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अंग्रेज शासकों का जैविक व्यवहार


-अरुण माहेश्वरी

(सालों पहले, उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ पर एक नोट लिखा था, जिसका बाद में कभी प्रयोग नहीं किया जा सका। आज अचानक हमारे कमप्यूटर पर वह नोट हमें मिल गया। आज ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रसंग में इच्छा हो गयी कि क्यों न इस नोट को साथियों के साथ साझा किया जाए। अंग्रेज व्यापारियों और शासकों के सामान्य जैविक व्यवहार को इस नोट में समझने की एक छोटी सी कोशिश की गयी है। बाद में कभी किसी लेख में इसका सही रूप में इस्तेमाल किया जायेगा। )
वारेन हेस्टिंग्स का सांड़। उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी। चार साल पहले ‘इंडिया टुडे’ के साहित्य अंक में जब यह छपी थी, पूरा हिंदी जगत इसकी बुनावट पर अचंभित हुआ था। भारत में औपनिवेशिक शासन के शुरू के समय के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के कथित प्राच्य प्रेम की कहानी पर केंद्रित यह कहानी कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में लगी उस तस्वीर से जुड़ी कल्पनाओं से उपजी थी जिसमें हेस्टिंग्स अपनी युरोपीय बीबी के साथ अकड़ कर खड़े हैं और बीबी के बगल में खड़ी नेटिव लड़की चोखी अपनी सहजता से अनायास ही किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। लाट गवर्नर और उनकी बीबी के साथ चोखी की इस सहजता को देख कर लेखक चोखी को हेस्टिंग्स के ‘प्राच्य प्रेम’ और अंग्रेज अफसरानों की भारतीय मिस्ट्रेस की आम बात से जोड़ देता है और एक ऐसा किस्सा तैयार होता है जो पाठकों को प्राय: एक प्रकार के सम्मोहन में बांधने के साथ ही औपनिवेशिक शासन और उसके प्रतिरोध की समस्या के कई गहरे और बहसतलब विषयों को उठा देता है।
‘हंस’ के पृष्ठों पर राजेन्द्र यादव ने इस कहानी में गाय प्रजाति के सांड़ के रूपक से उपनिवेशवाद के प्रतिरोध में प्राच्यवाद की हिंदुत्ववादी अवधारणा को स्थापित करने का आरोप लगाते हुए जो बहस शुरू की थी, वह भी ऐसी ही एक बहस का मुद्दा था। दिल्ली में हाल के राष्ट्रीय नाट्य-उत्सव के अवसर पर इसी कहानी पर ‘अस्मिता’ नाट्यमंडली के नाटक को देख कर लगा कि इस नाटक ने इस प्रकार की बहस की संभावना को और भी ज्यादा मूर्त कर दिया है। खास तौर पर आज के राजनीतिक परिवेश में इस कहानी के वास्तविक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को पकड़ने में जरा सी चूक करने पर ही इसपर हिंदुत्व के विचारों की छाया का अभियोग आराम से लगाया जा सकता है। इसलिये यह जरूरी जान पड़ा कि इस कहानी और नाटक के बहाने ही इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का जायजा लिया जाये और देखा जाये कि इस कहानी में कितना कुछ ऐतिहासिक तथ्यों का दुहराव है और कितना उदय प्रकाश की कल्पना का योगदान है? तभी उदयप्रकाश के अपने आशय और विचारधारा पर भी कोई सही राय दी जा सकेगी।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि वारेन हेस्टिंग्स ने उन प्राच्यवादियों को काफी बढ़ावा दिया था जो उन दिनों भारत के इतिहास, यहां के आम लोगों के रीति-रिवाजों, और स्थानीय भाषाओं को सीखने के काम में लगे हुए थे। प्राच्य-विद्या के क्षेत्र में उसी समय से काफी महत्वपूर्ण काम शुरू हो गये थे। वारेन हेस्टिंग्स औपनिवेशिक प्रशासन का ‘भारतीयकरण’ करना चाहता था ताकि यहां के गुलाम लोगों की मानसिकता को समझा जा सके और औपनिवेशिक नीतियों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं का सही अंदाजा