Girish Pankaj
गिरीश पंकज
सम्पादकीय सलाहकार
Arun Kumar Jha
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प्रधान संपादक
Rajiv Anand
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संपादक
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संपादन सहयोगी
• गांधी जी की शहादत • 10 लाख डॉलर कीमत की है आलू की यह तस्वीर • बिल गेट्स से दोगुनी संपत्ति है पुतिन के पास जानिए इस रईस को • षष्ठम अन्तर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (थाईलैण्ड) • भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर रांची के पहाड़ी मंदिर पर विश्व का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय तिरंगा फहराकर इतिहास रचा • संगीता सिंह भावना की तीन कविताएँ • नमो पतंगबाजी की धूम • ट्रैफिक सुरक्षा सप्ताह का दूसरा दिन  • जबरा करे तो दिल्लगी, गबरू का गुनाह…!!

अनवर सुहैल की छः कविताएँ


एक
जब कोई करता है विध्वंस
कवि एक अच्छी कविता सिरजता होता है
जब कोई उगलता है नफरत के जुमले
कवि शब्दकोष में खंगालता है
प्रेम, भाईचारा, दोस्ती और अमन के पर्यायवाची शब्द
जब कोई ताकता है शेयर बाज़ार के उतार-चढाव
कवि अपनी मासिक आय के दस प्रतिशत दाम की
खरीदता है कविता की किताब
जब कोई ऐंठता है पद-प्रतिष्ठा के बल पर
कवि जुड़ता है विरासत से, ज़मीन से, लोक से
और पाता है भरपूर ऊर्जा नए सृजन की
जब कोई करता होता है जुगाड़
पुरूस्कार, सम्मान या पदस्थापना का
कवि लगाकर गोते संवेदनाओं के सागर में
खोज लाता नये मुहावरे, नए प्रतीक, नए बिम्ब
जब कोई करता आन-तान खरीददारी
अपने जीवन की दरिद्रता से बेपरवाह
कवि अपनी कविता का तापमान जानने के लिए रहता बेचैन….

दो
अच्छा हुआ मैं किसान न हुआ

सपने सच नहीं होते
तो क्या सपने देखे नहीं जाएँ
औरों से मुझे क्या
मैं तो देखना चाहता हूँ
उन खेतों में लहलहाती धान की बालियाँ
जिनमें कुछ दिनों पहले
ढेर सारी श्रम-बालाओं ने की थी धान की रोपाई
कि जिनके गीत के बोल अब भी गूँज रहे हैं खेत की मेंडों पर
ये सच है कि सपने होते नहीं सच
लेकिन झूठ ही सही इन सपनों से ही
दीखती आशाओं की दीप्ति
माना कि एक और बारिश आ जाती
तो फिर इस बरस भी हम क्या इस समय
बैठे होते हाथ पर हाथ धरे
बल्कि खलिहान की कर रहे होते मरम्मत
सुमारू की दाई कूबड़ वाली कमर लिए
लीपती होती गोबर से खलिहान
सुमारु खलिहान के चारों ओर रूंध रहा होता बाड़ी
और बांस से बना रहा होता छोटा सा मचान
ताकि पक कर जब धान की बालियाँ आयें
तो हो पूरी सुरक्षा अन्न-धन की….
मैं जानता हूँ कि ये सपना है
खेत की तरफ अब ताकने से भी होती है पीरा
जैसे कि सब-कुछ ख़तम हो गया हो
सिवाय इस एक स्वप्न के
एक राज़ की बात बताऊँ
सपने अब यथार्थ से भी डरावने आने लगे हैं
जिनमें सूखे खेत, पैरों की बिवाई से फटी धरती
कंकाल बने ढोर-पशु और इन सबके बीच
चील-कव्वों घिरी एक किसान की मृत देह
मैं जो करीब गया तो देखा
अरे…ये तो खुद मेरी ही देह है….
और अब मैं रात-रात भर जागता रहता हूँ
सोता नहीं कि कहीं फिर से
आ न जाएँ डरावने सपने…..

