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बिना माइंडसेट के बदलाव संभव नहीं


शायद पूरी दुनिया भ्रष्टाचार से त्रास्त है। सुबह के अखबार हों या मीडिया रिपोर्ट- भ्रष्टाचार की महामारी के समाचार सुर्खियों में होते हैं। पियून से लेकर जज तक के भ्रष्टचार में लिप्त होने की खबरें आये दिन हमें सुनने को मिलती हैं। क्या हो रहा यह सब! समझ में से परे है। यह एक पहेली बनी हुई है। हर कोई इसे सुलझाने में लगा हुआ है। इस पहेली को सुलझाते-सुलझाते कब भ्रष्टाचार में हम लिप्त हो जाते जाते हैं , पता ही नहीं चलता। ऐसी विकट स्थिति में हम फंसे हुए हैं जिसके कारण असली भ्रष्टाचारी का पता नहीं चल पाता। एक कहानी आपने जरूर सुनी होगी कि 11 आदमी का एक समूह कहीं जा रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। उसे नदी पार करना था। पार कर जाने के बाद समूह के मुखिया ने कहा कि हम लोग कितने आदमी चले थे, इसकी गिनती करो। कहीं कोई छूट तो नहीं गया। गिनती शुरू होती है। गिनती मुखिया ने ही शुरू की। मुखिया अपने को छोड़कर अपने से आगे वाले से गिनती शुरू करता लेकिन वह 11वें आदमी को नहीं ढूंढ पाता। मुखिया परेशान होकर कहता कि शायद एक आदमी नदी में डूब गया। चलो फिर से एक बार गिनती शुरू करते हैं। अब मुखिया के बाद वाला आदमी को गिनती करने को कहा जाता है। वह भी मुखिया की तरह ही गिनती करता। इस बार भी गिनती में 10 आदमी होते हैं। सभी परेशान होते हैं। फिर क्या था बारी-बारी से सभी ने गिनती शुरू की। गिनती करते-करते शाम हो आई लेकिन किसी की गिनती सही नहीं हुई। यही बात हमारे सामने है कि भ्रष्टाचारी ‘मैं’ नहीं कोई दूसरा है। जो पकड़ में नहीं आता। तात्पर्य यह कि हम सब कहीं-न-कहीं भ्रष्टचार में लिप्त हैं। लेकिन हम अपने को भ्रष्ट मानने से कतराते हैं। लेकिन जनाब! हमारे संविधन में तो 11वें आदमी की गिनती के बाद 12वें का प्रावाधन किया हुआ है। वह 12वाँ कौन है यह समझना आवश्यक है, जो उसी भ्रष्टाचार के पंकपयोध् िमें लिप्त हो गया है। यों कहें कि मौका मिलते ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूब जाने के लिए आतुर है। आपने एक छोटा सा उदाहरण देखा- तारा शाहदेव प्रकरण में रंजीत कोहली उर्फ रकिबुल और भ्रष्टचार में साथ देने वाले 12वें आदमी के चरित्रा को। ऐसे रकिबुल या रंजीत और उनका साथ देने वाले ये 12वें ;संवैधनिक पद पर बैठे हुए आदमीद्ध लाखों की संख्या में हैं। भ्रष्टाचार तो सुबह-शाम हमारे साथ उठने-बैठने वाले ही करते हैं। सब इसी समाज के अंग हैं दूसरे को गाली देने के लिए। सब के मुख पर भ्रष्टाचार की गहरी कालिख पुती हुई है। इस कालिख को मिटाना कोई आसान काम नहीं है। इस कालिख को मिटाने की जिसकी जिम्मेदारी है वह खुद कालिख लगाये बैठा है। पहले जब तक अपनी कालिख धे नहीं लेते, दूसरे की कालिख धेने की जिम्मेदारी लेना दो बिल्लियों के बीच रोटी का न्यायिक बंटवारा जैसी बातें लगती हैं। खैर! भारत बदलाव के लिए करवट ले रहा है। यह मुमकीन हुआ है नरेन्द्र मोदी के कारण। नरेन्द्र मोदी की सोच राजनीतिक पार्टी के स्तर से ऊपर उठकर है। ऐसे में सब कझ्छ तो नहीं लेकिन आंशिक रूप से देश में मौलिक बदलाव आयेगा। नरेन्द्र मोदी महात्मा गांधी के सपने को पूरी तरह साकार करना चाहते हैं। उन्होंने संसद सदस्य बनने के बाद जिस प्रकार से महात्मा गांधी को नमन किया और फिर संसद भवन की देहरी पर जिस प्रकार से अपना शीश नवाया उसी दिन नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक मौलिकता के दर्शन देश के लोगों ने किया। यह अलग बात है कि उस भावना को उसी प्रकार से देश के लोग नहीं समझ पाए। लेकिन कालक्रम में लोग समझने लगेंगे जो निश्चित रूप से देश के लिए सुनहरा आदर्श प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार के आदर्श से देश के चरित्रा का पुनर्निमाण हो सकता है। लेकिन सब कझ्छ तभी संभव है जब हमारे देश के हर व्यक्ति का ‘माइंडसेट’ बदले। जब तक माइंडसेट नहीं बदलता कोई भी बदलाव संभव नहीं लगता। राजनीति इतनी टुच्ची हो गई है कि देश की अस्मिता की समझ को ही नष्ट कर दिया है। देशहित की बुनियादी बातें भी विपक्ष वाले विपक्ष की तरह लेते हैं। यह स्थिति देश और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक है। आजकल मौसम है हिन्दीयाना। सो हिन्दी पर हम यहाँ बात न करें तो अन्याय ही होगा। यहाँ तो अन्याय ही होता आया है आज तक। न्याय की आशा धूमिल हो चुकी है। फिर भी हम विश्वास लिए इस आशा की ध्रातल पर जमें हुए हंै। हिन्दी की बरखी के भोज खाने के लिए। हर वर्ष उर्स के मेले की तरह हिन्दी दिवस के मेले लगते हैं। इस भारतभूमि पर सरकार द्वारा बिछाई हुई विसात पर दस्तख्वान लगते हैं। पुरोहित जिमते हैं। हिन्दी के इस ब्रह्मभोज में देश के अलग-अलग महकमे में राजभाषा के नाम पर राजभोज के आयोजन से देश शर्मशार हैं। वहीं पुरोहित लोग अपनी वही सड़ी-गली हुई हिन्दी के मंत्रा का जाप कर दक्षिणा लेते हैं और श्राðकर्म में पूर्णाहुति देते हैं। इतिश्री करते हंै। आयोजक भी खुश, पंडित जी भी खुश, राजभाषा विभाग भी खुश! लेकिन यह स्थिति हिन्दी के लोगों की चरित्राहिनता को ही दर्शाती है। –

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