लगाया जा सके, और अचानक किसी भी व्यापक अव्यवस्था के खतरे से औपनिवेशिक शासन को बचाया जा सके। इसे वह भारत में अंग्रेजों के शासन के स्थायित्व के लिये जरूरी मानता था। अंग्रेज इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि वे भारत की तरह के इतने बड़े देश पर शासन करने के लिये संख्या की दृष्टि से ही बेहद कमजोर स्थिति में हैं। कहते हैं कि लार्ड क्लाइव जब प्लाशी के युद्ध के ठीक बाद बंगाल की राजधानी मुर्शीदाबाद में घुसा था तो उसे सिर्फ मुर्शीदाबाद शहर का विशाल आकार और यहां के लोगों की समृद्धि ने ही आकर्षित नहीं किया था, बल्कि वह यहां की इतनी बड़ी आबादी को देख कर यह सोच कर चिंतित था कि यदि यह विशाल जन-समुदाय ठान लें कि भारत से युरोपियनों का अंत करना हैं तो वे यह काम सिर्फ पत्थरों और डंडों के बल पर ही कर सकते हैं। लेकिन फिर भी यहां के लोगों ने ऐसा क्यों नहीं किया, यह एक ऐसा सवाल है जिस पर काफी बहस हो सकती है। लेकिन यह सच है कि भारत में अपने पैर जमाने की प्रक्रिया में अंग्रेजों को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। इस मामले में सिर्फ इतना कह देना काफी नहीं हो सकता कि सात समुंदर पार से एक विकसित सभ्यता और संस्कृति ने एक पिछड़ी हुई सभ्यता और संस्कृति पर वर्चस्व कायम कर लिया। सभ्यता पर सभ्यता की विजय इतनी इकतरफा और सरलरेखीय नहीं हो सकती है।

डेविड कॉफ ने अपनी किताब ‘ब्रिटिश ओरियंटलिज्म एंड द बेंगोल रिनैसांस – द डायनामिक्स ऑफ इंडियन मौडर्नाइजेशन’ में लिखा है कि भारत में अंग्रेजों के वाणिज्य के शुरूआती दिनों में अन्य व्यापारिक समुदायों की तरह ही अंग्रेज भी स्थानीय भाषाओं को सीखते थे, कुछ स्थानीय जीवन शैली को अपना लेते थे, मसलन हुक्का पीना या धोती और कुर्ता पहनना और कुछ मामलों में तो यहां की औरतों से शादी भी कर लेते थे।(पृ:15) कोलकाता के निर्माता के रूप में जाने जाने वाले जाब चार्नोक का एक चित्र कोलकाता के बारे में एचईए कॉटन की किताब में मिलता है जिसमें चार्नोक एक पीपल के पेड़ के नीचे हुक्का लिये हुए पायजामा पहने बैठकखाना बाजार के अपने व्यापारी दोस्तों के साथ बतिया रहे हैं। उन्होंने एक बंगाली विधवा से शादी की थी, जिसके बारे में कहते हैं कि चार्नोक उसे जलती हुई चिता से बचा कर लाये थे और उससे उन्होंने तंत्र विद्या सीखी थी। अन्य अनेक परिवारों की तरह ही घरेलू मामलों में उनकी पत्नी ही महत्वपूर्ण फैसले किया करती थी। चार्नोक कंपनी के कामों में व्यस्त रहता था।
कहने का तात्पर्य यह है कि मानवीय जीवन-व्यापारों से जुड़ा सारा मामला ऐसा नहीं होता कि ‘वे आये, देखा और जीत लिया’। व्यक्ति जीवन और शासन की नीतियां, दोनों की ही कईं तहें होती है। यह बात आर्थिक तत्व की नियामकता को स्वीकार कर भी कही जा सकती है और यही से वे सारे किस्से पैदा होते हैं जो ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ की तरह की कहानी के रूप में सामने आते हैं।
मसलन, एक मामले में अंग्रेजों के शासन और अफगान तुर्कों के शासन में अनोखा साम्य दिखाई पड़ता है। ये दोनों ही भारत की तरह के विशाल देश में अपनी नगण्य संख्या की सचाई से अच्छी तरह परिचित थे। भारत को जीत तो इन्होंने काफी आसानी से लिया, लेकिन असल समस्या यहां शासन करने की थी। यह चीज तब तक मुमकिन नहीं थी जब तक गुलाम बनायी गयी आबादी के प्रभावशाली तबकों के साथ उनका कोई गठजोड़ कायम नहीं होता। इसीलिये अफगान तुर्कों ने जिस तरह यहां की आबादी के धर्मांतरण को अपने शासन का प्रमुख मुद्दा नहीं बनाया उसी प्रकार अंग्रेजों ने भी ऐसा नहीं किया। शासन