तीन
उदासीनता
गवाह कितने भी हों चुस्त
सबूत कितने भी पुख्ता हों
इसके बिना पर क्या दे पायेंगे
अपराधी को सज़ाएँ
गवाह टूट जाते हैं
सबूत बदल दिए जाते हैं
और अपराधी पाते तो रहते हैं
आये दिन संदेह का लाभ…
इसीलिए मित्र हमें चाहिए
कि मुकदमे अदालतों में लड़े जाएँ
कि नहीं रहा अब
जंग के मैदान में लड़ने का जमाना
और किसी अन्य ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे की
चौधराहट में तो कतई भी नहीं..
अपने बूते अपने दम
जीतेंगे मुकदमा हम…

चार
कोई नहीं अपना
कोई नहीं अपना
ये कैसी निराशा का दौर है
हर कोई कुछ न कुछ लेना ही चाहता है
देने की बारी आये तो
घूरता है जैसे पहचानता ही न हो
और दुत्कारकर दिखलाता है ठेंगा..
कोई नहीं अपना
कुलदेवी-देवता भी जैसे रूठे हों
और उनके बनाये बड़े-बड़े उपासना-घरों से
उनके निर्माताओं की दर उमड़ती है खुशियाँ
घुमड़ती हैं सुख-सुविधाएं
जिन उपासना-घरों में हम लगाते
सांझ-सवेरे झाड़ू-पोंछा…
कोई नहीं अपना
कहते हैं भारी जिल्दवाली किताबों में
विशालकाय विश्व-विद्यालयों में
हमारी बेहतरी के लिए जाने कितने हो रहे शोध
गांधी बाबा के उस पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को
जाने कब से खोज रहे शोधार्थी..नेता-परेता..अधिकारी
और दुर्भाग्यवश हम उन्हें दिखलाई नहीं देते
हम क्या करें
कहाँ जाएँ
किसकी अरदास करें…..

पांच
कातिल सिखा रहे कि सुनो क़त्ल है गुनाह
गर कत्ल है गुनाह तो सजा भोगना होगा
कातिल बता रहे हैं फर्क क़त्ल और क़त्ल में
कातिल करे है क़त्ल तो वो प्रतिक्रिया का फल
गर तुम करे हो कत्ल तो वो देशद्रोह है…
छः
जान की कीमत
कितने कम रुपयों में खरीदी जा सकती है
एक गरीब की जान
बस इत्ते से रुपये ही में न….
गरीब खुद नहीं जानता क्या है
उसकी जान का न्यूनतम समर्थन मूल्य
कितना बोनस बनता है अकारण मारे जाने पर
कैसा समय है ये साथियों
जबकि गैरज़रूरी चीज़ें भी
निर्धारित करती हैं खुद ही अपना मूल्य
एक इत्तू सा मेमोरी कार्ड भी मिलता कितना महंगा
और इस गरीब की जान का मोल
अब तक नहीं निर्धारित कर पाई हैं
दर्जनों-सैकड़ों संस्थाएं मिलकर भी…
अब चाहे दुर्घटना हो या गैर-इरादतन हत्या
पुलिस और कचहरी के चक्कर काटने से बचने के लिए
अपने प्रिय की मौत का मोल-भाव करते निर्धन
बिचौलियों के भरोसे पिसे जाते अनवरत
पोस्ट-मार्टम के बाद प्रियजन की लाश
जाने कितनी बार चीरी-फाड़ी जाती है
और थक-हार कर मुट्ठी भर रुपयों में
अपमान सहकर बेच दी जाती हैं संवेदनाएं…पीडाएं….
(अनवर सुहैल : टाइप ४/३ आफिसर कालोनी पो बिजुरी जिला अनुपपुर मप्र ४८४४४० )

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