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उनके एजेण्डे में देश नहीं


पूरी दुनिया दहशत में है। डरा हुआ व्यक्ति हर वह काम कर जाता है, सभ्य समाज जिसके लिए इजाजत नहीं देता। डरे हुए व्यक्ति से समाज की भलाई की अपेक्षा नहीं की जा सकती। डरे हुए व्यक्ति देशभक्त कदापि नहीं हो सकता। हम यहाँ भारत की बात कर रहे हैं। भारतीय समाज के लोग डरे हुए हैं। बचपन से ही हमें माँ-बाप द्वारा रिश्ते-नाते द्वारा, टोले-मोहल्ले के लोगों द्वारा डरा कर रखा जाता है। भगवान से डरो, भूत-पे्रत से डरो, बड़े-बुजुर्ग से डरो, शिक्षक से डरो, नदी-नाले से डरो, अंधेरे से डरो, धूप से डरो, ठंड से डरो। हर जगह हमें डरे रहने की सीख दी जाती है। प्रेम की बात कहीं नहीं होती। हौसले की बात कहीं नहीं होती। जब हम थोड़े बड़े होते हैं, दुनियादारी में आते हैं -यहाँ तो हर डग पर ही डराने का काम होता है। इतने डराने के साध्न हमारे यहाँ उपलब्ध हैं कि कभी अच्छे काम के प्रति सोचने की फझ्रसत ही नहीं होती। कानूनी डर ने तो हमारे जीवन को नरक ही बना कर रख दिया है। डर ही वह भाव है, जो हमसे सभी प्रकार के कुकर्म करा लेता है। डर के कारण समाजिक ताना-बाना ही बिगड़ गया है। अनुशासनहीनता, वैमनस्यता, इर्ष्या-द्वेष और फिर अंत में भीड़ में भी अपने को हमेशा अकेला महसूस करना ये सब जीवन के स्थायी भाव हो गये हैं। कोई भी सच बोलने का साहस नहीं करता। करे भी क्यों? अदालत में गीता पर हाथ रखवा कर कसम खाने के बाद भी आदमी को झूठ बोलना पड़ता है। डरा हुआ आदमी तो झूठ ही बोलेगा। झूठा व्यक्ति समाज का क्या भला करेगा। डरने और झूठ बोलने के हम कैसे आदी हो गये- इस पर गहन चिंतन-मनन करने की जरूरत है और यह अनुसंधन का विषय भी है। मेरी समझ है कि हम भारत के लोग हजारों वर्षों तक गुलामी करते रहे हैं, विभिन्न देशी-विदेशी शासकों के। हमारी रगों में वही डर दौर रहा है। इस गुलामी के जंजीर को तोड़ने के लिए हमने लम्बी लड़ाई भी लड़ी। पूरी जीत तो नहीं हुई लेकिन एक व्यवस्था ऐसी मिली जहाँ से हम पराजय भाव से उत्पन्न उस डर और झूठ की ग्रंथि को काट फेंक सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। और हम अपने को आजाद कहने लगे। लेकिन कैसी आजादी? यह आजादी तो हमें और अभी डरा-सता कर रखने वाली साबित हुई! नव सांमतवाद का उदय हुआ। जो किसी कारण से ज्यादा डरा हुआ था वह खूंखार हो गया। हमारे ऊपर शासन करने के लिए लुंज-पुन्ज और कमजोर लोकतंत्र की मजबूत लाठी के साथ- जहाँ सारे साधन हमारे (कमजोर) ऊपर अपना प्रभाव दिखाने से नहीं चूकते। अनुशासनहीनता इतनी कि लज्जा को भी लज्जा आ जाये लेकिन इन्हें लज्जा की कोई परवाह नहीं। देखिए न, आप स्वयं देखिए- चुनाव होते हैं। पार्टियाँ जीतती हैं. पार्टियों में जीत कर आते हैं वे कैसे लोग होते हैं? किसी कारण से चर्चित या कुख्यात होने चाहिए। किसी ईमानदार रिक्शेवाला या सिपाही को आपने देखा-सुना है। जिसे किसी ने उसे अपनी पार्टी से खड़ा किया और चुनवाया? ऐसा नहीं होता है। कोई पूँजीपति, जिसे कल तक कोई नहीं जानता था, उसे पैसे के बल पर रातोँ-रात हीरो बना दिया जाता है। खैर! यह हुआ एक पक्ष। दूसरा पक्ष तो और भी भयानक और घिनौना है। देखिए- 67 साल आजादी के बीत गये लेकिन जनता अभी तक डर के मारे जागरूक नहीं बन पायी है। मूर्ख ही बनी हुई है। इसका फायदा नेता उठाकर भारतीय जनता का घोर अपमान करने से नहीं चुकते- हमारे विवेक पर स्वार्थ और दोगली नीति का पर्दा डाल कर। फर्ज कीजिए कि काँग्रेस पिछले चुनाव में नहीं चुनी गई, तो दूसरे पक्ष की पार्टियों ने उसे हर प्रकार की गालियाँ दीं। कल वही बात उनके साथ भी होगी। राजनीति में ऐसा होता ही रहता है। यहाँ एक सवाल उठता है कि काँग्रेस हो या कोई भी अन्य पार्टियाँ सब इसी जनता पर निर्भर हैं। सबका उद्देश्य तो देश सेवा और समाज की भलाई (हालांकि अब ये सारी बातें दूर की कौड़ी हो गयी हैं। अब तो लोग राजनीति को धन्धे के रूप में अपनाने लगे हैं।) करना होता है। तो हारने वाली पार्टियाँ को जीतने वाली पार्टियाँ हिकारत की नजर से क्यों देखती हैं? जब कि उन्हें भी लाखों जनता वोट देती है, इसका मतलब यह हुआ कि लाखों जनता टुच्ची है हारने वाली पार्टियों की जैसी? तीसरी बात यह कि आज आजादी के 67वें साल में भी हमारे देश की पार्टियाँ इतनी उद्दंड क्यों बनी हुई हैं कि उनके सदस्यों के दिमाग में हमेशा नफरत के बीज भडे़ रहते हैं। घृणा के भाव से ग्रसित रहती हैं कि मौका मिला नहीं कि विपक्षी पार्टियों के प्रति जहर उगलने लगते हैं। संसद से लेकर सड़क तक इनकी घृणा और अनुशासनहीनता की बानगी एवं दूसरे के प्रति नफरत देखने को मिल जाता है। इससे ऐसा लगता है कि देश किसी एक की बपौती है या फिर खास पार्टी की निजी संपत्ति। ऐसे लोग से समाज की भलाई की उम्मीद करना अपने को छलने जैसा लगता है। उनके ऐजेंडा में देश नहीं है। उनका अपना कैरियर है। यदि देश दिखता तो सब के लिए सम-भाव की जगह नफरत और घृणा की राजनीति नहीं करते। जिस प्रकार से वर्तमान में राजनीतिक मर्यादा को ताक पर रख राजनीति की जा रही है, वैसे में आने वाला कल देश के लिए घोर अंधकारमय होगा। अरुण कुमार झा प्रधान सम्पादक

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