के अंदर के कुछ लोगों का मत भले ही ऐसा रहा हो, लेकिन मोटे तौर पर इन साम्राज्यों ने स्थानीय धर्म और रीति-रिवाजों के साथ जोर-जबर्दस्ती करने से बचने का रास्ता ही चुना था। यद्यपि प्रकारांतर से वे हमेशा यह कोशिश जरूर करते रहे कि यहां की आबादी में शासकों की तुलना में एक प्रकार की हीन ग्रंथी को भरा जाए। इसके साथ ही स्थानीय लोगों से अपने संपर्क सूत्र के तौर पर यहां के समाज के ही एक वर्ग को तैयार भी करते रहे, और स्थानीय आबादी को धर्म, जाति आदि के नाम पर बांट कर रखते रहें, ताकि वह कभी भी औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ एकजुट न हो सके। इसलिये यदि मुगलों ने गोवध पर रोक को मान लिया था तो अंग्रेज भी उसी नीति पर चलते रहें। इसीलिये यदि किसी रचना या निबंध में इस तथ्य को बताया जाता है कि अंग्रेजों ने यहां गोवध पर रोक को मान लिया था या अन्य किसी प्रथा, मान्यता या रीति-रिवाज को छेड़ा नहीं था तो सिर्फ इसी बात से इन सारी मान्यताओं और विश्वासों का औचित्य प्रमाणित नहीं हो जाता। कुछ हद तक औचित्य तो तब प्रमाणित होता जब ऐसी मान्यताएं और विश्वास ब्रिटिश जीवन के अंग बन गये होते। अफगान तुर्कों और अंग्रेजों ने भारत के लोगों के परंपरागत जीवन को काफी हद तक अछूता छोड़ने का निर्णय लिया तो सिर्फ इसलिये कि वे इन मामलों में दखलंदाजी से पैदा होने वाली व्यापक अव्यवस्था से आतंकित थे और यहां की आबादी की तुलना में अपनी अतिअल्प संख्या पर विचार करके ही ऐसे किसी जोखिम को उठाने के लिये तैयार नहीं थे। यहां सती प्रथा और बाल विवाह के बारे में अंग्रेजों द्वारा कानूनी कदम उठाने के इतिहास पर भी गौर किया जा सकता है। जो लोग इन मामलों में राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा हिंदू समाज के अंदर ही चलाये गये शास्त्रार्थ के इतिहास से परिचित है वे आसानी से इस निष्कर्ष पर पंहुच सकते है कि लार्ड बेंटिक ने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाने का जोखिम तभी उठाया जब उसे इस बात का पूरा भान हो गया कि स्थानीय मान्यताओं और शास्त्रों के आधार पर भी उस कानून की पुष्टि होती है।

वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ के संदर्भ में इस पूरी चर्चा से तात्पर्य यही है कि जब इसमें गोवध पर रोक की बात को शासक की प्रशंसा के तौर पर कहा जाता है तो यह एक अल्पसंख्यक शासक तबके की नीतियों को पेश करने वाले सिर्फ एक ऐतिहासिक तथ्य का बयान होता है न कि गोवध या इसी तरह के विषयों पर पारंपरिक विश्वासों को दी गयी लेखक की स्वीकृति। इस बात को समझने में असमर्थ दर्शक या पाठक कथा के मर्म को पकड़ने में निश्चित तौर पर चूकेगा।
इसी प्रकार हेस्टिंग्स की कृष्ण भक्ति, गीतगोविंद के पदों से मस्त चोखी के साथ उसकी केलियों को मालिक के बेटे की किशोर वय की सहजताओं से जोड़ कर देखा जाना चाहिये, न कि भारत की धरती, यहां के हवा-पानी में समाये अनोखे विस्मयों की गाथाओं की स्वीकृति के रूप में। यदि ऐसा नहीं होगा तो कल्पनाओं के घोड़ों पर सवार जवान हसरतों की अनूठी बातों का कही भी कोई मायने नहीं रह जायेगा। जिस हेस्टिंग्स की मसे भी अभी नहीं फूटी थी, वह हमउम्र नेटिव लड़की के आकर्षण में कृष्ण सज कर बांसुरी बजाता फिरे तो क्या आश्चर्य है? यह दीगर है कि गोरे छोकड़े का ही यह व्यवहार दासों को इसलिये आह्लादित करता है क्योंकि वे मालिक के बेटे से ऐसे सहज मानवीय व्यवहार की उम्मीद जो नहीं करते थे। यही दासवृत्ति आज तक हमारे पाठकों और दर्शकों के मानस को विकृत किये हुए है। वर्ना जहां हेस्टिंग्स अथवा चोखी भी