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ऐसे आएँगे अच्छे दिन


अब भी भारतीय समाज दब्बू, पिछलग्गू और धर्मभीरू है। इसी के कारण निर्मल बाबा, आसाराम बापू न जाने कितने उनके जैसे लोगों के दुष्प्रभाव में आकर अपना सर्वस्व गँवा बैठता है। भारतीय समाज में अनपढ़-गँवार को कौन कहें, पढ़े-लिखे लोग भी भेड़ चाल चल रहे हैं। समाज के पिछलग्गूपन होने की कमजोरी को धूर्त लोग (राजनीतिज्ञ/पाखंडी बाबा) भलीभांति समझते-जानते हैं। इसी कमजोरी के कारण राजनीतिज्ञ लोग समय-समय पर इसका फायदा उठाते रहेे हैं। पिछला16वीं लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक रहा। प्रचंड बहुमत से भाजपा सत्तासीन हुई। इसके पीछे भी भारतीय जनता की भेड़ चाल ही थी। एक बात गौर करने योग्य है कि कोई भी पार्टी/नेता जनता का हितैषी नहीं होता। वह सिर्फ और सिर्फ अपनी पार्टी और अपने हित के लिए जीता-मरता है। लेकिन जनता हमेशा ठगी जाती है यह मान कर कि अमुक पार्टी उनके लिए ही है। पार्टी तो देश के हित में भी अच्छा काम नहीं करती तो व्यक्ति और समाज के लिए कैसे करेगी? उदाहरण के तौर पर भाजपा ने जिस वादे पर बहुमत प्राप्त किया क्या उसे तकनीकी तौर पर अमली जामा पहनाना संभव है? मोदी सरकार अब बहाने बना रही है कि आर्थिक रूप से जीर्ण-शीर्ण देशं विरासत के रूप में उसे मिला है। पटरी पर लाने के लिए टैक्स बढ़ाना उनकी मजबूरी है। तो क्या भाजपा पहले यह नहीं जानती थी कि देश कंगाल-बदहाल है? निश्चित रूप से जानती थी। यदि नहीं जानती थी, तो हमें यह मान लेना चाहिए कि भाजपा को देश चलाना नहीं आता। लेकिन ऐसा नहीं है। यह सब जनता के साथ सोचा-समझा छल है। एक प्रकार से जनता धीरे-धीरे यह बात समझने लगी है। इसका एक उदाहरण झारखंड की राजधनी राँची के मेयर चुनाव में देखने को मिला। लोग घर से वोट देने ही नहीं निकले। भारतीय जनता सब कुछ लुट जाने के बाद जगती है। वह भी कुछ समय के लिए ही। खैर! बड़ा हंगामा है देश के जनमानस में। यह हंगामा अपने 60 साल के जीवन काल में जब से मैंने होश संभाला है, तब से देख-सुन रहा हूँ। यह हंगामा है महँगाई का! महँगाई शब्द ही राजनीति से पे्ररित है। भारतीय समाज कितना मूर्ख है कि मोदी सरकार से 30 दिनों में ही महँगाई पर रोक लगाने की उम्मीद बनाये बैठी है। महँगाई तो कोई अवतारी पुरुष भी कम नहीं कर सकता। मोदी सरकार की क्या बिसात है कि महँगाई कम कर सके। सरकार भारतीय जनता से 32 प्रकार के टैक्स लेती है। उसी से देश का काम-काज चलता है। नेताओं के भारी-भरकम परिवार और अनाप-सनाप खर्च का भारी बोझ भारतीय जनता ही उठाती है। सरकारी संपत्ति के मनमाने ढंग से दुरूपयोग पर आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। जो पैसा देश के विकास पर खर्च होना चाहिए, उसकी 35 प्रतिशत राशि तो सरकारी संपत्ति के रखरखाव के अभाव में बरबाद हो जाती है। उदाहरण के तौर पर बिजली की खपत पर आइए- भारत सरकार से लेकर राज्य सरकार तक के कार्यालय में जाकर देखिए, यदि गर्मी के दिन हुए तो कार्यालय में कोई हो, न हो पंखे चल रहे होते हैं, ए. सी चल रही होती है, दिन में बिजली जल रही होती है। बिजली से चलने वाली मशीनों की जरूरत हो, न हो लेकिन चालू अवस्था में होती हंै। यही स्थिति ठंड के मौसम में भी है। माननीये के लिए जो महँगे आधुनिक वाहनों की खरीद होती है, उनकी उचित देखभाल नहीं की जाती। परिणास्वरूप वह छः माह से एक साल के भीतर कबाड़ के रूप में तब्दील हो जाते हैं। यह तो एक छोटा उदाहरण है। ऐसे कई मामले हैं यहाँ जो बहुत ही गंभीर हैं। क्या यह सब देश का आर्थिक बजट बिगाड़ने के लिए काफी नहीं है? मोदी जी इसका सही जबाव देंगे? हमारे संविधन में कई छेद हैं। कानून में अनगिनत विसंगतियाँ हैं। इन सब चीजों को दुरूस्त किये बिना कोई नेता या सरकार यह कहे कि हम भारत की ध्रती पर स्वर्ग उतार देंगे, तो इससे बड़ा कोई दंभ नहीं हो सकता। ऐसा कोई सरकार कहे तो उससे झूठी सरकार कोई नहीं होगी। लेकिन हमारे देश के लोग इस बात को नहीं समझते। देश में बेरोजगारों की संख्या, जिसमें पागल और भिखारी से लेकर स्टेशन पर जीवन गुजारने वाले वारिस-लावारिस बच्चे, महिलाएँ और पुरुष हों या खानाबदोश की जिन्दगी जीने वाले या खेतिहर मजदूर, या आलीशान भवन के निर्माण में लगे मजदूर या रिक्शा चालक हो या दिहाड़ी पर काम करने वाले मजबूर-मजदूर। जब तक इनका जीवन स्तर सरकार नहीं सुधरती, तब तक देश के विकास का दावा करना जनता को मूर्ख बनाने वाली बात होगी। मोदी सरकार मोदीजी से प्रभावित है। मोदी जी की क्या सोच है? वह थोड़ी-थोड़ी समझ में आने लगी है। आजादी के बाद से ही देश लड़खड़ाता हुआ चल रहा है। इस अवस्था में मोदी जी से तुरंत में कुछ भी उम्मीद कर लेना हमारी मूर्खता की पराकाष्ठा मानी जायेगी। मोदी जी की नीयत पर कोई शक करना बेमानी लगता है। मोदी जी चाहते हैं कि देश को एक आधुनिक और पूर्ण सभ्य देश बनाया जाये। उनके सपने जोर मार रहे हैं इस दिशा में। उन्हें रात को इस बात के लिए नींद नहीं आती होगी। लेकिन मोदी जी को एक बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि हमारे देश की जो मानसिकता है उसे बदलने के लिए विश्वास पैदा करना होगा। और इसके लिए देश के बेकार कानूनों को फौरन रद्द करना होगा। पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में जो अहंकारी भाव भरे हुए हैं, उन्हें तुरंत हटाने पर अमल करना होगा। साथ ही अनावश्यक रूप से फाइलों के निष्पादन की जो बिलंब भरी प्रक्रिया है, उसे दुरूस्त करना होगा। बिचैलियों और बड़े व्यापारिक घरानों पर पैनी दृष्टि रखनी होगी। तब विकास के झूठे झुनझुने की कर्कश आवाज के साथ जीने के लिए हम अभिशप्त नहीं होंगे और अच्छे दिन जरूर आयेंगे। अरुण कुमार झा, प्रधान संपादक.

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