किसान मजदूर हो या शहरी छोटे-मोटे रोजगारी लोग सबके सब सेठ और साहूकारों के चंगुल में फँसे छटपटा रहे हैं। सूद के कारोबारी नेता-मंत्राी-अफसर और दलाल की विशेष कृपा से लाल-लाल हुए जा रहे हैं। इनके लिए सूदखोरों से निजात दिलाने की कोई कारगर योजना और सरकारी समिति नहीं बनी हैं। राजकोष से सफेद हाथी जरूर पल रहा है।
कारपोरेटी दुनिया के बड़े-बड़े अखबार और चैनल देश की राजनीतिक व्यवस्था तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। राज और देश के संसाध्न पर इन्हीं का वर्चस्व कायम हैं। अखबार और चैनल ढाल के रूप में तो काम करते ही हंै राजनीतिज्ञों के पाप को ढंकने के बदले में जनता की गाढ़ी कमाई से लिए गये टैक्स के पैसे को हड़पने में भी इनकी भूमिका कमाल की होती है। प्रबंधक किस्म के संपादक अपने रिपोर्टरों का जम कर दोहन और शोषण करते हैं जिस प्रकार से अफसर और नेता के घर में काम करने वाले नौकर और बाई की स्थिति होती है। सृष्टि के बाद जिस काल की व्यवस्था जैसी भी रही हो, निन्म वर्ग के लोग हमेशा से गुलाम रहे हैं। हम कहने को आजाद हैं। लेकिन आजादी के मायने को आज तक देश के भारी आबादी ने न जाना, न महसूस किया है। झूग्गी-झोपडि़यों में रहने वाले, स्लम और मलीन बस्ती की जिन्दगी को देखिए तो पता चलेगा कि हमारा भारत कहाँ पर टिका हुआ है। ऐसे में हाईटेक शहर बनाने का सपने दिखाना आश्चर्यजनक है। सपनों के ये राजनीतिज्ञ सौदागर देश को कहा पहुँचाना चाहते हैं, उन्हें भी ठीक-ठाक पता नहीं। छोटे शहर हांे या बड़े शहर, कोढि़यों और भिखारियों की एक लम्बी फौज मंदिर और मस्जिदों के आगे पीछे बैठी, खड़ी, सोई पड़ी रहती है। जो आजाद भारत के माथे पर भारी कलंक है, जबतक देश में गरीबी-भूखमरी रहेगी, तबतक देश खुशहाल नहीं हो सकता। शहरी विकास विभाग सफेद हाथी ही साबित होता रहा है। ऐसे में मोनो रेल और बुलेटपू्रफ ट्रेन की बात करना मुझे तो समझ में नहीं आती। इतनी बेशर्मी वाली योजना पर बात करना कल्याणकारी और विकाशील देश को शोभा नहीं देता। खैर! झारखंड में एक नया जनादेश प्राप्त हुआ है। झारखंड के इतिहास में पहली बार एक गैरआदिवासी मुख्यमंत्राी बनने की खुशी राज्य के लोग मना रहे हैं। यह खुशियाँ कितने दिनों तक बरकरार रहती हैं, इसे देखना है! इस व्यवस्था परिवर्तन से शोषित-पीडि़त राज्य की जनता को कितना लाभ मिल पाता हैऋ इसकी प्रतीक्षा रहेगी। ईश्वर रघुवर जी को राजनीतिक इच्छाशक्ति दें ताकि जन-मन की आकाँक्षाएँ पूरी करने में वे कामयाब हों। कीचड़ में पड़ी सोच को स्वच्छ पानी में पलने दें।

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