किशोर वय के दायरे के बाहर जाते हैं उनके व्यवहारों की उस निश्छलता को गायब होते जरा भी देर नहीं लगती है। दोनों अपनी सीमाओं और अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं। युवा से प्रौढ़ हो चुका गवर्नर जनरल हेस्टिंग्स तो किसी भी अन्य शासक जितना ही निष्ठुर, स्वार्थी और कपटी होता है। उसका ‘प्राच्य प्रेम’ चोखी या उसकी संगत की देन नहीं था, जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, वह एक अति-अल्पमत वाले शासकवर्ग की शुरू के दिनों की नैसर्गिक आवश्यकता थी।
जो भी हो, कहानी के इस किशोर-वय के प्रेम के अतिरिक्त दूसरे कई ऐसे पहलू है जो ब्रिटिश शासकों की खास मानसिकता के पक्षों को उजागर करती है। मसलन, अंग्रेज अधिकारियों का आम सेक्स व्यवहार। यह इतिहास है कि भारत में अंग्रेजों के काफी पहले ही पोर्तुगीज आकर बस गये थे। पोर्तुगीज लोगों के बारे में यह अनुभव था कि स्थानीय लोगों के साथ सेक्स संबंधों को बनाने के मामले में वे काफी बेपरवाह थे और इसी के चलते काल-क्रम में यह देखा गया कि वे अपने रूप-रंग और सामान्य आदतों के मामलों में भी स्थानीय लोगों से प्राय: एकाकार हो गये थे। उनकी अलग पहचान ही खत्म हो गयी थी। इसीलिये अंग्रेज अफसरों को यह खास हिदायत थी कि वे अपने सेक्स व्यवहार को नियंत्रण में रखे और स्थानीय औरतों के संसर्ग में न आये अन्यथा वे भी भारतीयों की भारी भीड़ में खो जायेंगे, उनका अपना कुछ नहीं रह जायेगा। यही वजह है कि शुरू के दिनों में अंग्रेजों के बीच भी भारतीय पत्नी या रखैल रखने की प्रथा काफी चल पड़ी थी, लेकिन बाद में वे बिलायत से अपनी पत्नियां लाने लगे। केनेथ बाल्हशेत ने अपनी किताब ‘रेस, सेक्स एंड क्लास अंडर राज’ में बताया है कि अंग्रेजों के लिये शासक नस्ल की प्रतिष्ठा का सवाल उनके लिये गंभीर चिंता का विषय बन गया। (पृ:2) बिलायत से लायी गयी बीबियों ने अंग्रेज अधिकारियों को स्थानीय लोगों से सामाजिक तौर और दूर रखने में एक अहम भूमिका अदा की। बाल्हशेत के अनुसार ही 1784 के बाद से यूरेशियनों को सभी महत्वपूर्ण स्थानों से हटाया जाने लगा, क्योंकि वे (शासक और शासित के बीच) सामाजिक दूरी को खत्म करने का खतरा पैदा करते थे।
एचईए कॉटन की किताब से पता चलता है कि शुरू के लंबे काल तक अंग्रेजों के भारतीय पत्नियां और रखैल हुआ करती थी। अंग्रेज औरतों वाले काफी कम होते थे, और अधिकांश व्यापारियों के भारतीय पत्नियां होती थी और वे अधिकांशत: भारतीय जीवन शैली को अपना लेते थे। कारखाने से लौटने के उपरांत वे चटाई पर बैठ कर भोजन किया करते थे और भारतीय पोशाक पहनते थे। (पृ:5) लेकिन राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद बड़े पैमाने पर पत्नियां बिलायत से आने लगी। उनके आने के साथ ही भारतीय बीबियां घरों से हटायी जाने लगी, हुक्का बंद होने लगा और घर पर बिलायती बीबी का कब्जा होने लगा। इसके साथ ही अंग्रेजों की जीवन शैली पूरी तरह से अलग होने लगी जो शासकों की जीवन शैली थी न कि व्यापारियों की।
यदि इस समूची पृष्ठभूमि में वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ का पाठ किया जाये तो उन सभी प्रसंगों का अर्थ खुल जायेगा जो इस कहानी में हेस्टिंग्स और अन्य अंग्रेज अफसरों के व्यवहारों, हेस्टिंग्स की बीबी के रौब-दाब और नेटिव लड़की से प्रेम करने के जुर्म में तबादला कर दिये गये अफसर के प्रसंग साफ हो जाते है। इसके साथ ही अंग्रेजों के भारतीय संपर्क सूत्र की सचाई की भी ऐतिहासिकता जाहिर होती है।
चतुर्दिक ब्लॉग से साभार

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