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आखिर कब तक चलेगा बुजुर्गो की भावनाओं के साथ खिलवाड़


अखंड गम्हरी

                                   अखंड गम्हरी

गृहस्‍त आश्रम में प्रवेश क्‍या किया हम जीना ही भूल जाते है।भविष्‍य और बच्‍चों की चिन्‍ता में दिन रात लगें हुए पाई पाई जोड़ कर अपने बच्‍चों का सुख और उनका भविष्‍य खरीदना चाहते है। हम भूल जाते है हमारी अपनी भी जिन्‍दगी है। अपने अरमानों को अपने सपनों को कर्तव्‍य दर कर्तव्‍य बढ़ाते चले जाते है।जिन्‍दगी की सारी पूँजी, सारी क्षमता बच्‍चों के लिये लगा देते है। मगर वही बच्‍चे जब बड़े होकर हमारी भावना की कद्र नहीं करते तो आसमा से जमीं पर चले आते है। बच्‍चों का पद और वैभव का बखान तो समाज के आगे करते है, मगर हमारा दिल खून के आँसू रोता है। बचपन में शुरू हुआ चुल्‍हे चौके और बच्‍चों के संभालने का दौर खत्‍म नहीं होता। कभी भाई कों संभालना कभी बच्‍चों को और अंन्‍त में बच्‍चों के बच्‍चों को और फिर रसोई भी उसी तरह। आज का युवा कम स्‍वार्थी नहीं है। जब उसे अपने बच्‍चों को पालने एवं अपनी शहरी घरों को संभालने के लिये एक आया की जरूरत होती है तो वह अपने मॉं-बाप की तरफ हसरत भरी निगाहों से देख कर, उनसे प्‍यार जता कर अपने साथ लेआता है। समस्‍या दूर होने के साथ साथ वह \’\’\’मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं \’\’\’कि तर्ज पर उनकी उपेक्षा करना शुरू कर देता । नतीजा सास – बहू की खटपत। आज के बुजुर्ग बच्‍चों के साथ या अलग रहने किस में सुखी है। शायद यही जबाब मिलता है कि वह अलग रहना ही पंसद करते है। आखिर क्‍यों जिन्‍होनें हमारे लिये सब छोड़ा वही आज हमसे दूर रहना पंसद करते है। शायद इसका कारण हम या आज का युवा है। वह अपने स्‍वार्थ में उनका बलिदान भूल कर उसे उनका कर्तव्‍य का नाम देकर उनकी भावना को आहत करता है। कहा जाता है किताबी ज्ञान से संसार नहीं चलता, संसार अनुभव से चलता है।आज का युवा वर्ग अपने बुजुगोे को नकारा समझता है। यही कारण है कि वह अपनी उपेक्षा बर्दाश्‍त नहीं कर पाते है। उनके साथ रहते हए भी वह काफी दूर रहते है।आज का युवा कम्‍पूटर,मोबाइल और अपनी पत्‍नी के कहने पर घंटों बर्वाद कर देता है, मगर अपने मॉं- बाप के पास चंद मिनटों बैठना उसका हाल चाल लेना जरूरी नहीं समझता है। विवाह के बाद युवक अपने मॉं-बाप की इज्‍जत करे न करें मगर अपनी पत्‍नी के परिवार के लोगों को जी लगा के ही संबोधन करता और उनकी सुनता है। उसकी पत्‍नी भी माइके से आने वाले दूर के रिश्‍तेदार की घंटों आवाभगत करती है। पति के मॉं-बाप के लिये दो पल नहीं होता है उसके पास जिससे बुजुर्ग अपनी तौहीन समझते है। बेटे बहू का साथ छोड़ अपने घोसले में लौट आते है। यहॉं एक बात और गैर करने लायक कि ऐसा नहीं बुजुर्ग चाहते नहीं अपने बेटे बहू के साथ चलना आज के युवा के साथ चलना। मगर आज के युवा उनको अपने साथ ले चलना नहीं पंसद करते। उनकी बातों को पुराने जमाने के ख्‍याल कर उनके भावना को चोट पहुँचते है। बच्‍चे और बूढ़े एक समान होते है। प्‍यार और चाहत के भूखे होते है। उनकी हॉं में हॉं मिला कर उनसे अपनी बात कही जाये तो वह समझ जायेगे।क्‍योंकि वो मॉं-बाप है, दुश्‍मन नहीं। मगर आज का युवा उनकी भावना को दरकिनारा कर अपने आपको श्रेष्‍ठ साबित कर, उनकी भावना को चोट पहुँचता है। शायद इस लिये ही आज के बुजुर्ग तमात संसारिक कष्‍ठ को झेलते हुए अकेले रहना पंसद करते है। और हमारे पास आज के युवा एक फोन करके उनका हाल चाल लेने की जहमत नहीं उठाता।जिन्‍दगी भर भीड़ भाड़ कर्तव्‍यों से घिरा बुजुर्ग। अकेला पन का शिकर हो कर मौत के मुहँ में चला जाता है। हम बहाते रहते है घड़ियाली ऑंसू। दाने दाने को तरसने वाले बुजुर्गो के नाम पर करते है लाखों का आयोजन। मरने के बाद भी उसके नाम पर युवा करता है लोगों के नाम पर उनकी भावना से खिलवाड़। आखिर कब तक चलेगा ये कब सीखेगें हम बुजुर्गो के साथ चलना, उनको इज्‍ज्‍त देना, आत्‍म सम्‍मान लौटाना।आखिर कब तक। कब तक हम करेगें मजबूर उनको तिल तिल मरने पर ।।

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